Tuesday, August 6, 2019

कुलीन प्रथाक विकास मिथिलामे एहियुगमे भेल। ओना एकर विश्लेषण पञ्जी प्रबन्धक प्रसंग भेल अछि परञ्ज ओकर एतिहासिक पृष्ठभूमि एहिठाम राखब आवश्यक। कुलीन व्यवस्थाक संस्थापक छलाहे आदि सूर जे पूर्वी मिथिलामे कतहुँ शासन करैत छलाह आ वृद्ध वाचस्पति हुनके ओत्तए रहि अपन न्यायकणिका नामक पुस्तकक रचना कएने छलाह। आदिसूर (९म शताब्दी)मे मिथिला आ बिहारमे बौद्धधर्मक प्रधानता छल आ तैं ब्राह्मणत्वक रक्षार्थ ओ कोलाञ्चसँ पाँचटा शुद्ध ब्राह्मणकेँ बजाय अपना ओतए आश्रय देलन्हि। आदिसूरक दरबारमे ब्राह्मण लोकनिक वर्गीकरण प्रारंभ भेल छल आ पाछाँ बल्ला सेन अपनाकेँ आदिसूरक वंशसँ मिलाय अपनाकेँ कुलीन प्रथाक जन्मदाता घोषित केलन्हि मुदा एहिठाम ई स्मरणीय जे मिथिलाँचलसँ प्राप्त दू ताम्र पत्र (बनगाँव आ पंचोभ) अभिलेखमे दान देबाक हेतु कोलाञ्च ब्राह्मणक उल्लेख स्पष्ट अछि। मिथिलाक पाञ्जिमे जे मूल ग्राम अछि सएह ओकर प्राचीनताक सबसँ पैघ प्रमाण मानल जा सकइयै। एवँ प्रकारे कुलीन व्यवस्थाक जन्म सर्वप्रथम मिथिलहिमे भेल छल आ पाछाँ एहिठामसँ बंगाल आ असममे इ पसरल। हरिसिंह देव ओहिसब पुराण व्यवस्थाकेँ एकत्र कए पञ्जी प्रबन्धक व्यवस्था केने छलाह। एहि प्रथाक बादसँ विवाहादिक नियम सेहो श्रृंखलाबद्ध भेल। पञ्जि आ घटकक प्रथा चलल। एहि प्रथाकेँ जँ रमानाथ बाबू समाजक नियमनक हेतु सर्वश्रेष्ठ मनने छथि तँ उपेन्द्र ठाकुर एकरा प्रतिक्रियावादी कहने छथि। एकरा चलते सामाजिक संकीर्णता दिनानुदिन बढ़ैत गेल आ  बिकौआक प्रथा प्रचलित भेल।

Monday, August 5, 2019

गुप्तयुगक पछाति एवँ कर्णाटवंशक उत्थान धरि वर्णाश्रम धर्मक प्रधानता बनले रहल आ ठामठाम कठोर सेहो भेल। स्मृतिकार लोकनिक रचनासँ एकर भान होइछ। अनुलोमप्रतिलोमक फले अनेको वर्णशंकर उपजाति आदिक विकास भेल। असत् शूद्र अंत्यजक नामसँ पाँचम वर्णमे परिगणित भेल। एहियुगमे पंचगौड़क कल्पना सेहो साकार भेल आ पंचगौड़ ब्राह्मणक सूत्रपात सेहो ब्राह्मण लोकनि दोसरो वर्णक जीविकाकेँ अपनौलन्हि। यज्ञक संगहि संग ओ लोकनि मूर्त्तिपूजा आ पुरोहिताइक पेशा सेहो अपनौलन्हि। ब्राह्मण लोकनि सेनापतिक काजमे सेहो निपुण होमए लगलाह। पालवंशक अधीन बहुतो ब्राह्मण सेनापति रहैथ जकर उल्लेख पाल अभिलेखमे अछि। एहियुगमे ब्राह्मण लोकनिकेँ प्रचुर मात्रामे खेत दानमे भेटल छलन्हि आ ओ लोकनि पैघपैघ सामंत भेल छलाह आ जमीनकेँ दोसराक हाथे खेती करबाय ओ लोकनि अपन सामंत प्रदत्त राजनैतिक अधिकारक सुरक्षामे व्यस्त रहैत छलाह। ब्राह्मणक्षत्रिय आब खेतियो दिसि भीर गेल छलाह।

Saturday, August 3, 2019

जय माँ डुमरेजनी
         🎗️🎗️डुमरांव और आस पास🎗️🎗️
 💪डुमरांव के भूमिहार कुल भूषण
 🖐️डुमरांव से जुड़ी स्थानीय लोक कथाएं कहानी
🖐️ काव, ठोरा ,कर्मनाशा नदी लोक कथाएं
🖐️डुमराँव राज ,प्राचीन राजेश्वर मंदिर
प्रस्तुति अरविन्द रॉय
क्रांतिकारी चुटूर राय,  चौधरी धनुषधारी राय, कालिका राय,चौधरी बृजबिहारी राय बहुत नाम छोड़ दिया है अगली पोस्ट में माँ डुमरेजनी की कथा पर पूर्व  पोस्ट को पूरा पढ़े
स्वामी सहजानंद सरस्वती 1909 से लेकर 1922 तक काशी के अलावा कार्यक्षेत्र डुमरांव के पास के गांव डुमरी, सिमरी को भी बनाया 1921 जेल से रिहा होने के बाद डुमरांव के सिमरी और आसपास के गांवों में बड़े पैमाने पर चरखे से खादी वस्त्र का उत्पादन कराया। ब्राह्मणों की एकता और संस्कृत शिक्षा के प्रचार पर उनका ज़ोर रहा। सिमरी में रहते हुए सनातन धर्म के जन्म से मरण तक के संस्कारों पर आधारित 'कर्मकलाप' नामक 1200 पृष्ठों के विशाल ग्रंथ की हिन्दी में रचना की। काशी से कर्मकलाप का प्रकाशन किया।महान भूमिहार  क्रन्तिकारी  डुमरांव के युगल जोड़ी स्वतंत्रता सेनानी चुटूर कुमारी यानी चौधरी चुटूर राय की मातृभूमि सरकार द्वारा क्रांतिकारी चुटूर राय को उचित सम्मान नहीं दिया गया खैर आगे बढ़ते है
डुमरांव नगरपालिका का गठन वर्ष 1868 में किया गया था।स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद नगरपालिका के चुनाव में प्रथम बार कई ऐसे वार्ड सदस्य चुनकर आए। जिन्होंने पुरानी परंपरा को धराशायी कर नया कीर्तिमान स्थापित किया जिसमे भूमिहार ब्राह्मणों की बड़ी संख्या  the। डुमरांव राज के प्रबंधक और उनसे जुड़े़ लोगों को अध्यक्ष तथा उपाध्यक्ष पद पर काबिज होने की परंपरा टूट गई। नई परंपरा में चौधरी धनुषधारी राय को अध्यक्ष बनाया गया। लेकिन, मामला उच्च न्यायालय में जाने के बाद न्यायालय द्वारा चुनाव रद कर दिया गया। उन दिनों नप अधिनियम के तहत राज्य सरकार ने चौधरी बृजबिहारी राय को अध्यक्ष पद पर नियुक्त कर दिया

