Sunday, June 23, 2019


सत्रहवीं शताब्दी के मध्य में एक कामदेव मैत्रा ने पुथिया राज परिवार के तहसीलदार के रूप में कार्य किया। कामदेव के दूसरे पुत्र रघुनंदन को राजा ने अपने एजेंट के रूप में नवाब मुर्शिद कुली खान के दरबार में चुना, जो पूरे बंगाल का अधिपति था। 
जब नवाब ने अपने दरबार को ढाका से स्थानांतरित किया जो मुर्शिदाबाद के रूप में जाना जाने लगा तो वह रघुनंदन को अपने साथ ले गया और उसे अपना दीवान या मंत्री नियुक्त किया। नवाब ज़मींदारों के सम्पदा को जब्त करने के लिए आगे बढ़े, जो उनके नए नियमों के अनुरूप होने में विफल रहे, और ऐसे कई सम्पदा उनके दीवान रघुनंदन के बड़े भाई रामजीवन ने हासिल किए।  उचित समय में रामजीवन को राजा की उपाधि दी गई और उन्होंने अपना मुख्यालय नटौर में स्थापित किया। उनकी संपत्ति को आम तौर पर "राजशाही जमींदारी" के रूप में जाना जाता था। [5]

इस संपत्ति में लगभग 13,000 वर्ग मील का क्षेत्र था और इसमें न केवल उत्तर बंगाल का बहुत हिस्सा शामिल था, बल्कि बाद के बड़े हिस्से भी शामिल थे, जिसमें मुर्शिदाबाद, नादिया, जेसोर, बीरभूम और बर्दवान के प्रशासनिक जिले शामिल थे। 

नटौर में पहला महल या राजबाड़ी राजा रामजीवन द्वारा बनवाया गया था। महल को दो सेटों से घेर लिया गया था जो अब भी खाली हैं। संपत्ति के विभाजन के बाद राजवंश की कनिष्ठ शाखा के लिए एक अलग महल बनाया गया। 1897 के भूकंप से कई मूल इमारतों को नष्ट कर दिया गया था और बाद में पुनर्निर्माण या प्रतिस्थापित किया गया था। 

रामजीवन के दीवान दोयाराम को सितार रॉय नाम के एक पुनर्गठित जमींदार को नियुक्त करने में नवाब मुर्शिद कुली खान द्वारा उनकी सेवा के लिए भूमि सम्पदा और रे राययान की उपाधि दी गई थी।  यथोचित रूप से दोयाराम ने अपने राजवंश दिगपटिया पैलेस  के साथ अपना राजवंश दिघपतिया राज स्थापित किया।

राजा रामजीवन को उनके दत्तक पुत्र रामकांता ने सफल बनाया था। राजा रामकांता की प्रारंभिक मृत्यु के बाद, नटोर एस्टेट को उनकी विधवा रानी रानी भबानी के नाम से जाना जाता था, जो अपने अच्छे कामों के लिए प्रसिद्ध थीं। 


The Natore dynasty is regarded as one of the most powerful and unified empires of the 18th century in this region. In 1706, contrarily in 1710, Raja Ramjiban became the first king of the dynasty and he built his Rajbari at Natore on an area of 50.42 acres of land that is enclosed within two rings of moats as a part of the defensive system. He governed up to 1734 AD and died that very year. 

