Sunday, December 11, 2022

गंगा से वोल्गा तक🎗️

🎗️गंगा से वोल्गा तक🎗️ 1200 वर्ष पूर्व तक रूस में वैदिक संस्कृति के प्रमाण मिलते हैं प्रस्तुति अरविन्द रॉय 1952 के दौरान, सोवियत रूस में, एक पुरातत्वविद्, ओडेसा विश्वविद्यालय के प्रो. वारेली स्मिर्ज़कोफ़ को प्राचीन बेलारूसी शहर कोझिकोड्ज़ के पास कलाकृतियाँ मिलीं वह अनुमान लगाने वाले पहले व्यक्ति थे कि उनके देश की संस्कृति की उत्पत्ति आधुनिक यूरोप के बजाय वैदिक भारत में है रूस के वोल्गा क्षेत्र के एक पुराने गांव में खुदाई(2007) के दौरान प्राचीन विष्णु की मूर्ति मिली यह प्रतिमा 7 वीं शताब्दी ईस्वी की हैं वराह और देवी देवता की मूर्ति भी मिलती रहती है रूस का पुराना धर्म और हिन्दू धर्म करीब-करीब एक जैसे हैं महाभारत में अर्जुन के उत्तर-कुरु तक जाने का उल्लेख है कुरु वंश के लोगों की एक शाखा उत्तरी ध्रुव के एक क्षेत्र में रहती थी उन्हें उत्तर कुरु इसलिए कहते हैं, क्योंकि वे हिमालय के उत्तर में रहते थे महाभारत में उ
त्तर-कुरु की भौगोलिक स्थिति का जो उल्लेख मिलता है वह रूस और उत्तरी ध्रुव से मिलता-जुलता है रूसी भाषा के करीब 2,000 शब्द संस्कृत मूल के हैं वोल्गा घाटी गंगा घाटी की तरह उपजाऊ बड़ी मात्रा में गेहूं प्रदान करती है, और इसमें कई खनिज संपदा भी हैं एक महत्वपूर्ण पेट्रोलियम उद्योग केंद्र.अन्य संसाधनों में प्राकृतिक गैस, नमक और पोटाश शामिल हैं वोल्गा डेल्टा और कैस्पियन सागर मछली पकड़ने के मैदान हैं दोनों में काफी समानता है रूसियों और भारतीयों के बीच प्राचीन संबंधों की स्पष्ट रूप से पुष्टि की गई है रूसी रूढ़िवादी ईसाई धर्म में, भारतीय विष्णु मंदिरों की तरह ही पूजा की जाती है रूसियों ने विज़्नियर एकोरत्स्य विखुन्ह के पर्व का उल्लेख किया है, जो सीधे वैकुंठ एकादशी से संबंधित है

Monday, November 14, 2022

🎗️🎗️महाबोधि विहार या शिव मंदिर🎗️🎗️ भूमिहार ब्राह्मण टिकारी राज और उसके पूर्व मुगल काल में गया में महाबोधि विहार शिव मंदिर था प्रस्तुति अरविंद रॉय महाबोधि विहार के मंदिर को बौद्ध धर्म से से जोड़ने की अंग्रेजों ने पूरी कोशिश की विदेशों में बैठे बौद्ध धर्म अनुयायियों से संपर्क किया 1857 के गदर के समय थोड़ी शांति रही 1880 के दशक में, भारत की तत्कालीन अंग्रेज सरकार ने सर अलेक्जेंडर कनिंघम और जोसेफ डेविड बेगलर के निर्देशन में महाबोधि मंदिर का जीर्णोद्धार करना शुरू किया 17वीं शताब्दी के तिब्बती लामा तारानाथ के भारत में बौद्ध धर्म के इतिहास के अनुसार एक शैव केंद्र बन था महाबोधि मंदिर के गर्भगृह में शिवलिंग की स्थापना नौवीं सदी के आरंभिक काल में पाल नरेश धर्मपाल के शासनकाल के दौरान कराया गया था। धर्मपाल का एक संस्कृत अभिलेख चार सूत्रों में मिला है जिसमें शिवलिंग की स्थापना का उल्लेख मिलता है अभिलेख वर्तमान में राष्ट्रीय संग्रहालय कोलकाता में सुरक्षित रखा गया है।अकबर के दरबारी अबुल फजल कहते हैं, "पिछले लंबे समय से हिंदुस्तान में बौद्धों का कोई निशान नहीं है जब वे 1597 में कश्मीर गए, तो उनकी मुलाकात बौद्ध धर्म को मानने वाले कुछ वृद्ध लोगों से हुई l 1:-pic 1860 महाबोधि विहार फोटोग्राफर जोसेफ डेविड बेगलर

