Wednesday, November 13, 2019

आज कल धर्म पर ज्यादा पोस्ट कर रहा हु

धर्म समाज को स्थायित्व प्रदान करने, सामाजिक व्यवस्था को कायम रखने तथा मानव जात के सार्वलौकिक कल्याण तथा प्रगति के लिए होता है।  इन उद्देश्यों की पूर्ति में जो कुछ भी सहायक होता है, वही धर्म है।
धर्म को बचाए रखने का अर्थ है हमारी सभ्यता को जीवित रखना और यदि इस विधि के शासन का अनुपालन करेंगे तो हमारा मानव समाज जीवित रहेगा   चाणक्य,ने कहा था कानून और नैतिकता के बल पर ही विश्व टिका हुआ है हमारे जीवन में इसे चरितार्थ करने के लिए हम सबको इस काम में हाथ बटाना है और अपनी भूमिका निभानी है।
नर-नारी दोनों आज अपनी मर्यादा भूल के शर्मनाक आचरण कर रहे हैं| खुद को फैशनेबल दिखाने की होड़ लगी हुई है| आधुनिकता के नाम पर कैसे-कैसे नंगे नृत्य हो रहे हैं ये किसी से छिपा नहीं है| घातक नशीली वस्तुएं तो आजकल सर्वसुलभ हो चुकीं हैं| देर रात तक नाईट-क्लबों में बजनेवाले बेहूदा किस्म के घटिया गाने किसकी आनेवाली नस्लों को बर्बाद कर रहे है? किसी विदेशी की? बच्चे अपना बचपना तो कब के भूल चुके| दस से बारह साल तक आते-आते न वो सिर्फ "गर्लफ्रेंड" बनाने लगते हैं बल्कि आधुनिक अलादीन के चिराग "मोबाइल" पर ब्लू फ़िल्में भी देखने में लग जाते है| युवाओं ने तो जैसे कसम खा ली है कि अपनी छोड़ किसी की नहीं सुनेंगे| पैदा ही होते हैं इच्छित लड़की से विवाह करने के लिए| भले इसके लिए अपने माँ-बाप तक छोड़ना पड़े| यही बात युवतियों के साथ भी लागू होती है|
आज अगर कठोरतम कानूनों के बावजूद बलात्कार, लूटमार और घरेलू हिंसा के मामले बढ़ रहे हैं तो क्यों? क्यों आज भाई-बहन का पवित्र रिश्ता दागदार हो रहा है? आखिर क्यों चाचा, मामा, ताऊ यहाँ तक की पिता के द्वारा भी बच्चियों के शोषण के मामले सामने आ रहे हैं? क्यों आज गुरु-शिष्या का रिश्ता भी निष्कलंक नहीं रहा? पति-पत्नी के सात जन्मों के रिश्ते को लिव-इन-रिलेशनशिप जैसा वाहियात विचार चुनौती दे रहा है तो इसकी वजह क्या है? एक साली अपने जीजा पर और एक देवर अपनी भाभी पर डोरे डाले, ये सोचे बिना कि उसकी बहन या उसके भाई का क्या होगा तो क्या ये वैध है? लेकिन ये सब भी हो रहा है और इससे महिलाएं और पुरुष दोनों प्रभावित हो रहे हैं|कहने का अभिप्राय सिर्फ इतना है कि आज हमारे समाज में जो भी अपराध हो रहे हैं, जिनके बारे में चिल्लाते-चिल्लाते कई लोगों का गला बैठ गया है, उन सबकी एकमात्र वजह धर्म का ह्रास है| कठोर क़ानून जहाँ मनुष्य को डराता है वहीँ धर्म उसे समझाता है| उसे उन मूल्यों से परिचित कराता है जो मानवता के लिए आवश्यक हैं| धर्म को अपनाते ही मनुष्य अपनेआप मानवता को आत्मसात कर लेता है| उसे तब न किसी कानूनी रोक की जरूरत है न किसी डर की| वो स्वयं भी सुखी रहेगा और जग के कल्याणार्थ सदैव प्रयत्नशील रहेगा| हमेशा प्रसन्न रहेगा और दूसरों को भी प्रसन्न रखेगा| वो सही अर्थों में मनुष्य बन जायेगा|
