Saturday, August 15, 2026
राजा कर्णदेव दोनवार भूमिहार
राजा कर्णदेव एवं बेरू राजा दोनवार तथा डोमकटार भूमिहार शासकों का ऐतिहासिक व पुरातात्विक इतिहास
प्रस्तुति - अरविन्द रॉय
सन 1809 में, अर्थात् इन राजाओं के काल के लगभग 600 वर्ष बीत जाने के बाद भी, बुकानन ने दर्ज किया कि स्थानीय समाज में राजा कर्णदेव, बेरू राजा और उनके सहयोगियों का स्थान अत्यंत सम्मानजनक था और उन्हें स्थानीय आबादी द्वारा पूजनीय माना जाता था।
12वीं और 13वीं शताब्दी का समय भारतीय इतिहास का एक महान संक्रांति काल था। जब बंगाल के अंतिम सशक्त हिन्दू साम्राज्य सेन वंश का पतन हो रहा था और उत्तरी बिहार में राजपूत प्रमुखों की सत्ता अभी पूर्णतः स्थापित नहीं हुई थी, तब संपूर्ण उत्तरी भारत में राजनीतिक अनिश्चितता का माहौल था।
फ्रांसिस बुकानन अपने सर्वे में लिखते हैं कि इसी शून्यता के दौर में कोसी और मिथिलांचल के क्षेत्र में कई स्थानीय ब्राह्मण सामंतों और कबीलों ने अपनी स्वतंत्र सत्ता पुनः स्थापित की। इनमें दो प्रमुख ब्राह्मण कबीलों का उन्होंने विस्तृत वर्णन किया है, जिन्हें ऐतिहासिक और सामाजिक संदर्भ में भूमिहार ब्राह्मण राजा माना जाता है - दोनवार (दौनवार/द्रोणवार) और डोमकटा (डोमकटार)
2. दोनवार राजवंश: राजा कर्णदेव और उनका साम्राज्य
वंशानुगत पहचान: राजा कर्णदेव 'दोनवार' कबीले के प्रमुख थे। परंपराओं के अनुसार इस वंश के लोग आचार्य द्रोणाचार्य के वंशज माने जाते हैं, जिन्हें वर्तमान में दौनवार या द्रोणवार भूमिहार कहा जाता है। यह दोनवार / द्रोणवार भूमिहार का ही मूल रूप है।
पारिवारिक पृष्ठभूमि: कर्णदेव इस कबीले के सबसे प्रभावशाली प्रमुख थे। उनके तीन सहोदर भाई थे - वल्लभ , दुर्लभ और त्रिभुवन । इन चारों भाइयों ने मिलकर संपूर्ण कोसी क्षेत्र का शासन प्रबंध संभाला और क्षेत्र को बाहरी आक्रमणों से सुरक्षित रखा।
भौगोलिक विस्तार: इनका साम्राज्य कोसी नदी के पश्चिमी और उत्तरी तट पर फैला था, जो वर्तमान में बिहार के सहरसा, मधेपुरा, सुपौल, अररिया और पूर्णिया के पश्चिमी भू-भाग के अंतर्गत आता है। यहाँ आज भी इनके बनवाए प्राचीन गढ़, मिट्टी के कोट, और विशाल तालाबों के अवशेष मौजूद हैं।
शासनकाल का प्रामाणिक निर्धारण:
राजा कर्णदेव के काल को लेकर बुकानन ने तीन मान्यताओं का उल्लेख किया है:
1. लक्ष्मण सेन से पूर्व 2. लक्ष्मण सेन के समकालीन और करदाता 3. लक्ष्मण सेन के उत्तरकाल में
इसका समाधान बुकानन ने स्थानीय मुख्य ज्योतिषी पंडित सोनभद्र मिश्र और नेपाल की तराई (मोरंग) के राजाओं की हस्तलिखित वंशावली के आधार पर किया। दोनों स्रोतों के अनुसार कर्णदेव लक्ष्मण सेन (1179-1206 ई.) के पतन के बाद हुए। इसी साक्ष्य पर आधुनिक इतिहासकार इनका काल 1200 ई. से 1220 ई. (13वीं सदी की शुरुआत) निर्धारित करते हैं।