पांच सौ वर्ष पहले डुमरांव घने जंगलों से घिरा हुआ था। उस वक्त सड़कें नहीं थी। इसी रास्ते पर चेरो जाति का किला था। चेरों का इस इलाके में आतंक था। लूटमार.तथा बटमारी उनका पेशा था।।कांव नदी के उस पार स्थित चेराें खरवारों का कबीला बावन दुअरियां आज भी वीरान पड़ा है। कहा जाता है कि उस जमाने में उनका टीला काफी समृद्ध था तथा उंचाई पर बसा हुआ था। लेकिन मां डुमरेजनी के श्राप के बाद न सिर्फ चेराें खरवारों का नाश हुआ बल्कि उनका समृद्ध किला बावन दुअरियां भी बंजर हो गया। आज भी उस टीले के क्षेत्र में न तो हल चलता है और न ही खेती होती है। कई बार हल चलाने का प्रयास भी किया गया लेकिन सफलता नहीं मिल सकी है। कहा जाता है कि इस टीले के अंदर कई इतिहास छिपे है। मान्यता तो ये भी है कि इस टीले में काफी धन संपदा भी दबे होंगे.अपने पुरनियों से कहानी सुनी है कि यहाँ एक धनवान चेरों राजा रहता था, परन्‍तु वह कुछ पागल किस्‍म का इंसान था। उसके पास जमीन में लम्‍बे समय से छुपाया गया कई मन सोना का भंडार था। उसने सभी सोना को निकलवाया और कहा कि यह काफी समय से तहखाने में रखे रहने के कारण ओदा (नमी युक्‍त) हो गया है, इसलिए इसे सुखवाया जाय। मजदूर तेज धूप में गढ़ के अहाते में सुखवाने लगे। शाम के समय राजा ने सारे सोना को इकट्‌ठा करा कर तौलवाया, तो तौल के हिसाब से सोना पूरा मिला। उसे सोचा कि इसका सुखवन नहीं अभी तक नहीं गया। उसने फिर से सुखवाने के लिए कहा। यही क्रम कई दिनों तक चलता रहा। सुबह सोना के टुकड़े धूप में पसारे जाते और शाम को बटोर कर तौलवाया जाता। सोना का वजन हमेशा एक समान हीं मिलता। राजा अपने मजदूरों पर नाराज होकर उन्‍हें तरह-तरह से कष्‍ट देने लगा, क्‍योंकि उसकी समझ से सोना की नमी सूख नहीं रही थी। सभी जानते हैं कि सोना में नमी होती नहीं है। तब अंत में चतुर दीवान ने एक तरकीब निकाली। उसने मजदूरों से कहा कि वे सब अपने पैरों में अलकतरा या चिपकने वाल द्रव लगाकर जायें, ताकि सोना के टुकड़े पैरों में सटकर उस जगह से हट जायें। इस उपक्रम से काफी सोना वहाँ से गायब होने लगा। कुछ दिनों के बाद वजन काफी कम हो गया, तो राजा ने कहा कि अब सोना सूख गया है अब सूखाना बंद करो। सोना सूख जाने की खुशी में उसने मजदूरों को सोना के कई टुकड़े उपहार में दिये।
काव नदी और जंगलों के बीच से रास्ता भोजपुर घाट होते हुए उतरप्रदेश को जोड़ता था।Pic में
काव शाहाबाद के आंतरिक भाग की अंतरप्रवाहित होने वाली सबसे बड़ी नदी थी। यह कैमूर पर्वत के कछुअर खोह से निकल कर राजपुर, सियांवक, विक्रमगंज, दावथ, नावानगर, केसठ, कोरानसरैया, डुमरॉव होती हुई गंगा में मुहाना बनाती थी, परन्‍तु इस नदी का बहाव वर्तमान में मलियाबाग से उत्तर धारा मोड़कर घुनसारी गॉव के पास ठोरा नदी में मिला दिया गया है। रूपसागर, नावानगर, जितवाडिहरी, अतिमी, भदार, बसुदेवा, पिलापुर और नखपुर आदि गाँवों की सीमा से काव की धारा गायब हो गई है। केसठ के पास काव के नाम से एक धारा बहती हुई डुमरॉव की ओर जाती है, फिर भी मुख्‍य धारा नदी- अपहरण की वस्‍तु होकर इतिहास का विषय बन चुकी है।
ठोरा नदी के बारे में कई कथाएं प्रचलित हैं। कहा जाता है कि ठोरा का जन्म उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर के एक ब्राह्माण परिवार में हुआ था। उनका ननिहाल प्रखंड के नोनहर गांव में था। उनके सात मामा थे। ननिहाल में जब किसी मामा के परिवार में खाने के लिए नहीं पूछा गया तो ठोरा ने कुएं में डूबकर जान दे दी। यह देख उनके साथ आए एक नौकर व कुत्ता परिवार में जवाब देने के भय से कुएं में छलांग लगा दी। वहीं से पानी की एक धारा निकली जो अपना विकास करती हुई अपने वेग से पूरे क्षेत्र को भौचक करती गंगा नदी से मिल गई। गंगा के मिलन स्थल पर भी मिथ कथा है। ठोरा का तेज और अतुल जल राशि का प्रवाह गंगा की धारा से चीरकर पार कर जाता, मगर गंगा हाथ जोड़कर खड़ी हो गई। 'हे महाराज नारी के सत्य की रक्षा करें' और ठोरा ने गंगा के साथ प्रवाहित होना स्वीकार किया। एक तीसरी कथा भी है जिसमें लोग बताते हैं कि ठोरा के तट पर जब भी कोई व्यक्ति भूखा और प्यासा दिखता, ठोरा सोने के थाल में छप्पन व्यंजन परोस कर उनके सामने रख देते। लोग खाकर सोने की थाल को नदी में डाल देते थे, किन्तु जब एक राहगीर सोने की थाल लेकर चला गया तब से ठोरा ने भोजन देना बंद कर दिया।
जगरम' भोजपुरी पत्रिका, बक्‍सर, वर्ष- अगस्‍त, 1996, पृष्‍ट- 20, कृष्‍ण मधुमूर्ति का आलेख- ‘ठोरा बाबा (नदी) के मिथक- ‘‘नोनहर के एगो पुरनिया रामनारायण साहु (100 बरिस) तलन कि ई गाँव ठोरा बाबा के ममहर रहे। कवनो कारज-परोजन पर ठोरा एगो पेठवनिया सरूप दुसाध के संगे मामा किहाँ आइल रहले। उनुका सात गो मामा रहले। सभे इहें बझे जे ठोरा दोसरा किहें खात-पीयत होई हें। बाकिर ठोरा सात दिन तक उपासे रह गईले। ममहर के एह कुआदर से ऊ बड़ा मर्माहत भइले आ इनार में कूद गईले। ․․․․․․․․․․․․․․․ किवंदती बा कि ठोरा इनार फारि के गंगाजी में मिले खातिर चलले। जेने-जेने से ऊ गुजरले ऊहे सोता बन गइल, जवन बाद में ठोरा नदी कहाइल। बक्‍सर के पास ठोरा अपना ओही वेग से गंगाजी के धार चीर के पार होखल चहले। त गंगा जी प्रकट होके हाथ जोड़ी कइली कि हमरा महिमा के खेयाल कर। तहार उद्धार त हम करबे करब।''
कर्मनाशा नदी का उद्गम बिहार के कैमूर जिले से हुआ है। यह बिहार के अलावा उत्तर प्रदेश के भी कुछ हिस्‍से में बहती है। यूपी में यह नदी 4 जिलों सोनभद्र, चंदौली, वाराणसी और गाजीपुर से होकर बहती है और बिहार में बक्‍सर के समीप गंगा नदी में जाकर मिल जाती है