ये बात सही है कि धर्म के नाम का सहारा ले के कुछ लोगों ने गलत किया और शायद आज भी कुछ लोग इसी में संलिप्त हैं किन्तु ये बात धर्म के सनातन महत्त्व को कभी भी नकार नहीं सकती| कुछ कुंठाग्रस्त लोग अधर्मियों के द्वारा किये गए दुष्कर्मों को आगे कर के धर्म की महत्ता को झुठलाने का प्रयत्न करते रहते हैं और हर बार मुंह की खाते रहते हैं| उनका ये प्रयास न कभी सफल हुआ है और न कभी होगा| उनकी जिंदगी बीत जाएगी यही करते हुए| ऐसे लोगों के लिए मेरे मन में कुछ प्रश्न हैं जिन्हें उनके सामने रखना चाहता हूँ| वो दुनिया की कोई एक चीज ला के दिखाएँ जिसका कुछ स्वार्थी लोगों के द्वारा दुष्प्रयोग न हुआ हो| मैं ही कुछ ऐसी चीजों के नाम बताता हूँ जिनका गलत उपयोग होता है और उन्हें इसका भी त्याग करना चाहिए - (a) साहित्य जो सबको ज्ञान देने के काम आता है,  इसका उपयोग नफरत फ़ैलाने के लिए करते है| अतः वो साहित्य भी छोड़ दें| (b) फ़िल्में जो कभी क्रांति लाती थीं, आजकल अश्लीलता परोस रहीं हैं| फ़िल्में भी न देखें| (c) मोबाइल का भी दुरुपयोग हो रहा है| अपना मोबाइल जल्द से जल्द फेंक दें| (d) प्रेम के नाम पर बहुत यौन-शोषण हो रहा है अतः प्रेम भी बुरी चीज है| (e) जिस इंसानियत की वो माला जपते चलते हैं उसके नाम पर कुछ अनाथालय और विधवाश्रम वेश्यावृति को बढ़ावा दे रहे हैं और सरकार से पैसे भी ऐंठ रहे हैं| आज से इंसानियत का नाम नहीं लेंगे| मैंने ऊपर जिन चीजों का जिक्र किया वास्तव में उनके नाम पर वो सब चीजें हो रहीं हैं| क्या हम उन्हें छोड़ सकते हैं? नहीं, कभी नहीं| और छोड़ना चाहिए भी नहीं| लड़ना किसी भी संरचना में मौजूद बुराई से चाहिए न की उस संरचना से ही|
धर्म मानवता की आत्मा है| ये एक निर्विवाद सत्य है| अतीत में जाकर धर्म की बुराइयाँ ढूँढनेवाले उन्हीं पन्नों को ठीक से देखें, एक बुराई के मुकाबले सौ अच्छाईयाँ दिखेंगी| कुछ गलत हुआ है तो वो धर्म से भटकाव है, धर्म नहीं| वैसी बातों को आप अपने कुतर्कों का आधार नहीं बना सकते| जरूरत है अपनी दृष्टि को पूर्वाग्रहों से मुक्त करने की| हठ त्याग के विचार करने की| तभी कोई सही निर्णय हो पायेगा जो सही मायने में समाज और मानवता का भला करेगा

