Monday, August 31, 2026

बनारस पर प्रथम मुस्लिम आक्रमण (1034) और शिक्षक से सैनिक ब्राह्मण बनने की कथा

बनारस पर प्रथम मुस्लिम आक्रमण (1034) और शिक्षक से सैनिक ब्राह्मण बनने की कथा प्रस्तुति अरविंद रॉय काशी को लोग हमेशा से धर्म-नगरी मानते हैं। पर काशी सैनिक-नगरी कब बनी? इसका एक निश्चित साल है - 1034 ईस्वी। इसी साल काशी के अग्रहार ब्राह्मण ने पहली बार जाना कि पोथी के साथ लाठी भी चाहिए। 1. पहला हमला कब और किसने किया? इतिहास में इसे Sack of Benares (1034) कहा जाता है। महमूद गजनवी के बेटे मसूद प्रथम ने अपने पंजाब के गवर्नर अहमद नियाल्तगीन को भारत का हाकिम बनाया था। उसी ने 1033-34 में बनारस पर हमला किया। Sack of Benares (1034) | Mas'ud I, Ahmad Niyaltigin | Kalachuris of Tripuri, Gangeyadeva | Ghaznavid victory In 1034, Governor Ahmad Niyaltigin made daring attack at Varanasi but immediately withdrew back to Punjab region with plunder. उस समय बनारस कन्नौज के प्रतिहारों के पास नहीं, बल्कि त्रिपुरी के कलचुरि राजा गांगेयदेव के अधीन था। गांगेयदेव खुद एक शक्तिशाली राजा था, पर काशी एक खुला तीर्थ था, किलेबंद राजधानी नहीं। नियाल्तगीन राज करने नहीं आया था। वह लूट कर भाग गया और लूट का हिस्सा गजनी नहीं भेजा। इसी बगावत पर मसूद ने अपने हिंदू जनरल तिलक राय से उसे मरवा दिया। 2. बैहाकी की आँखों देखी रिपोर्ट इस हमले का सबसे भरोसेमंद गवाह अबुल फज्ल बैहाकी है। उसने अपनी किताब तारीख-ए-बैहाकी में लिखा है। The contemporary historian Bayhaqi recorded the first attack on Benares conducted by a Turkish army, carried out in 1033 by the Ghaznavid governor बैहाकी के विवरण से तीन बातें साफ होती हैं: पहला - निहत्थी नगरी: जब नियाल्तगीन पहुँचा तो ब्राह्मण, विद्वान और व्यापारी अपने रोज़ के काम में लगे थे। वेदपाठ चल रहा था, बाजार खुले थे, सर्राफा की दुकानों में सोना-चाँदी रखा था। शहर में किसी हमले की तैयारी नहीं थी। दूसरा - दोपहर तक लूट: वह गंगा के किनारे-किनारे अचानक आया, दोपहर तक मुख्य बाजार और सर्राफा बाजार लूटा और माल लेकर तुरंत पंजाब लौट गया। तीसरा - मंदिरों का अंत: इस लूट के बाद काशी का कोई बड़ा मंदिर अपने मूल रूप में नहीं बचा। आज BHU के पास कंदवा गाँव का कर्दमेश्वर महादेव मंदिर ही एकमात्र मंदिर है जो अपने मूल रूप में पूर्व-मुस्लिम काल का बचा माना जाता है। 3. बनारस में ब्राह्मण का शस्त्रीकरण गुप्त काल से काशी के चारों ओर अग्रहार बसे थे। अग्रहार का ब्राह्मण अयाचक था। वह भिक्षा नहीं माँगता था, केवल पूजा-पाठ और अपनी जमीन पर खुद खेती करता था। उसके पास शस्त्र नहीं था, शास्त्र था। 1034 की लूट ने यह भ्रम तोड़ दिया। पहली बार समझ आया कि बिना हथियार के अग्रहार, मंदिर और खेत कोई नहीं बचा सकता। यहीं से बनारस में अयाचक ब्राह्मण के सैनिक बनने की यात्रा शुरू होती है। 