इस नदी के बारे में यह भी कहा जाता है कि कोई हरा-भरा पेड़ भी इस नदी को छू ले तो वह भी सूख जाता है
नदी के बारे में एक पौराणिक कथा प्रचलित है। राजा हरिश्चन्द्र के पिता थे राजा सत्यव्रत।पराक्रमी होने के साथ ही यह दुष्ट आचरण के थे। राजा सत्यव्रत अपने गुरु वशिष्ठ के पास गए और उनसे सशरीर स्वर्ग जाने की इच्छा प्रकट की। गुरु ने ऐसा करने मना कर दिया तो राजा विश्वामित्र के पास पहुंचे और उनसे सशरीर स्वर्ग भेजने का अनुरोध किया।वशिष्ठ से शत्रुता के कारण और तप के अहंकार में विश्वामित्र ने राजा सत्यव्रत को सशरीर स्वर्ग भेजना स्वीकार कर लिया।विश्वामित्र के तप से राजा सत्यव्रत सशरीर स्वर्ग पहुंच गए जिन्हें देखकर इंद्र क्रोधित हो गए और उलटा सिर करके वापस धरती पर भेज दिया। लेकिन विश्वामित्र ने अपने तप से राजा को स्वर्ग और धरती के बीच रोक लिया। बीच में अटके राजा सत्यव्रत त्रिशंकु कहलाएदेवताओं और विश्‍वामित्र के युद्ध में त्रिशंकु धरती और आसमान के बीच में लटके रहे थे। राजा का मुंह धरती की ओर था और उससे लगातार तेजी से लार टपक रही थी। उनकी लार से ही यह नदी प्रकट हुई। ऋषि वशिष्ठ ने राजा को चांडाल होने का शाप दे दिया था और उनकी लार से नदी बनी थी इसलिए इसे अपवित्र माना गया साथ ही यह भी धारणा कायम हो गई कि इस नदी के जल को छूने से समस्त पुण्य नष्ट हो जाएंगे।पारामरवंशिय राजपूत राजाओ की भव्य नगरी ।जिसकी राज सत्ता का केंद्रबिंदु राजगढ़ रहा था ।गढ़ आज भी खड़ा है अपनी वैभवशाली अतीत के स्मिर्ति स्वरूप । इसके चारो और लम्बी गड्डी थी जिसमे सुरक्षा की दृस्टि से पानी भरा रहता था ।इसी गढ़ के साथ नगर की ब्यवस्था बड़े सलीके से थी ।सड़के अपनी खाशियत के नाम से जाने जाए थे ।प्राचीन नाम आज भी ज्यो कास त्यों है ।गढ़ के सामने से जो रोड जाती है वह जंगल की और जाती है ,किन्तु किराना के ब्यपारियो का समूह यहाँ कारोबार करता था इसलिए इसका नाम ,,,,जंगल बाज़ार रोड पड़ा है ।
गढ़ से पूरब जो रोड जाती है वह महारानी द्वारा निर्मित छतिया पोखरा तक जाती थी इसलिए। इसका नाम छतिया पोखरा रोड आज भी है ।राजगढ़ से पश्चिम जो रास्ता जाती है उसमे तक़रीबन 1000 मीटर के बाद बर्तन के कारोबारी ठठेरा। वो कसेरा जाती की बस्ती थी जिसमे बर्तन खरीद फरोख्त होते थे ।
हां इसी रोड में हमलोगो को 500 गज की दुरी पर उज्जैनी कायस्थो को बसाया गया था ।जिसमे राज की नौकरी ख़त्म होने बाद बहुत बड़ी संख्या में लोग पलायन कर गए है ।
यह बात नही है की यह टतेरा जाती की बहुलता से यह बर्तन की दुकान वाली रोड है । Pic में डुमराँव राज का 300 वर्ष पूर्व निर्मित शिकारी बंगला है ।
सैकड़ो वर्ष पूर्व यह क्षेत्र घनघोर जंगल था ।हिसंक पशुओँ में बाघ चीता लोमड़ी लकड़बघा सियार रहते थे ।जिनका शिकार महाराजा और उनके परिवार के सदस्य यहाँ आकर करते थे ।
कुछ बाते श्रुतियों के चलते ज़िंदा रहती है ।पर यह भागनावशेष स्वम् में एक परमाणिक सत्य है ।अभी भी इसे गौर से देखने प्रिस्कि क्लाकीर्ति और अकित भीति कशीदाकारी उस काल की उन्नत स्थापत्य कला से परिचित कराती है ।कुछ वर्ष पूर्व इसपर के रंग रोशन दिखाई पड़ते थे जो आज बिलुप्त होते जा रहे है ।इसकी रख रखाव अब नही है ।इसकी महता और भी बढ़ गयी है क्योंकि बगल में एक अति प्राचीन शिव मंदिर है जिसके बगल में मन्दिर से भी प्राचीन एक तलाव है ।सुनते है की इसी तालाव में जानवर पानी पिने आते थे और सन्निकट शिकारी बँगला होने से उनका शिकार आसानी से हो जाता था ।एक तिवारी जी सिपाही थे उनके घुटने का चमड़ा बिलकुल छितराया हुआ था ।कहते थे की सरकार बहादुर के साथ एक बाघ के शिकार के क्रम में बाघ ने जो झपटा मारी उसके हाथे घुटना आ गया और पूरा मांस पंजे से नो च लिया ।शुक्र था की महाराजा बहादुर के हाथो मारा गया ।
अब राज की विरासत मिटटी जा रही है ऐसे में पुरातत्व विभाग को चाहिए की ऐसे स्थलो का प्रमाणिक अभिलेख शोध के लिए रखे ।
अति प्राचीन नवरतन गढ़ की खुदाई की बात समय समय पर होती रहती है और पुरातत्व बिभाग फिर सोयी रहती है ।डुमरांव के चारों दिशा में ऐतिहासिक व प्राचीन मंदिर मौजूद है Pic में इस क्रम में छठिया पोखरा से अनुमंडल कार्यालय जाने वाले मार्ग पर प्राचीन राजेश्वर मंदिर हर व्यक्ति को आर्कषित करता है. मंदिर में रामजानकी, शिव परिवार, गणेश जी, मां दुर्गा और इस मंदिर में जिले का एकलौता सूर्यदेव की प्राचीन प्रतिमा मौजूद है. मंदिर वर्षो से बंद रहा. लेकिन 2009 में इसमें लोगों का आवागमन शुरू हुआ. इस मंदिर का निर्माण श्री 108 मती महारानी वेणी प्रसाद कुमारी ने संवत 1856 में कराया है.    इसको प्रमाण करता है रामजानकी मंदिर के मुख्य दरवाजे के नीचे पत्थर पर लिखा संवत. मंदिर में रामजानकी का मंदिर बीच में, जबकि शिव परिवार, मां दुर्गा मंदिर, गणेशजी और सूर्यदेव का मंदिर चारों दिशा में मंदिर परिसर में मौजूद है. श्रद्धालू चारों ओर परिक्रमा करते है, तो चारों मंदिर में देवी-देवाताओं का दर्शन होता है.    शिव परिवार में जिले में एकलौता मंदिर है, जिसमें हनुमान जी अपने गदा के साथ ढाल के साथ दिख रहे हैं. पंडित मुकुंद माधव मिश्रा ने बताया कि छठिया पोखरा पर लोक आस्था के महापर्व पर भगवान भाष्कर का अध्र्य देते है, लेकिन अधिकतर लोगों को नहीं जानकारी थी कि इस मंदिर में सूर्यदेव की प्राचीन मूर्ति स्थापित है. अभी डुमराँव में कई विरासत की पहचान कायम है ।