Saturday, October 26, 2019

डुमरांव में जंगली महादेव का मंदिर है।  संत दानी बाबा जंगल में भगवान की आराधना करते थे। भगवान शिव ने संत को शिवलिंग होने का स्वप्न दिए। शिवलिंग की स्थापना कर पूजा पाठ शुरू हो गया। घने जंगल के बीच शिवलिंग होने के कारण इन्हें जंगली महादेव के रुप में प्रसिद्धि मिली। घने जंगल में संत के पास सौ गायें थीं। संत सौ गायों के दूध से शिवलिंग का अभिषेक करते थे।
 संत के निधन के बाद डुमरांव राज परिवार ने मंदिर के लिए चार बीघा जमीन देकर मंदिर निर्माण का कार्य शुरू कराया था। लेकिन निर्माण के दौरान बाधाएं आने लगी। अंत में निर्माण कार्य रोकना पड़ा था। पुराने लोगों का कहना है कि उस वक्त भगवान शिव ने महाराज को स्वप्न दिया कि मेरे इजाजत के बगैर कोई काम नहीं हो सकता। हुआ ऐसा ही, निर्माण कार्य बंद कर भगवान शिव की आराधना शुरू हुई। जब भगवान शिव की इजाजत मिली, तो डुमरांव राज परिवार ने भव्य मंदिर का निर्माण कराया। आज यहां जंगल नहीं है, लेकिन पेड़ पौधे लोगों को सकून देते हैं।