4. गहड़वालों ने क्या किया? 1034 की लूट के 50 साल बाद 1089 के आसपास चंद्रदेव गहड़वाल ने काशी को फिर से जीता। उसने कन्नौज के गहड़वाल वंश की नींव डाली। he defeated Gopala, then formed an alliance with the Gahadavala king named Chandradeva. After Mahmud's departure... Chandradeva seized the throne of Kannauj चंद्रदेव ने दो काम किए: अ) अग्रहारों का पुनरुद्धार: 1093 ईस्वी और 1100 ईस्वी के चंद्रावती दानपत्रों में 500-500 ब्राह्मणों को गाँव दान देने का उल्लेख है। ये वही ब्राह्मण थे जो 1034 के बाद सशस्त्र हो चुके थे। अब उन्हें जमीन के साथ उसकी रक्षा की जिम्मेदारी भी मिली। ब) तुरुष्कदंड कर: गहड़वाल शिलालेखों में एक नए कर का नाम आता है - तुरुष्कदंड। The Gahadavala king levied a tax named Turushkadanda on the people to make annual tribute payments to the Sultans of Ghazni. इतिहासकारों में इसके अर्थ पर मतभेद है - कुछ कहते हैं यह गजनी को हर साल दी जाने वाली चौथ थी, तो कुछ कहते हैं यह तुरुष्कों से लड़ने के लिए सेना रखने का कर था, क्योंकि संस्कृत में 'दंड' का अर्थ कर भी है और सेना भी है। अर्थ जो भी हो, बात एक ही है - अब काशी को स्थायी सैनिक खर्च उठाना पड़ रहा था। निष्कर्ष बनारस पर 1034 का आक्रमण केवल एक लूट नहीं थी। वह एक युग का अंत था। उस दिन काशी का अयाचक ब्राह्मण पहली बार निहत्था पाया गया। उसी असुरक्षा ने उसे जमीन का मालिक, फिर जमींदार और अंत में सैनिक बना दिया। इसी का क्रम है जो आगे चलकर गहड़वाल काल में जमींदार ब्राह्मण, मुगल काल में भूमिहार और ब्रिटिश काल में बिहारी मिलिट्री ब्राह्मण कहलाया। काशी ने पोथी तो नहीं छोड़ी, पर पोथी के साथ हथियार उठाना 1034 से सीख लिया।

Saturday, August 15, 2026

राजा कर्णदेव दोनवार भूमिहार

राजा कर्णदेव एवं बेरू राजा दोनवार तथा डोमकटार भूमिहार शासकों का ऐतिहासिक व पुरातात्विक इतिहास प्रस्तुति - अरविन्द रॉय सन 1809 में, अर्थात् इन राजाओं के काल के लगभग 600 वर्ष बीत जाने के बाद भी, बुकानन ने दर्ज किया कि स्थानीय समाज में राजा कर्णदेव, बेरू राजा और उनके सहयोगियों का स्थान अत्यंत सम्मानजनक था और उन्हें स्थानीय आबादी द्वारा पूजनीय माना जाता था। 12वीं और 13वीं शताब्दी का समय भारतीय इतिहास का एक महान संक्रांति काल था। जब बंगाल के अंतिम सशक्त हिन्दू साम्राज्य सेन वंश का पतन हो रहा था और उत्तरी बिहार में राजपूत प्रमुखों की सत्ता अभी पूर्णतः स्थापित नहीं हुई थी, तब संपूर्ण उत्तरी भारत में राजनीतिक अनिश्चितता का माहौल था। फ्रांसिस बुकानन अपने सर्वे में लिखते हैं कि इसी शून्यता के दौर में कोसी और मिथिलांचल के क्षेत्र में कई स्थानीय ब्राह्मण सामंतों और कबीलों ने अपनी स्वतंत्र सत्ता पुनः स्थापित