Friday, August 2, 2019

पांच सौ वर्ष पहले डुमरांव घने जंगलों से घिरा हुआ था। उस वक्त सड़कें नहीं थी। काव नदी और जंगलों के बीच से रास्ता भोजपुर घाट होते हुए उतरप्रदेश को जोड़ता था।
काव शाहाबाद के आंतरिक भाग की अंतरप्रवाहित होने वाली सबसे बड़ी नदी थी। यह कैमूर पर्वत के कछुअर खोह से निकल कर राजपुर, सियांवक, विक्रमगंज, दावथ, नावानगर, केसठ, कोरानसरैया, डुमरॉव होती हुई गंगा में मुहाना बनाती थी, परन्‍तु इस नदी का बहाव वर्तमान में मलियाबाग से उत्तर धारा मोड़कर घुनसारी गॉव के पास ठोरा नदी में मिला दिया गया है। रूपसागर, नावानगर, जितवाडिहरी, अतिमी, भदार, बसुदेवा, पिलापुर और नखपुर आदि गाँवों की सीमा से काव की धारा गायब हो गई है। केसठ के पास काव के नाम से एक धारा बहती हुई डुमरॉव की ओर जाती है, फिर भी मुख्‍य धारा नदी- अपहरण की वस्‍तु होकर इतिहास का विषय बन चुकी है।
 इसी रास्ते पर चेरो जाति का किला था। चेरों का इस इलाके में आतंक था। लूटमार.तथा बटमारी उनका पेशा था।।कांव नदी के उस पार स्थित चेराें खरवारों का कबीला बावन दुअरियां आज भी वीरान पड़ा है। कहा जाता है कि उस जमाने में उनका टीला काफी समृद्ध था तथा उंचाई पर बसा हुआ था। लेकिन मां डुमरेजनी के श्राप के बाद न सिर्फ चेराें खरवारों का नाश हुआ बल्कि उनका समृद्ध किला बावन दुअरियां भी बंजर हो गया। आज भी उस टीले के क्षेत्र में न तो हल चलता है और न ही खेती होती है। कई बार हल चलाने का प्रयास भी किया गया लेकिन सफलता नहीं मिल सकी है। कहा जाता है कि इस टीले के अंदर कई इतिहास छिपे है। मान्यता तो ये भी है कि इस टीले में काफी धन संपदा भी दबे होंगे.अपने पुरनियों से कहानी सुनी है कि यहाँ एक धनवान चेरों राजा रहता था, परन्‍तु वह कुछ पागल किस्‍म का इंसान था। उसके पास जमीन में लम्‍बे समय से छुपाया गया कई मन सोना का भंडार था। उसने सभी सोना को निकलवाया और कहा कि यह काफी समय से तहखाने में रखे रहने के कारण ओदा (नमी युक्‍त) हो गया है, इसलिए इसे सुखवाया जाय। मजदूर तेज धूप में गढ़ के अहाते में सुखवाने लगे। शाम के समय राजा ने सारे सोना को इकट्‌ठा करा कर तौलवाया, तो तौल के हिसाब से सोना पूरा मिला। उसे सोचा कि इसका सुखवन नहीं अभी तक नहीं गया। उसने फिर से सुखवाने के लिए कहा। यही क्रम कई दिनों तक चलता रहा। सुबह सोना के टुकड़े धूप में पसारे जाते और शाम को बटोर कर तौलवाया जाता। सोना का वजन हमेशा एक समान हीं मिलता। राजा अपने मजदूरों पर नाराज होकर उन्‍हें तरह-तरह से कष्‍ट देने लगा, क्‍योंकि उसकी समझ से सोना की नमी सूख नहीं रही थी। सभी जानते हैं कि सोना में नमी होती नहीं है। तब अंत में चतुर दीवान ने एक तरकीब निकाली। उसने मजदूरों से कहा कि वे सब अपने पैरों में अलकतरा या चिपकने वाल द्रव लगाकर जायें, ताकि सोना के टुकड़े पैरों में सटकर उस जगह से हट जायें। इस उपक्रम से काफी सोना वहाँ से गायब होने लगा। कुछ दिनों के बाद वजन काफी कम हो गया, तो राजा ने कहा कि अब सोना सूख गया है अब सूखाना बंद करो। सोना सूख जाने की खुशी में उसने मजदूरों को सोना के कई टुकड़े उपहार में दिये।
सुदूर गाँवों और संसाधनों के विषय में सुव्‍यवस्‍थित अध्‍ययन करने के लिए ईस्‍ट इंडिया कंपनी के तत्‍कालिन शासकों द्वारा जिले में एक खोज यात्रा आयोजित की गई, जिसका नेतृत्‍व अंगे्रज सर्वेयर फ्रांसिस बुकानन ने सन्‌ 1812-13 में पूरा किया। उसकी यात्रा के समय करंज थाना स्‍थापित हो चुका था। करंज थाना के क्षेत्राधिकार में दनवार और दिनारा परगनों का सारा भाग था। करंज थाना का फैलाव पश्‍चिम में कोचस के उतरी भाग से लेकर पूरब में सोन नदी तक था। इसके उत्तर में डुमरॉव थाना और दक्षिण में बरॉव थाना का भाग था। अपने यात्रा-क्रम में वह इस इलाके के सूर्यपूरा, करंज, कोआथ, बड़हरी, बहुआरा, कोचस आदि जगहों पर पड़ाव डाला तथा भलुनी व घरकंधा का भी दौरा किया। करंज थाना क्षेत्र को लम्‍बा और सँकरा बताते हुए उसे टिप्‍पणी की कि यहाँ पदस्‍थापित दारोगा, काजी और पीरजादा हैं, जो अपना काफी कम समय करंज मुख्‍यालय में देते हैं।17 यहाँ के लोग प्रायः शिव और देवी की पूजा करते हैं और इस क्षेत्र में मुस्‍लिम का कोई उपासना स्‍थल नहीं है। बक्‍सर के ज्ञानी पंडित और भोजपुर राजा के पुरोहित रीतु राज मिश्र द्वारा स्‍थापित करंज में एक मठ भी है, जिसमें बीस साधु रहते हैं। यहाँ के कुछ हिन्‍दू नानक पंथी भी हैं, जिनकी बैठक दिनारा में होती है। जिसमें उपदेश देने के लिए एक अविवाहित युवक जगदीशपुर से हमेशा आता है।17(क) इस क्षेत्र के पश्‍चिमी भाग की भूमि करइल मिट्‌टी से बनी है, जो पैदावार के लिए उपयोगी है। परन्‍तु पूर्वी भाग की भूमि बालू से भरी है। इस क्षेत्र के बड़ा भाग जंगल से अटा है और सभी तरफ लम्‍बे घास ही दिखाई देते हैं। सूर्यपुरा के मकान पुराने कानूनगो के हैं, जिसमें काफी खिड़कियाँ लगती हैं और उसका फैलाव काफी विस्‍तृत है, परन्‍तु उस पर बाहर से प्‍लास्‍तर भी नहीं हुआ है। इस क्षेत्र के घरों के दीवाल मिट्‌टी के हैं, जो फूल से छाये हुए हैं, पर अधिकतर गाँवों में घरों के नाम पर झोपडि.याँ ही हैं। करंज, जहाँ पुलिस मुख्‍यालय है और बाजार भी लगता है, यह केवल 70 घरो का गाँव है। कोआथ इस क्षेत्र का बड़ा शहर है, जहाँ 500 घर हैं। सूर्यपुरा, दावथ, शिवगंज, बड़हरी और कोचस प्रायः 200 घरों के तथा धनगाई और धोसियाँ 150 घरों के गाँव हैं।