Thursday, October 17, 2019

🎗️🎗️ गंगा के ब्राह्मण भूमिहार 🎗️🎗️
गंगा के ब्राह्मण भूमिहारों के लिए प्रयुक्त किया जाता है
प्रस्तुति अरविन्द रॉय
चीनी ,अरबी, अंग्रेज लेखकों यहाँ तक कि राजा राम मोहन राय ने भी गंगा के मैदानी क्षेत्र के ब्राह्मणों का ज़िक्र किया है एक प्रकार से भूमिहार विवाह से लेकर श्राद्ध करने वाले पुरोहित थे तो कृषि से लेकर युद्ध तक कोई निश्चित भूमिका नहीं थी समय और परिस्थिति के अनुसार भूमिका बदलती रहती थी आज भी एक कहावत प्रसिद्ध है 👉जहाँ जईसन तहां तईसन, अईसन नहीं त भूमिहार कईसन 👈अगर अगर भारत की सीमाओं पर राजपूत थे तो गंगा के ब्राह्मण भूमिहार गंगा के मैदानी क्षेत्रों में विदेशी हमलावर चाहे वो मुस्लिम रहे या अंग्रेज शासन उसे टिकने नहीं देते थे। जंगलों के इलाके में चेरो खरवार जनजाति का शासन था l मुस्लिम शासकों ने भूमिहार ब्राह्मणों के साथ एक प्रकार से सत्ता समझौता कर लिया था कई विदेशी लेखकों ने गंगा के ब्राह्मणो का ज़िक्र किया है कुछ लोग कन्फ्यूज्ड हो जाते है कौन है गंगा के ब्राह्मण उत्तर प्रदेश और बिहार में ब्राह्मणों की एकमात्र लड़ाकू जाति भूमिहार ब्राह्मण है कान्यकुब्ज और सरयूपारीण के जो भी शास्त्र धारी ब्राह्मण परिवार थे वो सभी भूमिहार ब्राह्मण है गंगा के ब्राह्मण शब्द भूमिहारों के लिए प्रयुक्त किया गया है जैसे मिथिला के मैथिल ब्राह्मण ,गढ़वाल के गढ़वाली  ब्राह्मण कश्मीरी पंडित ,कुमाऊँनी ब्राह्मण उत्तर प्रदेश ,बिहार ,बंगाल के लड़ाकू ब्राह्मणों भूमिहार के लिए गंगा के ब्राह्मण शब्द का प्रयोग हुआ है

Friday, September 6, 2019

Thursday, August 22, 2019

🎗️🎗️कदमकुआं पटना🎗️🎗️
पटना के बौद्धिक,नव धनाढ्य वर्ग का केंद्र
प्रस्तुति अरविन्द रॉय
आजादी के बाद पटना के जिस मोहल्ले का विकास सबसे तेज हुआ, वह है कदमकुआं। साठ-सत्तर के दशक में ज्यादातर पढ़े-लिखे और समाज में हैसियत रखने वाले लोग यहीं बस गए जिसमे भूमिहारों की बड़ी संख्या थी।बड़े -बड़े भूमिहार डॉक्टर, बैरिस्टर संयुक्त परिवार के साथ रहते थे जिनके यहां बाबा जी(ब्राह्मण खानसामा) लोग खाना बनाते थे  यहां अब भी काफी संख्या में डॉक्टर, बैरिस्टर आदि हैं।  यह इलाका जांच, कांच और नाच के लिए जाना जाता था। डॉक्टरों की वजह से जांच से प्रसिद्ध हुआ। चूड़ी मार्केट की वजह से कांच के लिए जाना गया। यहीं पर नृत्य कला मंदिर की नींव पड़ी। इसलिए यह नाच के लिए प्रसिद्ध हुआ। सर गणेश दत्त पाटलिपुत्र हाई स्कूल यही पर स्थित है भिखना पहाड़ी में श्री अरविंद महिला कॉलेज के बगल से जो गली जाती थी जस्टिस नागेंद्र राय अपने भाई जनार्दन राय( जो लालू यादव के वकील रहे) के साथ किराये के मकान में रहते थे प्रथम भूमिहार जज बी0 एन राय का मकान भी कदमकुआं में ही था इसी मोहल्ले में जय प्रकाश नारायण , शत्रुघ्न सिन्हा भी रहते थे।महिला चरखा समिति, कदमकुआं कई राजनितिक गतिविधियों का केंद्र रहा lयहां के कांग्रेस मैदान में स्वतंत्रता सेनानियों की भीड़ इकट्ठा होती थी।
अब बहुत से पुराने मकान मालिक नहीं रहे उनके बच्चे दिल्ली मुंबई में सेटल हो चुके है पुराने मकान तोड़कर अपार्टमेंट बन चुके है l