की। इनमें दो प्रमुख ब्राह्मण कबीलों का उन्होंने विस्तृत वर्णन किया है, जिन्हें ऐतिहासिक और सामाजिक संदर्भ में भूमिहार ब्राह्मण राजा माना जाता है - दोनवार (दौनवार/द्रोणवार) और डोमकटा (डोमकटार) 2. दोनवार राजवंश: राजा कर्णदेव और उनका साम्राज्य वंशानुगत पहचान: राजा कर्णदेव 'दोनवार' कबीले के प्रमुख थे। परंपराओं के अनुसार इस वंश के लोग आचार्य द्रोणाचार्य के वंशज माने जाते हैं, जिन्हें वर्तमान में दौनवार या द्रोणवार भूमिहार कहा जाता है। यह दोनवार / द्रोणवार भूमिहार का ही मूल रूप है। पारिवारिक पृष्ठभूमि: कर्णदेव इस कबीले के सबसे प्रभावशाली प्रमुख थे। उनके तीन सहोदर भाई थे - वल्लभ , दुर्लभ और त्रिभुवन । इन चारों भाइयों ने मिलकर संपूर्ण कोसी क्षेत्र का शासन प्रबंध संभाला और क्षेत्र को बाहरी आक्रमणों से सुरक्षित रखा। भौगोलिक विस्तार: इनका साम्राज्य कोसी नदी के पश्चिमी और उत्तरी तट पर फैला था, जो वर्तमान में बिहार के सहरसा, मधेपुरा, सुपौल, अररिया और पूर्णिया के पश्चिमी भू-भाग के अंतर्गत आता है। यहाँ आज भी इनके बनवाए प्राचीन गढ़, मिट्टी के कोट, और विशाल तालाबों के अवशेष मौजूद हैं। शासनकाल का प्रामाणिक निर्धारण: राजा कर्णदेव के काल को लेकर बुकानन ने तीन मान्यताओं का उल्लेख किया है: 1. लक्ष्मण सेन से पूर्व 2. लक्ष्मण सेन के समकालीन और करदाता 3. लक्ष्मण सेन के उत्तरकाल में इसका समाधान बुकानन ने स्थानीय मुख्य ज्योतिषी पंडित सोनभद्र मिश्र और नेपाल की तराई (मोरंग) के राजाओं की हस्तलिखित वंशावली के आधार पर किया। दोनों स्रोतों के अनुसार कर्णदेव लक्ष्मण सेन (1179-1206 ई.) के पतन के बाद हुए। इसी साक्ष्य पर आधुनिक इतिहासकार इनका काल 1200 ई. से 1220 ई. (13वीं सदी की शुरुआत) निर्धारित करते हैं। राजा कर्णदेव के पुरातात्विक साक्ष्य - सिकलकीगढ़ पूर्णिया क्षेत्र स्थित 'सिकलकीगढ़' को राजा कर्णदेव का मुख्य प्रशासनिक केंद्र माना जाता है। • विस्तार: लगभग 200 एकड़ में फैला विशाल आयताकार किला परिसर • सुरक्षा: मिट्टी और ईंटों की 3 मीटर ऊँची व 4-5 मीटर चौड़ी प्राचीर, उत्तर व पश्चिम में दोहरी सुरक्षा खाइयां , तथा 3 एकड़ में फैले मुख्य दुर्ग के अवशेष • स्थापत्य: खेतों से प्राप्त पकी मिट्टी की मूर्तियाँ व मृदभांड, प्राचीन शिव मंदिर के नक्काशीदार पत्थर के दरवाजों की चौखट और शिवलिंग - जो उस दौर की समृद्ध वास्तुकला को प्रमाणित करते हैं। 3. डोमकटा राजवंश: बेरू राजा और उनका वंश मूल पाठ भौगोलिक क्षेत्र: जिले का उत्तर-पूर्वी हिस्सा - जो वर्तमान में अररिया, किशनगंज और भारत-नेपाल सीमांत क्षेत्र के अंतर्गत आता है। प्रमुख शासक: बेरू राजा - डोमकटा कबीले के अत्यंत प्रभावशाली और शक्तिशाली प्रमुख। कुटुंब एवं उत्तराधिकारी: बेरू राजा के तीन भाई/रिश्तेदार थे - सहसमल , बली और बारीजन । बारीजन का पुत्र कुंज बिहारी आगे