Friday, November 11, 2022

🎗️🎗️लकुलीश की मुर्तिया या बुद्ध की🎗️🎗️

🎗️🎗️लकुलीश की मुर्तिया या बुद्ध की🎗️🎗️ लकुलीश की प्रतिमा तपस्वी के रुप में होती है लकुलीश की मूर्तियों को गौतम बुद्ध तथा तीर्थंकर जैन की मूर्ति भ्रम वश समझ लिया जाता है प्रस्तुति अरविन्द रॉय मौर्य कुषाण काल में पाशुपत मत का प्रसार था पुराणों और तथ्यों से यह जानकारी मिलती है कि भगवान शंकर के अवतार लकुलीश ने शैव परंपरा के अनुसार पाशुपत धर्म की स्थापना की थी और उसका संचालन भी किया था. लिंग पुराण में लकुलीश के चार शिष्यों के नाम कुशिक, गर्ग, मित्र और कोरुषय मिलते हैं. प्राचीन काल में इस संप्रदाय के अनुयायी होते थे, जिनमें मुख्य साधु होते थे. चन्द्रगुप्त द्वितीय के मथुरा स्तंभ अभिलेख से लकुलीश के विषय में जानकारी मिलती है इसका प्राचीनतम अंकन कुषाण शासक हुविष्क की एक मुद्रा पर मिलता है कलचुरि वंश एवं चेदि वंश के शासक भी इस मत के मानने वाले थे कहीं-कहीं पाशुपत एवं शैव को एक दूसरे का पर्याय माना गया है बिहार से लेकर उत्तराखंड राजस्थान तक लकुलीश की प्रतिमा मिलती रहती है 1- भागलपुर जिला के शाहकुंड प्रखंड के समीप लकुलीश की एक प्रतिमा हाल में मिली नवीं-दसवीं शताब्दी (कत्यूरी काल) में पत्थर की बनी 2-लकुलीश की मूर्ति जागेश्वर स्थित लकुलीश के मंदिर में स्थापित थी

Tuesday, November 8, 2022

🎗️ राजा मांधाता,भूमिहार,गाजीपुर🎗️

🎗️ राजा मांधाता,भूमिहार,गाजीपुर🎗️
कस्तुआर,सकरवार,किनवार,दोनवार आदि भूमिहार मूल अत्यंत प्राचीन समय से गाजीपुर में है प्रस्तुति अरविन्द रॉय गाजीपुर कभी गडवाल वंश का गढ़ था इसी वंश के एक राजा मांधाता ने वर्षों तक मुस्लिम आक्रमण से गाजीपुर को बचाए रखा कस्तुआर ,किनवार मूल भूमिहार गढ़वाल काल से गाजीपुर में है इनको गडवाल राजाओ ने भूमि अनुदान दिया था इसके अतिरिक्त आदिवासी जाति भी रहती थी कस्तुआर मिश्र उपनाम का प्रयोग करते थे पूजा पाठ व खेती आय का मुख्य स्रोत था फिशर एंड गिल ने गाज़ीपुर गजेटियर,खंड 13 भाग 2 में लिखा है कि सकरवार भूमिहार पुरण मल ने रेवतीपुर में यज्ञ किया जिसमे कस्तुआर को बुलाकर धोखे से बड़े पैमाने में लोगों को मारा उसके बाद उनकी सारी संपत्ति व जमीनों पर कब्जा कर लिया कुछ कस्तुआर भूमिहार बच गए ये घटना 400 वर्ष पूर्व के आसपास की होगी गहमर के जमीदार पुतूलु खॉ को भी सकरवार लोगो के मार कर उनकी जमीन पर कब्जा कर लिया इस संबंध में बहुत सी कहानी किंवदंती है दोनों पछों की कस्तुआर,किनवार गडवाल वंश के काल में बड़े भू स्वामी बन गए थे राजा मांधाता को तुगलक वंश के सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक के सेनापति सैयद मसूद अल हुसैनी ने पराजित कर मलिक-अल-सादात गााजी की उपाधि हासिल की तुगलक वंश के काल में दोनवार भूमिहार गाजीपुर में थे ये संभव है कि राजा मंधाता के समय दोनवार भी आए हो खरवार जाति के भी छोटे छोटे गढ़ थे युद्ध काल में राजा की सहायता करते थे राजा मांधाता निश्चित रूप से भूमिहारो ने युद्ध में सहायता प्रदान की थी