राजा कर्णदेव के पुरातात्विक साक्ष्य - सिकलकीगढ़
पूर्णिया क्षेत्र स्थित 'सिकलकीगढ़' को राजा कर्णदेव का मुख्य प्रशासनिक केंद्र माना जाता है।
• विस्तार: लगभग 200 एकड़ में फैला विशाल आयताकार किला परिसर • सुरक्षा: मिट्टी और ईंटों की 3 मीटर ऊँची व 4-5 मीटर चौड़ी प्राचीर, उत्तर व पश्चिम में दोहरी सुरक्षा खाइयां , तथा 3 एकड़ में फैले मुख्य दुर्ग के अवशेष • स्थापत्य: खेतों से प्राप्त पकी मिट्टी की मूर्तियाँ व मृदभांड, प्राचीन शिव मंदिर के नक्काशीदार पत्थर के दरवाजों की चौखट और शिवलिंग - जो उस दौर की समृद्ध वास्तुकला को प्रमाणित करते हैं। 3. डोमकटा राजवंश: बेरू राजा और उनका वंश
मूल पाठ
भौगोलिक क्षेत्र: जिले का उत्तर-पूर्वी हिस्सा - जो वर्तमान में अररिया, किशनगंज और भारत-नेपाल सीमांत क्षेत्र के अंतर्गत आता है।
प्रमुख शासक: बेरू राजा - डोमकटा कबीले के अत्यंत प्रभावशाली और शक्तिशाली प्रमुख।
कुटुंब एवं उत्तराधिकारी: बेरू राजा के तीन भाई/रिश्तेदार थे - सहसमल , बली और बारीजन । बारीजन का पुत्र कुंज बिहारी आगे चलकर स्वयं एक ख्यातिप्राप्त प्रमुख बना।
भौतिक अवशेष: बुकानन ने लिखा है कि इनके द्वारा बनवाए गए निर्माण कार्य संख्या में तो बहुत हैं, पर आकार में विशाल नहीं हैं। उस क्षेत्र में इनके छोटे दुर्ग (गढ़), पोखरे (तालाब) और डीह बड़ी संख्या में बिखरे हुए हैं।
सामाजिक पहचान: 'डोमकटा' कबीला वर्तमान में डोमकटार भूमिहार के रूप में जाना जाता है
4. ऐतिहासिक एवं सामाजिक महत्व - "आधुनिक स्थानीय हिंदू पूजनीय मानते हैं"
बुकानन द्वारा लिखी गई सबसे महत्वपूर्ण पंक्ति पेज के अंत में आती है:
"All these Brahman chiefs are considered by the modern Hindus of the vicinity as objects of worship."
सन 1809 में, अर्थात् इन राजाओं के काल के लगभग 600 वर्ष बीत जाने के बाद भी, बुकानन ने दर्ज किया कि स्थानीय समाज में राजा कर्णदेव, बेरू राजा और उनके सहयोगियों का स्थान अत्यंत सम्मानजनक था और उन्हें स्थानीय आबादी द्वारा पूजनीय माना जाता था।
फ्रांसिस बुकानन का और सिकलकीगढ़ के पुरातात्विक साक्ष्य इस बात के ऐतिहासिक दस्तावेज़ हैं कि 13वीं शताब्दी की शुरुआत में जब केंद्रीय शक्ति छिन्न-भिन्न हुई, तब कोसी-मिथिला और सीमांचल के क्षेत्रों में दोनवार और डोमकटार ब्राह्मण (भूमिहार) राजाओं - विशेषकर राजा कर्णदेव और बेरू राजा - ने स्थानीय प्रशासन, धर्म और प्रजा की सुरक्षा की कमान संभाली थी।
पंडित सोनभद्र मिश्र के विवरणों, मोरंग की पांडुलिपियों और धरातलीय अवशेषों से प्रमाणित यह इतिहास बिहार के मध्यकालीन स्वर्णिम अध्यायों में से एक है।
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