Tuesday, August 13, 2019

.         🎗️🎗️चबूतरा चौपाल🎗️
हमारे द्वार के ठीक सामने एक चबूतरा है  एक समय चबूतरा बहुत गुलज़ार  रहता था.
प्रस्तुति अरविन्द रॉय
हमारे मोहल्ला में वैसे तो भूमिहारों की संख्या ज्यादा है पर अन्य जाति के लोग भी रहते है आम तौर पर सब में भाईचारा है एक समय हमारे घर के सामने बना चबूतरा मोहल्ला में बैठक का बड़ा केंद्र था.किस के खेत में इस साल बढ़िया पैदावार हुई है, किसकी बेटी की शादी तय करनी है किस्से कहानियां हमने भी भूमिहार समाज से जुड़ी कई किस्से कहानियां यही सुनी मंगला राय से लेकर श्री बाबू तक.ऐसी बात चबूतरे पर आम तौर पर हुआ करती थीं. चबूतरे की परंपरा धीरे-धीरे समाप्त हो गयी. हालांकि  रविवार को चबूतरे पर चौपाल जरूर लगता है. पर समय के साथ उस चौपाल पर होने वाली सामाजिक सरोकार की बातें अब खत्म हो चली हैं.  रेडियो भी बजता था चबूतरे पर मनोरंजन का भी केंद्र हुआ करता था. उस ज़माने में गांव में गिने-चुने घरों में ही रेडियो उपलब्ध था. जिस दिन रेडियो पर कोई खास कार्यक्रम आने वाला होता चबूतरा  गुलजार हो जाता था. गांव के बुजुर्ग और युवा घरेलू काम जल्दी-जल्दी निबटा कर पहुंच जाते थे, फिर घंटो रेडियो में आने वाले अपने पसंदीदा कार्यक्रम को बड़े चाव से सुना करते थे. इस बीच अगर किसी के घर से बुलावा आ जाता तो मानो पहाड़ सा टूट पड़ता. चबूतरे पर सिर्फ सुबह में ही नही बल्कि शाम को भी खूब मजमा लगता था. चबूतरे पर मोहल्ला की सामाजिक गतिविधियां तय हुआ करती थीं.  जगन्नाथ मिश्रा और लालू के समय में गांव में चबूतरे का काफी महत्व था. चबूतरे पर अधिकतर स्वस्थ चर्चा हुआ करती थीं. राजनीति उस वक्त भी हावी थी पर चबूतरे में किसी पार्टी विशेष के पक्ष पर चर्चा करते वक्त लोग हावी नहीं हुआ करते थे. चर्चाओं में इत्मीनान था और छोटे-बड़े सबकी बातों को सुना जाता था. आज भी गांव में कभी-कभार बुजुर्गों और युवाओं के बीच चर्चाएं होती हैं पर उसका स्वरूप चौपाल की तरह नहीं दिखता. आज हर कोई अपने धुन में मस्त है. शादी-ब्याह और पर्व त्योहारों में ही एक दूसरे से मिलना हो पाता है.  समय के साथ गांव में भी शहरी कल्चर हावी होने लगा है. वाट्सअप और फेसबुक ने चौपाल की चर्चाओं पर अपना असर डाला है. शाम की चबूतरे की  चौपाल की जगह अब टेलीविजन ने ली वहीं सुबह की खुशनुमा चर्चाएं अब भागदौड़ भरी जिंदगी में कहीं खो गई है. चौपाल की जगह अब चर्चाओं के लिए गांव के बाजारों पर बने चाय दुकानों पर लोग इकट्ठा होने लगे हैं. चर्चाओं का विषय भी अब कुछ खास नहीं है. कभी क्रिकेट तो कभी फिल्म युवा वर्ग अक्सर इन्ही विषयों पर चर्चा करते दिखाई पड़ते हैं. बुजुर्गों में भी अब चबूतरे आने का चाव नहीं दिखता. जिस चौपाल से गांव की परंपरा और रिवाजों की खुशबू आया करती थी आज बदलते वक्त में  आधुनिकता उसपर हावी होने लगी है. हंसी-ठिठोली के बीच बीत जाती थी शाम  सुबह के साथ शाम में भी मोहल्ला की चौपाल गुलजार हुआ करती थी. लालटेन या ढिबरी की रौशनी में दिनभर के काम से फुरसत पाकर लोग अपने-अपने मुद्दों के साथ चौपाल पर पहुंच जाते थे.  बुजुर्गों की अलग टोली बैठा करती थी और युवाओं की अलग. अगर युवा वर्ग किसी गंभीर मुद्दे पर चर्चा कर रहा हो तो बुजुर्ग उसमें अपने विचार भी रखते. जेनरेशन गैप नहीं था. हंसी मजाक भी काफी संयमित ढंग से हुआ करता था. कभी-कभी किसी की ज्यादा खिंचाई भी हो जाती थी और वह नाराज नहीं होता था.  चौपाल में होते थे कई अहम फैसले  अगर मोहल्ला के किसी व्यक्ति के घर शादी-विवाह का समारोह होने वाला हो, तो उसकी पूरी तैयारी चौपाल में बैठ कर ही कर ली जाती थी. अतिथियों का स्वागत कौन करेगा, पुराने रास्ते की मरम्मती कैसे होगी, मोहल्ला का इनार(कुएं) कैसे साफ किया जायेगा जैसी कई बातें चौपाल पर होने वाली सुबह की चर्चा में ही तय कर ली जाती थीं. शहर के साथ उस समय उतना जुड़ाव नहीं था. साधन की कमी थी और मोबाइल का भी जमाना नहीं था. इस हफ्ते शहर कौन जा रहा है. लोग बताने से घबराते भी नहीं थे और अगर किसी को कोई जरूरी सामान मांगना हो तो उस व्यक्ति को पैसे और लिस्ट थमा दी जाती थी.   हमारे समय में टेलीविजन कम ही था  गांव की चौपाल पर ही देश दुनिया की बातें पता चलती थीं. हम तो चुपचाप बैठ कर बस बुजुर्गों की बातें सुना करते थे. बहुत अच्छा लगता था.  आज भी हमारे गांव में कभी-कभी छुट्टियों में हम एक जगह इकट्ठा होकर चर्चाएं करते हैं. हालांकि अब समय का काफी अभाव है. चबूतरे से बहुत कुछ सीखने को मिलता था. पूरे गांव की खबर भी मिल जाती थी. चबूतरे की परंपरा खत्म हो चली है. युवा वर्ग आधुनिक हो गया है. बड़े-बुजुर्गों के पास बैठने का समय किसी के पास नहीं है. पहले तो खेती-बाड़ी से लेकर शादी ब्याह तक की चरचा चबूतरे पर हुआ करती थी.  हर प्रकार की बातें सुनने को मिलती थी. उन बातों में महज मनोरंजन नहीं होता, बल्कि कई बार कुछ सीखने को मिलता था. सामाजिक ज्ञान का भी बोध होता था.
 Pic सांकेतिक है