घुमक्‍कड़ अपने यात्रा विवरणों में इस क्षेत्र के भलुनी, घरकंधा और जारन-तारन के महत्‍व पर प्रकाश डालता है। कोचस में वह एक ऐसे मुस्‍लिम परिवार को पता है, जिसने उज्‍जैनियों की सेवा करके काफी धन अर्जित किया है। उसके यात्रा वृतांत से हमें ठीक दो सौ वर्ष पहले की सामाजिक - सांस्‍कृतिक - धार्मिक - आर्थिक स्‍थितियों एवं अपने स्‍वभाव में नये गुणों का समावेश करता एक संक्रमणशील समाज का पता चलता है। घरकंधा स्‍थित ज्ञानमार्गी संत दरिया का मठ, गंगाधर पंडित द्वारा भलुनी गाँव के समीप यक्षिणी भवानी के मंदिर का निर्माण तथा सूर्यपुरा स्‍थित दीवान के विशाल भवन की जानकारी उसके विवरणों में है। जंगल के समीप स्‍थित भलुनी के देवी के मंदिर को वह काफी महत्‍वपूर्ण धार्मिक स्‍थल माना है। उसका मानना है कि देवी की मूर्ति चेरो जनजातियों द्वारा निर्मित है। इस देवी की मूर्ति की तुलना वो कलकत्ता की काली मूर्ति से करता है। उसके यात्रा के समय चैत्रमास में वहाँ भारी मेला लगता था, जिसमें दस हजार से ज्‍यादा तीर्थयात्री आते थे। वह अंधेरा होने की वजह से मंदिर में स्‍वयं मूर्ति को देख नहीं पाता और स्‍थानीय पुजारियों द्वारा अपने वंश के संबंध में प्रस्‍तुत कराये गये आँकड़ो पर संदेह व्‍यक्‍त करता है। वह पाता है कि यहाँ के शाकद्वीपीय पुजारी भ्रम पालने और ठगने का काम करते हैं। पुरातात्‍विक महत्‍व पर प्रकाश डालते हुए वह पाता है कि भैरव नाम से पूजित मूर्ति बुद्ध की ध्‍यानमग्‍न मूर्ति है और पश्‍चिमी पोखरे के किनारे प्राचीन मंदिर के अवशेष मुस्‍लिम काल में आक्रांतओं द्वारा ढ़ाहे गये हैं।

यह अंग्रेज यात्री सूर्यपुरा से नौ मील उत्तर जारन-तारन नामक एक ऐसे स्‍थान को पाता है, जो अतीत में चेरो राजा फुलीचंद्र का निवास स्‍थल था। वह यहाँ के प्राचीन घरों के खंडहरों और बसावटों पर काफी गौर करते हुए वर्णन करता है कि यहाँ पर बिखरी पड़ी मूर्तियाँ इतिहास की अनमोल धरोहर हैं। इतिहासकारों का मानना है कि बुकानन द्वारा यह निर्देशित स्‍थल खान की सिमरी के उत्तर पूर्व और नावानगर का तराँव गढ़ ही अवश्‍य है।तुरांव गढ़ जहाँ बुकानन भी गया था अपने मात्रा काल में, वह वर्तमान में तुरांव खास और गुंजाडीह के नाम से जाना जाता है। यहाँ अब भी पुराने सिक्‍के, लम्‍बे चौड़े पके इट्‌टे और जले हुए अन्‍न के अवशेष प्राप्‍त होते हैं। यहाँ के निवासियों में सोना धूप में पकाने, सोना लूटने और सोना मिलने के बारे में अनेक दंतकथायें और सच्‍ची घटनाएँ भी प्रचलित है। स्‍थानीय लोग मानते हैं कि चेरो राजा के वशंज आज भी कभी-कभार इस जगह पर आते हैं।जगरम' भोजपुरी पत्रिका, बक्‍सर, वर्ष- अगस्‍त, 1996, पृष्‍ट- 20, कृष्‍ण मधुमूर्ति का आलेख- ‘ठोरा बाबा (नदी) के मिथक- ‘‘नोनहर के एगो पुरनिया रामनारायण साहु (100 बरिस) तलन कि ई गाँव ठोरा बाबा के ममहर रहे। कवनो कारज-परोजन पर ठोरा एगो पेठवनिया सरूप दुसाध के संगे मामा किहाँ आइल रहले। उनुका सात गो मामा रहले। सभे इहें बझे जे ठोरा दोसरा किहें खात-पीयत होई हें। बाकिर ठोरा सात दिन तक उपासे रह गईले। ममहर के एह कुआदर से ऊ बड़ा मर्माहत भइले आ इनार में कूद गईले। ․․․․․․․․․․․․․․․ किवंदती बा कि ठोरा इनार फारि के गंगाजी में मिले खातिर चलले। जेने-जेने से ऊ गुजरले ऊहे सोता बन गइल, जवन बाद में ठोरा नदी कहाइल। बक्‍सर के पास ठोरा अपना ओही वेग से गंगाजी के धार चीर के पार होखल चहले। त गंगा जी प्रकट होके हाथ जोड़ी कइली कि हमरा महिमा के खेयाल कर। तहार उद्धार त हम करबे करब।''


The opinion of Mr. Beames, in his edition of Sir H. Elliot’s Supplemental 
Glossary on the physical characteristics of the Bhuinhars, is true and worth 
recording : “ They are a fine manly race, with the delicate Aryan type of fea- 
ture in full perfection, yet,” he adds, “their character is bold and overbearing, 
and decidedly inclined to be turbulent,” — a strong expression, which it would 
not be easy to substantiate or justify. 

The following is a list of some of the clans, gotras, and titles of the 
Bhuinhar Brahmans : — 

1745 में राजा होरिल साह ने डुमरांव में अपनी राजधानी बनायी थी. कांव नदी- कभी उद्गम स्थल सोन नदी से निकलकर मलियाबाग, केसठ भाया कोरानसराय के रास्ते डुमरांव की घनी आबादी को स्र्पश करते हुए नया भोजपुर के ताल यानि गंगा नदी में विलीन हुआ करती थी।
डुमरांव नगरपालिका का गठन वर्ष 1868 में किया गया था।स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद नगरपालिका के चुनाव में प्रथम बार कई ऐसे वार्ड सदस्य चुनकर आए। जिन्होंने पुरानी परंपरा को धराशायी कर नया कीर्तिमान स्थापित किया जिसमे भूमिहार ब्राह्मणों की बड़ी संख्या  the। डुमरांव राज के प्रबंधक और उनसे जुड़े़ लोगों को अध्यक्ष तथा उपाध्यक्ष पद पर काबिज होने की परंपरा टूट गई। नई परंपरा में चौधरी धनुषधारी राय को अध्यक्ष बनाया गया। लेकिन, मामला उच्च न्यायालय में जाने के बाद न्यायालय द्वारा चुनाव रद कर दिया गया। उन दिनों नप अधिनियम के तहत राज्य सरकार ने चौधरी बृजबिहारी राय को अध्यक्ष पद पर नियुक्त कर दिया
लगभग पांच सौ वर्ष पहले डुमरांव घने जंगलों से घिरा हुआ था। उस वक्त सड़कें नहीं थी। काव नदी और जंगलों के बीच से रास्ता भोजपुर घाट होते हुए उतरप्रदेश को जोड़ता था। इसी रास्ते पर चेरो जाति का किला था। चेरों का इस इलाके में आतंक था। लूटमार.तथा बटमारी उनका पेशा था।।
कांव नदी के उस पार स्थित चेराें खरवारों का कबीला बावन दुअरियां आज भी वीरान पड़ा है। कहा जाता है कि उस जमाने में उनका टीला काफी समृद्ध था तथा उंचाई पर बसा हुआ था। लेकिन मां डुमरेजनी के श्राप के बाद न सिर्फ चेराें खरवारों का नाश हुआ बल्कि उनका समृद्ध किला बावन दुअरियां भी बंजर हो गया। आज भी उस टीले के क्षेत्र में न तो हल चलता है और न ही खेती होती है। कई बार हल चलाने का प्रयास भी किया गया लेकिन सफलता नहीं मिल सकी है। कहा जाता है कि इस टीले के अंदर कई इतिहास छिपे है। मान्यता तो ये भी है कि इस टीले में काफी धन संपदा भी दबे होंगे।#डुमरांव (Buxar)  ke एक भूमिहार क्रांतिकारी hue he चुटूर राय लेकिन सरकार द्वारा इस भूमिहार क्रांतिकारी के योगदान को लगभग भुला दिया गया कही कोई सड़क उनके नाम पर नहीं है #डुमरांव  के महान भूमिहार  क्रन्तिकारी को नमन डुमरांव के युगल जोड़ी स्वतंत्रता सेनानी चुटूर कुमारी यानी रामकुमार तिवारी और ब्रह्मदेव राय हि