Monday, September 12, 2022

🎗️🎗️देवघर के पारंपरिक पुजारी🎗️🎗️

f
ji🎗️🎗️देवघर के पारंपरिक पुजारी🎗️🎗️ देवघर अत्यंत प्राचीन पूजा स्थल है इसके संरक्षक आदिवासी राजा थे बाभन पुजारी नियुक्त किया था प्रस्तुति अरविन्द रॉय देवघर के मूल नागरिक आदिवासी, बाभन हैं, बाद में यहां कई समूह निवास करने आए बाभन जाति का उल्लेख अशोक के शिलालेख में है ऐतिहासिक तथ्य कहते हैं कि राजपूत मैथिल ब्राह्मण यहां 13वीं शताब्दी के अंत में और 14वीं शताब्दी की शुरुआत में मिथिला से आए थे बिहार झारखंड की पहली राजपूत रियासत गिद्धौर को माना जाता है गिद्धौर के राजाओं ने पुरानी व्यवस्था बदल दी साथ आए ब्राह्मणों को नियुक्ति दी मुगल काल आते आते मंदिर में छुआछूत होने लगा बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह ने छुआछूत का अंत किया श्रीकृष्ण सिंह स्वयं दलितों के साथ देवघर गए वहां के पंडे- पुजारियों ने श्री बाबू का जमकर विरोध किया। कई लोगों ने उन पर प्रहार भी किया परंतु वे विचलित नहीं हुए और दलितों के साथ देवघर के मंदिर में प्रवेश कर समानता की प्रखर ज्योति जला दी।संथाल परगना का इतिहास 13वीं शताब्दी ईस्वी से मिलता है, उस समय से तैलियागढ़ी मुस्लिम सैनिकों के लिए प्रवेश द्वार बन गया था वे बंगाल से तलियागढ़ी तक आते-जाते रहते थे दिल्ली में गुलाम वंश के शासन के दौरान, इत्यारुदीन बिन बुख्तियार खिलजी ने असम और बंगाल पर अक्रमण के दौरान कूच बिहार के राजा लक्ष्मण के पुत्र तेलियागढ़ी, कूच बिहार से भाग गए और वर्ष 1201 ईस्वी में देवघर आए और यहां अपनी राजधानी की स्थापना की गिद्धौर रियासत राजा बीर विक्रम सिंह ने 1266 में इस रियासत की स्थापना की जो सिंगरौली के बाड़ी के राजा के छोटे भाई थे वंश के नौवें राजा पुराण सिंह द्वारा झारखंड के देवघर में बाबा बैद्यनाथ मंदिर का पुनरोद्धार किया

Monday, May 23, 2022

🎗️🎗️मदारपुर से जाजमऊ कान्यकुब्ज भूमिहार 🎗️🎗️

🎗️🎗️मदारपुर से जाजमऊ कान्यकुब्ज भूमिहार 🎗️🎗️ जाजमऊ सांकृत गोत्र ब्राह्मणो के प्रमुख गांव में शामिल था मदारपुर और जाजमऊ दोनों कानपुर में ही है प्रस्तुति अरविंद रॉय ज्येष्ठ मास के दशहरा पर हर साल गंगा घाटों पर मेले लगते थे जाजमऊ घाट पर भी मेला लगता था वहाँ भी आस- पास के राजा -रईस गंगामाता की जय - जयकार करते हुए स्नान करने आते थे वहाँ कन्नौज का राजा जयचंद भी आते थे ये क्षेत्र गहड़वाल वंश के समय प्रमुख तीर्थ स्थल में शामिल था यहां के प्रमुख ब्राह्मण थे जाजमऊ सांकृत गोत्र के ब्राह्मण मिश्र उपनाम रखते थे संकरवार सांकृत गोत्र के गाजीपुर में जो प्रथम मूल पुरुष कहे जाते हैं काम देव मिश्र और धाम देव मिश्र का उपनाम मिश्र ही है संभवतः ये लोग जाजमऊ में मुस्लिम आक्रमण के बाद गाजीपुर की पलायन किए होंगे कानपुर क्षेत्र में जमींदार कान्यकुब्ज ब्राह्मण को भूमिहार कहां जाता था 20 बिस्वा के असमी थे अर्थात जमींदार ब्राह्मण जाजमऊ में किसी समय घनघोर युद्ध हुआ था यह हिंदू तीर्थ से संबंधित बहुत से साक्ष्य है

Monday, May 16, 2022

🎗️🎗️मनेर प्राचीन हिंदू तीर्थ स्थल🎗️🎗️

🎗️🎗️मनेर प्राचीन हिंदू तीर्थ स्थल🎗️🎗️ मनेर मौर्य काल से लेकर गहड़वाल वंश तक महत्वपूर्ण हिन्दू धार्मिक स्थल रहा है l प्रस्तुति अरविंद रॉय 1811 में अपनी यात्रा के दौरान बुकानन को बताया गया था कि मनेर ब्राह्मण प्रमुख का निवास था जिसे मुसलमानों द्वारा नष्ट कर दिया गया था तीन अलग अलग जगह की pic है,तीनो में समानता दिखाई देती है सिंह के पंजे के नीचे हाथी मनेर की pic में सिंह का निचला जबड़ा चला गया है, जबकि उसके अग्र-पंजे के बीच रखे हाथी ने अपनी सूंड खो दी है मनेर पर बख्तियार खिलजी के आने से पहले मुस्लिम कब्जा हो चुका था बख्तियार खिलजी के अधीन मुसलमानों द्वारा क्षेत्र की विजय 1193 ईस्वी के बाद ही हुई थी पहली Pic मनेर बिहार की है, दूसरी Pic उत्तर प्रदेश के जौनपुर की है , तीसरी Pic कोणार्क सूर्य मंदिर की है