Wednesday, August 7, 2019

🎗️🎗️ बिहार में ब्राह्मणों को भूमि अनुदान 🎗️🎗️
बिहार में पाल और गढ़वाल काल में ब्राह्मणों को बहुत जगह भूमि अनुदान मिला
प्रस्तुति अरविन्द रॉय
ब्राह्मण भूमि अनुदान का लाभ उठाने के लिए भारत के उत्तरी भागों से दूसरे भागों में भी जाकर बसने लगे।
पांचवीं से सातवीं शताब्दी के दौरान कई ब्राह्मणों को नेपाल, असम, बंगाल, उड़ीसा और मध्य भारत के साथ उसके आसपास के क्षेत्रों में भूमि अनुदान प्राप्त हुआ।
भूमि अनुदान की प्रथा ईसा की पाँचवीं सदी से तेजी पकड़ती गई । इस प्रथा के अनुसार ब्राह्मणों को सारे कर चुकाने की छूट के साथ भूमि दी जाती थी । गाँवों से राजा जितने भी करों की उगाही करता था उन सबों की उगाही का अधिकार ब्राह्मणों को मिल जाता था ।
इसके अलावा अनुदान-ग्रामों में बसने वाले लोगों पर शासन करने का अधिकार भी दानग्राही पाते थे । सरकारी अधिकारियों और राजा के परिचर दान किए गए गाँवों में प्रवेश नहीं कर सकते थें । ईसा की पाँचवीं सदी तक चोरों को सजा देने का अधिकार राजा सामान्यत: अपने ही हाथ में रखता था परंतु बाद में सभी प्रकार के अपराधियों को सजा देने का अधिकार दानग्राहियों को दिया जाने लगा ।
कृषि अर्थव्यवस्था में बहुत बड़ा परिवर्तन आया । भूस्वामी न खुद अपनी जमीन आबाद कर सकते थे और न ही कर की वसूली कर सकते थे । असल में खेती का काम उन किसानों या बटाईदारों को सौंपा जाता था जो जमीन से जुड़े तो थे पर कानूनन वे उसके हकदार नहीं थे ।इस प्रकार दानग्राही ब्राह्मण किसानों और शिल्पियों से करों की वसूली करने के साथ-साथ अपने गाँव में शांति व्यवस्था का काम भी करने लगे । ब्राह्मणों को दिया गया दान शाश्वत् अर्थात् सदा स्थायी होता था । अत: गुप्तकाल के बाद से राजा की शक्ति बहुत ही घटने लगी ।

मौर्यकाल में कर का निर्धारण और वसूली राजा के कारिंदे करते थे और वे ही शांति-व्यवस्था को देखते थे । परंतु भूमि अनुदानों के फलस्वरूप ऐसे-ऐसे इलाके बन गए जो राजकीय नियंत्रण के बाहर आ गए । अधिकारियों को वेतन के बदले भूमि देने की प्रथा ने राज्य-नियंत्रित क्षेत्र को संकुचित कर दिया
🎉भूमि अनुदान का एक उदाहरण🎉
बगहा पश्चिमी चंपारण बिहार से प्राप्त यह ताम्रपत्र-अभिलेख अबतक प्राप्त भारत के प्राचीनतम ताम्रपत्रों में से एक है. यह लेख 33 पंक्तियों में अंकित है. ताम्रपत्र का आकार 39.8 से.मी. (चौड़ाई) x 38.5 (लम्बाई) है. संस्कृत भाषा का यह अभिलेख देवनागरी की प्राचीन शैली में लिखा गया है. लेख की दो पंक्तियां पत्र के पीछे अंकित हैं. यह ताम्रपत्र राजा सूर्यादित्य द्वारा प्रदत्त है जो राजा माल्यकेतुके वंशज थे. ताम्रपत्र के लेख से ज्ञात होता है कि दानकर्ता राजा सूर्यादित्य के पिता का नाम राजा हंसराज और पितामह का नाम राजा हेलाराज वाराह था. पत्र में राजा द्वारा यशादित्य नाम के ब्राह्मण को वनपल्ली नामक ग्राम के दान में दिये जाने का उल्लेख है. ताम्रपत्र के अनुसार यह वनपल्ली ग्राम, व्यालिसी-विषय नामक क्षेत्र और दर्द-गण्डकी मंडल के अंतर्गत स्थित बताया गया है. ब्राह्मणयशादित्य को सावर्णय गोत्र में उत्पन्न, वात्ठो का पुत्र औरअडवी का पौत्र बताया गया है. ये उसीय नाम के ग्राम के वासी और चेल नामक ग्राम के मूल निवासी थे
दान की तिथि का उल्लेख, शुक्रवार, चैत्र शुक्लपक्ष चतुर्दशी तिथि, 1077 विक्रम संवत है, जो अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार 11 मार्च 1020 ईस्वी की तारीख है.
कार्नवालिस न उन सभी लोगों को जमींदार मान लिया जो 1793में भू-स्वामी थे।इस प्रबंध द्वारा कार्नवालिस ने भूमि को संपत्ति मानकर उसके स्वामी को बेचने,दान देने अथवा दूसरे को हस्तांतरित करने का अधिकार प्रदान कर दिया और ऐसा करते समय सरकार से पूर्व अनुमति लेना आवश्यक नहीं था। 1793 से पहले जमींदार को लगान वसूल करने का अधिकार अवश्य था, किन्तु भूमि को संपत्ति नहीं माना गया था और इसलिए कोई भी जमींदार भूमि को न बेच सकता था, न दान में दे सकता था और न हस्तांतरित कर सकता था।