After his death, his adopted son Raja Ramkanto became the king and got married to Rani Bhabani in 1730. When Ramkanto died, Nawab Alibordi Khan handed over the responsibility of the zamindari to Rani Bhabani who expanded the empire further.
और रानी भवानी ने शिव को आत्‍मसात कर लिया
हुक्‍म रानी भवानी का: कहीं कोई भूखा ना रहे
शैव और शाक्‍तों का झगडा तो सिरे से ही मिटा दिया
बंगाल से काशी तक अन्‍नपूर्णा बन गयीं रानी भवानी
सन 1776 का दौर भारत के लिए बेहद त्रासद रहा। बंगाल से लेकर उत्‍तर भारत तक के एक बडे इलाके में दुर्भिक्षु अचानक एक महामारी की तरह आ गया। पहले तो राजनीतिक अराजकता और अन्‍याय से जूझ रही जनता को यह अकाल बेहद भारी पडा। बडे पैमाने पर लोग भूख से मरने लगे। कि अचानक ही दिल्‍ली और बंगाल की बडी सत्‍ता की चुप्‍पी के खिलाफ एक महिला ने बिगुल बजाया और अपने खजाने का दरवाजा खोल दिया। हुक्‍म दिया कि राज्‍य में कोई भी मौत अब भूख से नहीं होनी चाहिए। और इसके बाद से ही भारतीय इतिहास की इस महिला को जन-सामान्‍य ने साक्षात अन्‍नपूर्णा का ओहदा दे दिया। आज के बांग्‍लादेश समेत तब बंगाल के कई और भी इलाकों की एक बडी रियासत नाटोर के नाम पर थी। एक करोड की सालाना आमदनी वाली इस रियासत के जमींदार रामकांत की शादी हुई उमा से, लेकिन शादी के बाद ही उमा के बजाय उन्‍हें रानी भवानी का नाम मिल गया। लेकिन बस दो-तीन बरस में ही यह दाम्‍पत्‍य सुख रमाकांत की मौत के साथ खत्‍म हो गया। लेकिन तब यानी सन 1743 में महज 22 साल की इस रानी भवानी ने पति की गद्दी सम्‍भाल ली।
यह सर्वविद.या और संस्‍कृति की भारतीय राजधानी काशी के दुर्दिन थे। एक ओर दिल्‍ली में औरंगजेब कहर ढा रहा था तो बंगाल में उसका कारिंदा मीर जुमला, मुर्शीद कुली खान और काला पहाड अपनी बर्बरता की हर घिनौनी सीमा पार कर जाने चाहते थे। मजहबी जुनून चरम पर था। जाहिर है कि काशी तब एक छोटी बस्‍ती के तौर पर सिकुड गयी थी। लेकिन शिव की यह नगरी तो विश्‍वविख्‍यात ही थी। हां, तब तक पूरी काशी के शिव और बंगालियों की देवी काली की उपासना को लेकर माहौल में जहर घुल चुका था। दोनों ही एकदूसरे से दबने को तैयार नहीं थे। परस्‍पर श्‍लील-अश्‍लील कटाक्षों का दौर उरूज पर था। बहरहाल, रानी भवानी अपने वैधव्‍य के बाद इस शैव-मोक्ष नगरी की ओर आकर्षित हुईं। और इस तरह पूरब के बंगाल से लेकर उत्‍तर की काशी तक एक बेमिसाल धार्मिक-सांस्‍कृतिक भागीरथी बह चली। लेकिन हकीकत तो यह थी कि एक विधवा महारानी पूरी तरह राजनीतिक मकसद को लेकर दिल्‍ली के आकाओं और उनके बंगाल के कारिंदों को मुंहतोड जवाब देने निकल पडी थी। माध्‍यम था धार्मिक और मानवीय सेवा। रानी भवानी ने इस तरह एक ऐसा अभियान छेड दिया था, जिसके बारे में तब के राजे-महराजे कल्‍पना तक करने का साहस नहीं जुटा सकते थे। लेकिन रानी भवानी नाटोर से लेकर हिमालय के पाददेश तक न केवल पहुंच ही गयीं, बल्कि अपने नाम का डंका भी बजवा दिया। हां, उनके इन धार्मिक प्रयासों का सीधा और सबसे ज्‍यादा फायदा वाराणसी को जरूर मिल गया। वजह शायद यह भी रही हो, कि रानी भवानी अपना वैधव्‍य काशी में ही काट कर मोक्ष हासिल करना चाहती रही हों।
इसी बीच दुर्भिक्षु आ गया। अकाल से त्रस्‍त अपनी ही नहीं, बल्कि पूरी काशी तक के इलाके की जनता को उन्‍होंने भोजन मुहैया कराया। अभिलेख गवाह हैं कि अकेले काशी में ही एक विशाल हौदे में आठ मन चना रोज भिगोया जाता था जिसे सुबह लगने वाली भूखे-बेहाल लोगों में बांट दिया जाता था। इतना ही नहीं, रोज पचास मन चावल पकवाकर रानी भवानी पहले अन्‍नपूर्णा देवी को भोग लगाती थीं, और उसके फौरन बाद उसे भी वितरित कर दिया जाता था। इस भोज में विधवाओं के अलावा दाण्‍डी संन्‍यासी और साधुओं का खास तौर पर ख्‍याल रखा जाता था। और यह क्रम केवल काशी में ही नहीं, बंगाल की उनकी रियासत तक निर्बाध चलता था। जगह-जगह अन्‍न भंडार खुलवा रखे थे रानी भवानी ने ताकि किसी भी जरूरतमंद को भूखे ना सोना पडे। त्रुटि या चूक की कहीं कोई गुंजाइश ही नहीं। इसीलिए कुछ ही दिनों में इस रानी भवानी को साक्षात अन्‍नपूर्णा देवी का अवतार मान कर पूजने तक लगे। अपने पति के श्राद्ध-कर्म के दौरान एक साल तक उन्‍होंने रोजाना गंगा स्‍नान के बाद ब्राह्मणों को एक-एक मकान दान करने की परम्‍परा भी शुरू कर दी। अनाथ, बेघर और जरूरतमंद लोगों के लिए भी उन्‍होंने सुविधाजनक मकान बनवाये ताकि वे निश्चिंत होकर भगवदभजन कर सकें।