Wednesday, July 31, 2019

बचपन के दिन याद आ गए ! घर - परिवार - ननिहाल में शादी होता था - हम सभी पन्द्रह दिन पहले ही गांव पहुँच जाते थे ! पहला रस्म होता था - 'फलदान' - लडकी वाले कुछ फल इत्यादी लेकर 'वर' के घर जाते थे ! बहुत दिनों तक - बहुत ही कम लोग आते थे - पर धीरे - धीरे यह एक स्टेटस सिम्बल बन गया - लडकी वाले १०० -५० की संख्या में आने लगे ! गांव भर से चौकी , जाजिम , तकिया , तोशक मांगा कर 'दालान' में बिछा दिया जाता था ! मेरे खुद के परिवार  में - मुझे याद है - खुद का 'टेंट हॉउस' वाला सभी सामान होता था ! कई जोड़े 'पेट्रोमैक्स' , टेंट , बड़ी बड़ी दरियां , शामियाना - पर दिक्कत होती थी - चौकी की सो गांव से चौकी आता था और चौकी के नीचे य बगल में 'आलता' से उस चौकी के मलिक का नाम लिखा जाता था ! समय पर लाना और समय पर पहुंचवा देना किसी एक खास मुंशी मैनेजर की जिम्मेदारी होती थी ! मुंशी - मैनेजर के आभाव में गांव घर के कोई चाचा या बाबा !

जैसा 'वर' का हैशियत वैसा 'लडकी वाला' सुबह होते होते लडकी वाले पहुँच जाते ! हम बच्चे बार बार 'दालान' में झाँक कर देखते और 'दालान' की खबर 'आँगन' तक पहुंचाते थे ! ड्राम में 'शरबत घोला जाता था ! हम बच्चे 'ड्राम' के आगे पीछे ! दोपहर में गरम गरम 'गम्कऊआ भात' पात में बैठ कर खाना और आलू का अंचार , पापड़ - तिलौडी और ना जाने क्या क्या ! लडकी का भाई 'फलदान' देता था - उस ज़माने में 'लडकी' को दिखा कर शादी नहीं होती थी सो अब लडकी कैसी है यह अंदाजा उसके 'भाई' को देख लगाया जाता था ! आँगन से खबर आती - जरा 'लडकी' के भाई को अंदर भेज दो -  माँ - फुआ - दादी टाईप लोगों को जिज्ञासा होती थी !

शाम को मुक्त आकाश में खूब सुन्दर तरीके से 'दरवाजा ( दुआर) ' को सजाया जाता ! ५-६ कम ऊँची चौकी को सजा उसके ऊपर सफ़ेद जाजिम और चारों तरफ पुरे गाँव से मंगाई हुई 'कुर्सीयां' ! मामा , फूफा टाईप लोग परेशान कर देते थे - एक ने पान माँगा तो दूसरे को भी चाहिए - किसी को काला - पीला तो किसी को सिर्फ 'पंजुम' , किसी को सिर्फ कत्था तो किसी को सिर्फ चुना वाला पान ! जब तक 'पन्हेरी' नहीं आ जाता - हम बच्चों को की 'वाट' लगी रहती थी !

गांव के बड़े बुजुर्ग धीरे धीरे माथा में मुरेठा बंधे हुए लाठी के सहारे आते और उनकी हैशियत के मुताबिक उनको जगह मिलती थी ! होने वाले 'सम्बंधिओं' से परिचय शुरू होता ! फिर , 'आँगन से सिल्क के कुरता या शेरवानी ' में 'वर' आता ! साथ में 'हजाम' होता था - जिसका काम था - 'वर' का ख्याल रखना - जूता खोलना , हाथ पकड़ के बैठना इत्यादी इत्यादी ! दोनों तरफ के पंडीत जी बैठ जाते - उनमे आपस में कुछ नोक - झोंक भी होती थी जिसको गांव के कोई बाबा - चाचा टाईप आईटम सुलझा देते ! इस वक्त 'लडकी वालों ' के बिच कुछ खुसुर फुसुर भी होती थी - 'वर' की लम्बाई - चेहरा मोहरा इत्यादी को लेकर !

फिर 'फलदान' का प्रोसेस शुरू होता और कुछ मर मिठाई - अर्बत - शरबत भी चालू हो जाता ! फलदान होते ही 'हवाई फायीरिंग' भी कभी कभार देखने को मिला - जब लडके और लडकी वाले आपस में तन गए - मेरा यह मानना है की फलदान होते ही सामाजिक तौर पर दोनों परिवार बराबर के हो गए - तिलक - दहेज की बात अब इसके बाद नहीं होती !

फलदान में लडकी वाला अपनी हैशियत के हिसाब से लडके को देता था ! कुछ कपड़ा या कुछ दर्जन 'गिन्नी- अशर्फी' !

फिर , दोनों पक्ष दालान में बैठ कर आगे का कार्यक्रम बनाते ! तिलक में कितने लोग आयेंगे - बरात कब पहुचेगी - विदाई कब होगा - किसको किसको दोनों तरफ से 'कपड़ा' जायेगा ! तब तक शाम हो जाती ....

और हम बच्चे .."पेट्रोमैक्स' के इर्द - गिर्द गोला बना के बैठ जाते - उसको जलने वाला भी एक व्यक्ति विशेष होता - जो हम बच्चों को बड़ा ही 'हाई - फाई' लगता ! :)
एक जमाना था - लड़का ने 'मैट्रिक' का फॉर्म नहीं भरा की 'बरतुहार' ( अगुआ - शादी विवाह वाले , लडकी वाले ) आना शुरू कर देते थे ! गाँव या टोला में एकता है तो जल्द 'शादी' ठीक हो जाती वर्ना ..लड़का बी ए फेल भी कर जाता और शादी नहीं हो पाती थी ! इन दिनों 'बियाह-कटवा' भी सक्रिय भूमिका में आ जाते हैं ! जब तक वो 'बरतुहार' को आपके दरवाजा से भगा नहीं देते ..उनको चैन नहीं आता है ! तरह तरह के 'बियाह कटवा' .... जैसे एन बारात लगने के समय हल्ला कर दिया या चुपके से 'लडकी वाले' को बोल दिया की ..'लड़का तो ......' अब हुआ हंगामा ...' हंगामा खड़ा कर के वो गायब :या फिर जब दरवाजे पर 'लडकी वाले ' आये हुए हैं तो ..कुछ ऐसा बोल देना की ..'लडकी वाले ' के मन में कुछ शंका आ जाए ! ऐसे 'बियाह कटवा ' गाँव - मोहल्ला - टोला के बाज़ार पर बैठे मिल जाते हैं - जैसे कोई 'बर्तुहार' गाँव - मोहल्ला में घुसा नहीं की उसके पीछे पीछे चल देना ! होशियार 'लडका वाला ' लगन के पहले इस 'बियाह कटवा' को 'सेट' कर के रखता है ताकि वो कुछ कम नुक्सान कर पाए !