चलकर स्वयं एक ख्यातिप्राप्त प्रमुख बना। भौतिक अवशेष: बुकानन ने लिखा है कि इनके द्वारा बनवाए गए निर्माण कार्य संख्या में तो बहुत हैं, पर आकार में विशाल नहीं हैं। उस क्षेत्र में इनके छोटे दुर्ग (गढ़), पोखरे (तालाब) और डीह बड़ी संख्या में बिखरे हुए हैं। सामाजिक पहचान: 'डोमकटा' कबीला वर्तमान में डोमकटार भूमिहार के रूप में जाना जाता है 4. ऐतिहासिक एवं सामाजिक महत्व - "आधुनिक स्थानीय हिंदू पूजनीय मानते हैं" बुकानन द्वारा लिखी गई सबसे महत्वपूर्ण पंक्ति पेज के अंत में आती है: "All these Brahman chiefs are considered by the modern Hindus of the vicinity as objects of worship." सन 1809 में, अर्थात् इन राजाओं के काल के लगभग 600 वर्ष बीत जाने के बाद भी, बुकानन ने दर्ज किया कि स्थानीय समाज में राजा कर्णदेव, बेरू राजा और उनके सहयोगियों का स्थान अत्यंत सम्मानजनक था और उन्हें स्थानीय आबादी द्वारा पूजनीय माना जाता था। फ्रांसिस बुकानन का और सिकलकीगढ़ के पुरातात्विक साक्ष्य इस बात के ऐतिहासिक दस्तावेज़ हैं कि 13वीं शताब्दी की शुरुआत में जब केंद्रीय शक्ति छिन्न-भिन्न हुई, तब कोसी-मिथिला और सीमांचल के क्षेत्रों में दोनवार और डोमकटार ब्राह्मण (भूमिहार) राजाओं - विशेषकर राजा कर्णदेव और बेरू राजा - ने स्थानीय प्रशासन, धर्म और प्रजा की सुरक्षा की कमान संभाली थी। पंडित सोनभद्र मिश्र के विवरणों, मोरंग की पांडुलिपियों और धरातलीय अवशेषों से प्रमाणित यह इतिहास बिहार के मध्यकालीन स्वर्णिम अध्यायों में से एक है।

मौर्य काल से पाल वंश के पतन तक: बिहार में ब्राह्मण कबीलों का राजनीतिक पुनरुत्थान

मौर्य काल से पाल वंश के पतन तक: बिहार में ब्राह्मण कबीलों का राजनीतिक पुनरुत्थान प्रस्तुति: अरविंद रॉय 1. मौर्य और गुप्तोत्तर काल: आधारभूत बस्तियों का निर्माण रणनीतिक एवं उपजाऊ भूमि: मौर्य, शुंग, कुषाण और गुप्त काल में बिहार-मिथिलांचल कृषि और व्यापार का केंद्र था। बौद्ध और प्रशासनिक केंद्र: कोसी, गंगा, गंडक किनारे ऊंचे टीलों पर किले और बौद्ध मठ बने। सिकलीगढ़ में आज भी इसका प्रमाण है - presence of the fragments of a Mauryan column at Sikligarh outside a large fortified settlement और धरारा (सतलीगढ़) में मणिकथम स्तंभ मिला, जिसके बारे में Waddell ने लिखा - "शुरू में इसे अशोक का स्तंभ समझा गया, पर कोई लेख नहीं मिला, नीचे कुषाण राजा वासुदेव का सोने का सिक्का मिला।" सामंतवादी व्यवस्था: गुप्त काल के उत्तरार्ध में भूमि-दान के रूप में ब्राह्मणों और सेनापतियों को जमीन मिली, यही वर्ग आगे स्थानीय भू-स्वामी बना। 2. पाल वंश का काल और संतुलन पाल राजाओं (8वीं से 12वीं सदी) ने बौद्ध मठों को संरक्षण दिया, पर ग्रामीण अर्थव्यवस्था स्थानीय भू-स्वामियों के हाथ में ही रही। 