Tuesday, July 30, 2019

जाति की संरचना को विस्तृत स्वरुप में वर्ण व्यवस्था के साथ जोड़ा जा सकता है। परम्परागत सामाजिक ढ़ाचे में सर्वोच्च स्थान ब्राम्हण जातियों को प्राप्त था परन्तु ब्राह्मण जातियां भी विभिन्न उपजातियों में विभाजित थी। १८ वीं शताब्दी के पूर्व अनेक ब्राम्हण उपजातियाँ मेवाड़ में विद्यमान थी, तथापि १९ वीं शताब्दी में अनेक ब्राह्मण परिवार जीविका की खोज में अन्य राज्यों व प्रान्तों से आकर मेवाड़ में बस गये थे। इसमें बागड़ से बागड़िया, जोधपुर से जोधपुरिया, सिरोही से सिरोहिया आदि मुख्य रहे थे। इसके अतिरिक्त मेवाड़ के महाराणाओं ने भी अनेक ब्राम्हण परिवारों को उनके व्यवसायात्मक कौशल व सामाजिक धार्मिक कर्म कराने हेतु आमंत्रित कर मेवाड़ में बसाया था। गुजरात राज्य से पारख और भ मेवाड़ा ब्राम्हण, उत्तर प्रदेश से कन्नौजिया, सास्वत गौड़, श्री गौड़ आदि इनके उदाहरण हैं। ब्राह्मणों की इन उपजातियों में पारख, भट्ट, कन्नौजिया, सास्वत, गौड़, मेनारिया, पालीवाल आदि मुख्य मानी जाती थी। यह सभी उपजातियाँ मूल में ब्राम्हण जाति होते हुए भी उनके खान-पान तथा वैवाहिक सम्बन्ध न रखने के कारण अलग-अलग जातियाँ कहलाती थी। इन सभी ब्राम्हण जातियां में पारस्परिक खान-पान सम्बन्ध कच्चे और पक्के भोजन झ्र१ करने वाली जातियों की श्रेणी में विभक्त था। पक्का भोजन करने वाले ब्राह्मणों की श्रेणी उच्च मानी जाती थी। पक्के पाकी ब्राह्मण अन्य जातियाँ के यहाँ बना भोजन नहीं खाते थे और कच्चा भोजन करने वाले ठघन्याती ब्राह्मण' द्विज जातियों ( ब्राह्मण, राजपूत तथा वैश्य-महाजन) के यहाँ बना हुआ भोजन ग्रहण कर सकते थे। ब्राह्मण जातियों में मांस-मदिरा सेवन करने वाले जाति-भ्रष्ट माने जाते थे किन्तु इनकी संख्या नगण्य रही थी। ब्राह्मण जाति की आन्तरिक रचना अवंटक, गौत्र तथा प्रवरों में विभक्त थी। वैवाहिक सम्बन्धों के लिए जाति के अन्दर भी गौत्र एवं प्रवर का ध्यान रखा जाता था। एक ही गौत्र व प्रवर के स्री-पुरुष पारस्परिक विवाह नहीं कर सकते थे। किन्तु धीरे-धीरे ब्राह्मणों के आचार-व्यवहारों में विकृतियां आने लगी। खंडित व्यवहारों के कारण सामाजिक राजनीतिक शक्ति को प्राप्त करने मैं यह जाति असमर्थ रही अथवा उनकी अन्तर्नियंत्रण प्रणाली ने सामाजिक नेतृत्व में पछाड़ दिया। फिर भी समाज में प्रतिष्ठा और सम्मान की दृष्टि से ब्राह्मणों का महत्व था।