खैर , बियाह तय हो गया - अब बात आयी - लेन - देन की , यहाँ भी कुछ कुशल कारीगर होते हैं - आपकी 'कीमत' से बहुत कम में आपका 'माल' बिकवा देंगे :( और खैनी ठोकते आपका ही नमक खा कर - मुस्कुराते चल देंगे ! ऐसे लोगों के दबाब से बचने के लिए - लड़का वाला बंद कमरा में 'कीमत' तय करने लगा वरना वो एक जमाना था तब जब समाज के बड़े बुजुर्ग के बीच में सब कुछ तय होता था ! अच्छे लोग - तिलक - दहेज का पूरा का पूरा लडकी को 'सोना' के रूप में 'मडवा' ( मंडप) पर चढा देते थे - अब 'बैंक' में रख सूद खाते हैं !



अब लडका वाला तिलक - दहेज और अपनी हैशियत के मुताबिक 'ढोल बाजा' आर्तन - बर्तन , कपड़ा - लत्ता ' खरीदने की तैयारी शुरू कर देता है ...अब फिर से कुछ 'आईटम' लोग आपके पीछे लग जायेंगे ! आपका 'बजट' पांच हज़ार का ही तो वो उसको पन्द्रह हज़ार का करवा देंगे - अब 'बेटा' का बियाह है - लोक - लज्जा की बात है - आप बस थूक घोंटते नज़र आयेंगे ! पब्लिक समझेगा की 'फलना बाबु ' तो तिलक लेकर धनिक हो गए - जबकि सच्चाई यह है की - आपकी जमा पूंजी भी 'इज्ज़त ' के चक्कर में लग जाती है !

अब बारात कैसे जायेगा - आप मन ही मन 'बस' का सोच रहे होंगे - आपके शुभ चिन्तक आपको इज्ज़त का हवाला देकर १०-२० कार ठीक करवा देंगे - कार जीप भी ठीक करने वो ही जायेंगे - "सट्टा बैना" भी वही लिखेंगे - जब आप कुछ कम भाडा की बात करेंगे - तो आपके शुभचिंतक बोलेंगे की - अरे ..लईका के बियाह है ...कोई नहीं .फिर से एक बार थूक घोंट लीजिए ! :)

बारात में 'नाच - पार्टी' कैसा जायेगा ? इसका टेंशन एक खास किस्म के लोगों को रहता है - उनको सब डीटेल पता रहता है की ..कहाँ का कौन सा 'नाच' कैसा है ? वैसे लोगों को खबर जाता है - वो बहुत आराम से दोपहर का खाना खाते हुए ..लूंगी में धीरे धीरे टहलते ...खैनी ठोकते ..आयेंगे ! अब वो डिमांड करेंगे ..अलग से गाड़ी घोडा का ..भाई ..नाच ठीक करने जाना है :) कोई मजाक थोड़े ही है :)फलदान में - तिलक में

 - कैसा 'कुक' आएगा ? यह एक अलग किस्म का टेंशन है - कोई सलाह देगा - दोनों कुक अलग अलग होना चाहिए - कोई कहेगा - मुजफ्फरपुर से आएगा - 'फलना बाबू ' के बेटा के बियाह में 'बनारस से ही नाच और कुक' दोनों आया था - अब वो जैसे ही 'फलाना बाबु ' का नाम लिया नहीं की आप भरपूर टेंशन में नज़र आ जायेंगे - बेटा का बियाह और इज्ज़त - जो न करवाए !

अब चलिए ..गहना पर ! घर की महिलायें 'जीने' नहीं देंगी ! अक्सर यहाँ एकता देखा जाता है - आप मन ही मन ५० भर सोना चढाने को सोच रहे होंगे - तब तक कोई बोलेगी - मेरे बियाह में '२०० भर' सोना चढा था - अब देखिये - यहीं पर आपका बजट चार गुना हो गया ! कोई कहेगी - मुजफ्फरपुर का 'सोनार' सब ठग है - अमकी 'पटना ' से खरीदायेगा - अब हुआ टेंशन - पूरा 'बटालियन' पटना जायेगा ! १०० भर सोना के साथ साथ ५-१० नकली अशर्फी - गिन्नी खरीद लेगी सब ! एक सुबह से शाम तक ..सोनार इनको '३ बोतल ' कोका कोला पीला के ..२-४ लाख का सोना बेच देता है और दूकान के सामने 'बलेरो' जीप में बैठा मरद का ब्लड प्रेशर बढ़ा हुआ रहता है !

बनारसी साड़ी का भी एक अलग टेंशन है - मालूम नहीं वो 'लडकी' फिर कब इतना भरी साड़ी दुबारा कब पहनेगी कोई कहेगा १०१ साड़ी जायेगा ...फिर बजट हिलेगा डूलेगा ! फिर टेंशन होगा - अटैची - सूटकेस का ! सब खर्च हो गया - पर ये सूटकेस आर्मी कैंटीन से ही आएगा :

Tuesday, July 30, 2019

श्रीयुत चिंतामणि विनायक वैद्य ने सन 1923 में "मध्ययुगीन भारत, भाग दूसरा नाम की मराठी पुस्तक प्रकाशित की, जिसमें हिन्दू राज्यों का उत्कर्ष अर्थात् राजपूतों का प्रारंभिक (अनुमानत:ई.सन 750 से 1000 ता का) इतिहास लिखने का यत्न किया है| वैद्य महाशय ने उक्त पुस्तक में "राजपूतों के गोत्र" तथा गोत्र और प्रवर", इन दो लेखों में बतलाने का तयं किया है कि क्षत्रियों के गोत्र वास्तव में उनके मूलपुरुषों के सूचक है, पुरोहितों के नहीं और पहले क्षत्रिय लोग ऐसा ही मानते थे|(पृष्ठ-61); अर्थात् भिन्न भिन्न क्षत्रिय वास्तव में उन ब्राह्मणों की संतति है, जिनके गोत्र वे धारण करते है| वि.स. 1133 और 1183 के बीच दक्षिण (कल्याण) के चालुक्य (सोलंकी) राजा विक्रमादित्य (छठे) के दरबार में पंडित विज्ञानेश्वर ने "याज्ञावल्क्यस्मृति" पर "मिताक्षरा" नाम की विस्तृत टीका लिखी, जिसका अब तक विद्वानों में बड़ा सम्मान है और जो सरकारी न्यायालयों में भी प्रमाणरूप मणि जाती है| उस टीका में लिखा है है कि-"राजन्य (क्षत्रिय) और वैश्यों में अपने गोत्र (ऋषिगोत्र) और प्रवरों का अभाव होने के कारण उनके गोत्र और प्रवर पुरोहितों के गोत्र और प्रवर समझने चाहिए| साथ ही उक्त कथन की पुष्टि में आश्वलायन का मत उद्धृत करके बतलाया है कि राजाओं और वैश्यों के गोत्र वही मानने चाहिये, जो उनके पुरोहितों के हों| मिताक्षरा के उक्त अर्थ के विषय में श्रीयुत वैद्य का कथन है कि "मिताक्षराकार ने यहाँ गलती की है, इसमें हमें लेश मात्र भी सन्देश नहीं है (पृष्ठ-60)|