अपने इस अभियान के दौरान रानी भवानी ने अकेले काशी में ही 18 कुण्‍ड, 60 तालाब, 380 मंदिर, 15 विश्राम स्‍थल, 500 से अधिक भवन, गंगा पर 4 सुरम्‍य घाट के अलावा कुरूक्षेत्र सरोवर का पुनरूद्धार करने के अलावा पंचक्रोशी  परिक्रमा मार्ग पर हर दस मील पर विश्रामालय और हर दो मील पर एक तालाब के के साथ ही पूरे मार्ग पर सघन वृक्षारोपण भी कराया। रानी भवानी ने शैव-शाक्‍त कटुता को दूर करने के लिए एक ओर जहां मां देवी तारा का भव्‍य मंदिर बनवाया वहीं मौजूदा काशी-विश्‍वनाथ मंदिर के बगल में एक विशाल शिवालय बनवाया।  इसी शिवालय में भुवनेश्‍वर शिव के साथ ही त्रिपुरसुंदरी भुवनेश्‍वरी देवी की प्रतिमाओं को श्रीयंत्र पर स्‍थापित कराया। साथ ही पंचमुखी गणेश की एक मूर्ति भी स्‍थापित करा दी। काशी का नाम जिन्‍ मंदिरों से आज एक बडी पहचान रखता है उनमें पाण्‍डेय घाट वाला कालीबाडी, ताराबाडी, दुर्गाबाडी, खालिसपुरा वाला पातालेश्‍वर भवानी शंकर महादेव मंदिर, दशाश्‍वमेधघाट के निकट भुवनेश्‍वर महादेव आदि प्रमुख हैं जिनमें शैव और शाक्‍त का भेद ही खत्‍म हो जाता था।
रानी भवानी ने बंगाल और बिहार आदि इलाकों में भी अनगिनत मंदिर और मठ तथा सरोवरों का निर्माण कराया और इसके लिए करीब पचास लाख बीघा जमीन दान में दे डाली। बहरहाल, अभी तक रानी भवानी के दैहिक अवसान का समय अंधेरे में ही है। वैसे भी जो अन्‍नपूर्णा रही हो, वह देवी तो साक्षात ब्रह्म में ही विलीन हुई होगी। है कि नहीं।
नवरात्रि में सिद्धपीठों में तंत्र अनुष्ठान का विधान है। पश्चिम बंगाल के वीरभूमि जिले में शक्ति पीठ मां तारा का मंदिर है। यह तंत्र साधना का सबसे बड़ा केंद्र है। ठीक वैसे ही काशी के देवनाथपुरा गली में मां तारा का मंदिर है। यहां बंगाल की रानी भवानी की बेटी तारा सुंदरी ने समाधि ली थी।      क्यों ली थी समाधि
बंगाल की रानी भवानी की बेटी तारा सुंदरी की समाधि है। तत्कालानी मुगलवंश के शासक शिराजुदौला ने तारा सुंदरी से विवाह का एलान किया था। मंदिर और ट्रस्ट प्रबंधक श्यामा प्रसाद ने बताया कि रानी भवानी शासक से बचने के लिए नाव से गंगा के रास्ते काशी पहुंची थीं। शासक ने जब सेना और बारात के साथ काशी का रुख किया तो तारा सुंदरी ने इसी स्थान पर जीवित समाधि ले ली। 
काशी में तांत्रिक पीठ मां तारा का मंदिर सन 1752 से 1758 के बीच में नाटोर की महारानी रानी भवानी ने पांडेयघाट देवनाथ पूरा मुहल्ले में बनवाया।   कम उम्र हो गई थी पति की मौत
प्रबंधक श्यामा प्रसाद ने बताया कि तारा सुंदरी देवी बहुत सुंदर थी। उनका विवाह बंगाल के खजुरा के रहने वाले रघुनाथ लाहिड़ी से हुआ था। रघुनाथ लाहिड़ी की कम उम्र में ही मौत हो गई। इसके बाद बंगाल के नवाब की नजर तारा सुंदरी पर पड़ी। उसने रानी भवानी के पास संदेश भेजकर बेटी से विवाह का एलान किया था। 1752 रानी भवानी गंगा के रास्ते बेटी को लेकर काशी आ गईं। नवाब को पता चला तो वह भी सेना के साथ यहां आ गया।     उच्च कोटि के साधक ही कर सकते हैं साधना 
पति राजा रामकांत की मौत के बाद रानी भवानी ने काशी में 365 भू-खंडों का दान किया था।
रत्न चतुर्दशी के दिन 1752 में मंदिर के स्थापना का काम शुरू हुआ। 1758 में यह बनकर तैयार हुआ। महायोगिनी कि साधना उच्च कोटि का साधक ही कर सकता है। तंत्र क्रिया सामान्य पुजारी नहीं कर पाते, मंदिर की पूजा और रिवाज बंगाल के विरभूमि में स्थापित मां तारा पीठ के अनुसार ही संपन्न होता है।  