3. पाल साम्राज्य का पतन और राजनीतिक शून्यता (12वीं-13वीं सदी) 12वीं सदी अंत में पाल-सेन कमजोर हुए और बख्तियार खिलजी के हमले ने बौद्ध नेटवर्क को ध्वस्त कर दिया। मगध-मिथिला में केंद्रीय सत्ता खत्म होने से Power Vacuum बना। Buchanan ने इसी के लिए लिखा है कि हिंदू राज्य के गिरने के बाद - several of the Brahman nobles, and the heads of other native tribes seem to have recovered a temporary power. 4. स्थानीय ब्राह्मण कबीलों का स्वायत्त शासक के रूप में उदय केंद्रीय सत्ता के पतन के बाद सदियों से भूमि पर अधिकार रखने वाले कबीलों ने स्वयं शासन संभाला: क) कोसी और उत्तरी बिहार (पूर्णिया/अररिया): • दोनवार (Doniwar) कबीला: Buchanan के अनुसार - "On the west side of the Kosi are several monuments of a chief named Karnadev, and of his three brothers, Ballabh, Dullabh, and Tribhuvan, who are said to have been powerful chiefs of the tribe of Doniwar Brahmans." • डोमकटा (Domkata) कबीला: "In the north-east parts of the district again a certain Brahman of the Domkata tribe, named Beru Raja... He had three brothers or kinsmen, who ruled the country, and who were named Sahasmal, Bali and Barijan." Buchanan ने आगे लिखा - "All these Brahman chiefs are considered by the modern Hindus of the vicinity as objects of worship." ख) तिरहुत और चंपारण क्षेत्र: • जैथरिया (जेठरिया) कबीला: In 1244 A.D., Gangeshwar Dev, a Brahmin of the Jaitharia clan, Now known as Bhumihar Brahmin, settled at Jaithar in Champaran. और बेतिया राज की स्थापना - The Bettiah Raj... was founded during the reign of Mughal emperor Shah Jahan in the 17th century. 5. पुरातात्विक निरंतरता (Archaeological Superimposition) सिकलीगढ़, लौरिया नंदनगढ़, धरारा जैसे टीलों पर दो स्तर मिलते हैं: • निचला स्तर: मौर्य-शुंग-गुप्त की बड़ी ईंटें, NBPW बर्तन, बौद्ध अवशेष • ऊपरी स्तर: 13वीं-17वीं सदी के दोंवार, डोमकट, जैथरिया सरदारों के मिट्टी-ईंट के गढ़ कारण: मध्यकालीन सरदारों ने नई जगह खोजने के बजाय उन्हीं पुराने ऊंचे, बाढ़ से सुरक्षित मौर्य-पाल कालीन टीलों पर अपने दुर्ग (डीह) दोबारा बसाए। निष्कर्ष मौर्य और पाल काल का कृषि-प्रशासनिक अनुभव 13वीं सदी की अराजकता में काम आया। जब केंद्रीय राजसत्ताएं ध्वस्त हुईं, तो प्राचीन उपजाऊ जमीनों पर बसे दोंवार, डोमकटार और जैथरिया जैसे ब्राह्मण कबीलों ने शस्त्र उठाकर स्थानीय शासन की कमान संभाली। यही बिहार के मध्यकालीन इतिहास का असली मोड़ है। संदर्भ: 1. Francis Buchanan-Hamilton, An Account of the District of Purnea in 1809-10, Page 47 2. L.S.S. O'Malley, Bengal District Gazetteers - Purnea, 1911, Chapter Archaeology & Gazetteer - Asuragarh, Barijangarh, Benugarh 3.