अब हमें यह निश्चय करने की आवश्यकता है कि मिताक्षरा के बनने से पूर्व क्षत्रियों के गोत्रों के विषय में क्या माना जाता था| वि.स. की दूसरी शताब्दी के प्रारंभ में अश्वघोष नामक प्रसिद्ध विद्वान और कवि हुआ, जो पहले ब्राह्मण था, परन्तु पीछे से बौद्ध हो गया था| वह कुकनवंशी राजा कनिष्क का धर्मसंबंधी सलाहकार था, ऐसा माना जाता है| उसके "बुद्धचरित्र" और "सौदरनंद" काव्य कविता की दृष्टि से बड़े उत्कृष्ट समझे जाते है| उसका ब्राह्मणों के शास्त्रों तथा पुराणों का ज्ञान भी अनुपम था, जैसा कि उसके काव्य से पाया जाता है| सौदरनंद काव्य के प्रथम सर्ग में उसने क्षत्रियों के गोत्रों के संबंध में विस्तृत विवेचन किया है, उसका सारांश निम्न है-
"गौतम गोत्री कपिल नामक तपस्वी मुनि अपने माहात्म्य के कारण दीर्घतपस के समान और अपनी बुद्धि के कारण काव्य (शुक्र) तथा अंगिरस के समान था| उसका आश्रम हिमालय के पार्श्व में था| कई इक्ष्वाकु-वंशी राजपुत्र मातृद्वेष के कारण और अपने पिता के सत्य की रक्षा के निमित्त राजलक्ष्मी का परित्याग कर उस आश्रम में जा रहे| कपिल उनका उपाध्याय (गुरु) हुआ, जिससे वे राजकुमार, जो पहले कौत्स-गोत्री थे, अब अपने गुरु के गोत्र के अनुसार गौतम-गोत्री कहलाये| एक ही पिता के पुत्र भिन्न-भिन्न गुरुओं के कारण भिन्न भिन्न गोत्र के हो जाते है, जैसे कि राम (बलराम) का गोत्र "गाग्र्य" और वासुभद्र (कृष्ण) का "गौतम" हुआ| जिस आश्रम में उन राजपुत्रों ने निवास किया, वह "शाक" नामक वृक्षों से आच्छादित होने के कारण वे इक्ष्वाकुवंशी "शाक्य" नाम से प्रसिद्ध हुये| गौतम गोत्री कपिल ने अपने वंश की प्रथा के अनुसार उन राजपुत्रों के संस्कार किये और उक्त मुनि तथा उन क्षत्रिय-पुंगव राजपुत्रों के कारण उस आश्रम ने एक साथ "ब्रह्मक्षत्र" की शोभा धारण की|"

अश्वघोष का यह कथन मिताक्षरा के बनने से एक हजार वर्ष से भी अधिक पूर्व का है, अतएव श्रीयुत वैद्य के ये कथन कि "मिताक्षराकार ने गलती की है", और मिताक्षरा पूर्व क्षत्रिय के स्वत: के गोत्र थे; सर्वथा मानने योग्य नहीं है, और क्षत्रियों नके गोत्रों को देखकर यह मानना कि ये क्षत्रिय उन ऋषियों (ब्राह्मणों) के वंशधर है, जिनके अनेक गोत्र वे धारण करते है, सरासर भ्रम ही है| पुराणों से यह तो पाया जाता है कि अनेक क्षत्रिय ब्राह्मणत्व को प्राप्त हुये और उनसे कुछ ब्राह्मणों के गोत्र चले| परन्तु उनमें यह कहीं नहीं लिखा मिलता कि क्षत्रिय ब्राह्मणों के वंशधर है|

यदि क्षत्रियों के गोत्र उनके पुरोहितों (गुरुओं) के सूचक न होकर उनके मुलपुरुषों के सूचक होते, जैसा कि श्रीयुत वैद्य का मानना है, तो ब्राह्मणों के समान उनके गोत्र सदा वे के वे ही बने रहते और कभी न बदलते, परन्तु प्राचीन शिलालेखादि से ऐसे प्रमाण मिल आते है, जिनसे एक ही कुल या वंश के क्षत्रियों के समय समय पर भिन्न भिन्न गोत्रों का होना पाया जाता है| जैसे- 
- मेवाड़ के गुहिलवंशियों का गोत्र वैजपात है| पुष्कर के अष्टोत्तरशत-लिंग वाले मंदिर में एक एक सती का स्तंभ खड़ा है, जिस पर के लेख में पाया जाता है कि वि.स.1243 माघ सुदि 11 को ठकुरानी हीरवदेवी, ठा. कोल्हण की स्त्री, सती हुई| उक्त लेख में ठा.कोल्हण को गुहिलवंशी और गौतम गोत्री लिखा है|
- काठियावाड़ के गोहिल जो मारवाड़ से वहां गए थे,मेवाड़ के राजा शालिवाहन के वंशज है, अपने आपको गौतम गोत्री मानते है|
- मध्यप्रदेश के दमोह जिले मुख्य स्थान दमोह से गुहिलवंशी विजयसिंह का एक शिलालेख मिला है, जो नागपुर के म्यूजियम में सुरक्षित है| जिसके लेख में गुहिलवंश के चार राजवंशजों के नाम है जिनको विश्वामित्र गोत्री और गुहिलवंशी बताया है|
- चालुक्यों (सोलंकियों) का मूल गोत्र मानव्य था, मद्रास अहाते के विजागापट्टम जिले, जयपुर राज्य के अंतर्गत गुणपुर और मोड़गुला के ठिकाने के सोलंकियों का गोत्र मानव्य ही है, परन्तु लुणावाड़ा, पीथापुर और रीवां आदि के सोलंकियों (बघेलों) का गोत्र भारद्वाज होना वैद्य महाशय ने बतलाया है|

इस प्रकार एक ही वंश के राजाओं के भिन्न भिन्न गोत्र होने के कारण यही जान पड़ता है कि राजपूतों के गोत्र उनके पुरोहितों के गोत्रों के सूचक है, और जब वे अलग अलग जगह जा बसे, तब वहां जिसको पुरोहित माना, उसी का गोत्र वे धारण करते रहे| ऐसी दशा में यही कहा जा सकता है कि राजपूतों के गोत्र सर्वथा उनके वंशकर्ताओं का सूचक नहीं, किन्तु पुरोहितों के सूचक होते थे, और कभी कभी पुरोहित के बदलने पर गोत्र बदल जाया करते थे, कभी नहीं भी| यह रीति उनमें उसी समय तक बनी रही, जब तक पुरोहितों के द्वारा उनके वैदिक संस्कार होकर प्राचीन शैली के अनुसार वेदादि-पठन-पाठन का कर्म उनमें प्रचलित रहा| पीछे तो वे नाम मात्र के रह गए, केवल प्राचीन प्रणालियों के लिए हुए संकल्प, श्राद्ध आदि में गोत्रोच्चार करने के अतिरिक्त उनका महत्त्व कुछ भी नहीं रहा और न वह प्रथा रही, कि पुरोहित का जो गोत्र हो वही राजा भी हो|