Sunday, June 16, 2019

पेड़-पौधे, पशु-पक्षी एवं वनों का महत्व समझाते हुए हिंदू-धर्म में स्वस्थ जीवन निर्वाह के चार आश्रमों की नींव डाली गई और इस प्रकार चार आश्रमों में दो-ब्रह्मचर्य तथा संन्यास-दोनों का वन में रहकर ही पालन किया जाता था। इतना ही नहीं वानप्रस्थ आश्रम वन की ओर प्रस्थान करने वाला आश्रम हैं, जिसमें धन-धान्य का संग्रह करना वर्जित था। मात्र गृहस्थ- आश्रम उपभोग के लिए पूर्ण रूप से स्वतंत्र था। इसका सीधा अर्थ हुआ कि जीवन का 25 प्रतिशत भाग ही पूरी सामाजिक व्यवस्था की धुरी था, जो भौतिक सुखों के लिए सभी सुख-सुविधाओं का उपभोग कर सकता था। यदि कोई व्यक्ति अपने जीवन का 50 प्रतिशत जीवन जंगल में बिताएगा तो जंगल को काटने का अव्यावहारिक निर्णय कभी नहीं ले सकता, साथ ही और अधिक पेड़ लगाएगा और पशु-पक्षियों को समझने की कोशिश भी करेगा। घर के आगे नीम का पेड़ लगाना, चौबारे या चौराहे पर पाकड़, पीपल और बरगद का पेड़ लगाना हिंदू संस्कृति का अंग है। अभी भी पेड़ों को काटना उचित नहीं माना जाता। यहां तक कि आवश्यकता पड़ने पर ही पेड़ों की पूजा करके उसे काटा जाता हैं ताकि कम–से–कम पेड़ों के काटने की आवश्यकता पड़े। पीपल, वट, आंवला, आम और नीम की पूजा, तुलसी का पौधा घर में लगाना आदि महत्वपूर्ण कार्य मात्र ज्ञान और विज्ञान का समाज के लिए सुलभतम उपयोग है, क्योंकि हम चिकित्सा-उपयोगी पौधों एवं पेड़ों के विभिन्न भागों का प्राकृतिक रूप से प्रयोग करने में विश्वास रखते हैं न कि पेस्ट बनाकर ट्यूब में भरकर बेचने में। अन्य सभ्यताओं से विपरीत हिंदू-संस्कृति की धारणा मानव की सेवा करना था, उसे वाणिज्यिक रूप देने की नहीं।

इसी कारण गांव-गांव में, लोगों को विभिन्न पेड़-पौधों के फूल-पत्ती, जड़, छाल आदि का उपयोग चिकित्सा हेतु करना आता था। यह परंपरा पैतृक धरोहर के रूप में समाज में जीवित है, किंतु मूल वैज्ञानिक तथ्यों को न जानने एवं परीक्षण (टेस्ट) के लिए विकसित प्रणाली न होने एवं उनका प्रयोगशाला-परीक्षण न होने पाने के कारण अब उनका उपयोग प्रतिदिन कम होता जा रहा है।

गीता का यह श्लोकांश ‘अश्वत्थः सर्ववृक्षाणाम्...वृक्षों की पर्यावरण को संतुलित रखने की महती भूमिका को रेखांकित करने का सजीव उदाहरण है कि वृक्षों में भी जीवन है।

गीता में भगवान् कृष्ण का कथन है कि वृक्षों में मैं पीपल हूं और मत्स्य पुराण में पेड़ों को पुत्रों की संख्या से अभिहित करना पेड़ों के महत्व को स्पष्ट करते हैं।

Friday, June 7, 2019

Wednesday, June 5, 2019