अध्ययन-अध्यापन, पौरोहित्य, धार्मिक कर्मकाण्डों का सम्पादन, पूजा-पाठ, ज्योतिष कार्य इत्यादि व्यवसाय ब्राम्हणों की परम्परागत वृत्तियाँ मानी जाती थी। शिक्षा का काम करने वाले ब्राह्मणों को सामान्यत: राज्य से वेतन अथवा भूमि दी जाती थी। अधिकांश ब्राम्हणों की अजीविका का मुख्य साधन मंदिरों में देवार्चन व पूजा-पाठ का परम्परागत व्यवसाय था। अधिकांश मंदिरों के साथ, राज्य अथवा सामन्तों द्वारा प्रदान की गई। जागीर अथवा भूमि जुड़ी हुई थीं, जिसका उपयोग ब्राम्हण पुजारी करते थे। इसके अतिरिक्त उन्हे राज्य तथा जनता से नकद चढ़ावा भी मिलता रहता था। वेदाभ्यासी व शास्रपाठी ब्राह्मण सम्पूर्ण राज्य में गिने-चुने रहे थे। ज्यादातर ब्राम्हण निरक्षर श्रेणी में थे और व्यवहारों व नियमों में रुढिवादी थे। समाज के सामाजिक और धार्मिक संस्कारों का सम्पादन कराने के लिए प्रत्येक जाति और कुटुम्ब के पुरोहित हुआ करते थे। बख्शीखाना के ठनाम-बहियों ' से ज्ञात होता है कि ये पुरोहित लोग अपने यजमानों से भेंट; द्रव्य तथा वार्षिक यजमानी प्राप्त करते थे। राज्य अथवा राज्य के सभी ठिकानों के पुरोहित ठबड़ा पालीवाल' ब्राह्मण रहे थे जिन्हें राज्य अथवा ठिकाने की ओर से भूमि का अनुदान मिलता रहता था। महाराणा के पुरोहित राज्य में बड़े पुरोहित कहलाते थे, जिन्हे धार्मिक स्तर पर उच्च एवं प्रथम श्रेणी के सामन्तो के समान प्रतिष्ठा प्राप्त थी। ब्राह्मणों की एक अन्य श्रेणी मृतक संस्कार और क्रिया-कर्म करवाती थी जिन्हे मेवाड़ में ठकर्मान्त्री ब्राह्मण' कहा जाता था। कर्मान्त्री ब्राह्मण, पुरोहितों की श्रेणी से निम्न माने जाते थे। औदिच्य, भट्ट, आमेटा आदि ब्राह्मण ज्योतिष और कथा-वाचक का कार्य करते थे। राज्य द्वारा इस कार्य के लिए द्रव्य और भूमि के साथ-साथ राजज्योतिष, कथा-भट्ट, कथा-व्यास आदि का सम्मान भी दिया जाता था। इसके पश्चात् तृतीय श्रेणी पुजारी और पंचागपाठी ब्राह्मणों की रही हैं। राज्य के प्रत्येक मंदिर का पुजारी ब्राह्मण होता था। पंचागपाठी ब्राह्मण ग्रमांण बस्तियों व शहरों में बस्ती-कार्य (कणिका-भिक्षा) करते थे। आचार्य लोग वैद्यक का कार्य करते थे।

राजकीय सेवाओं में भी ब्राह्मणों की नियुक्ति होती थी। मेवाड़ में पाणेरी ब्राम्हण महाराजाओं के धर्मकोष, रसोड़े (पाकशाला) तथा आंगिया री ओवरी (कपड़ा विभाग) में कार्य करते थे। राज्य पत्रों को संस्कृत में लिखवाने तथा राजनीतिक कार्यों के लिए भ व नागर जाति के ब्राह्मण नियुक्त किये जाते थे। उदाहरण के लिए महाराणा अरिसिंह के प्रधान अमरचन्द बड़वा (सना ब्राह्मण) महाराजा हमीरसिंह के अर्द्धशासन काल तक राज्य की महत्वपूर्ण सेवाओं में रहा। राज्य परिवार के सदस्यों को शिक्षा देने के लिए भी ब्राह्मण नियुक्त किये जाते है जिनको राज्य द्वारा वेतन अथवा भूमि प्रदान की जाती थी। जनाती ड्योढ़ी पर चौबिसा जाति के ड्योढ़ीदार तथा आमेरा जाति के लोग कामदार (लिपिक) का कार्य करते है। सामान्यत: सैनिक सेवा के लिए ब्राह्मणों की नियुक्ति नही की जाती थी, फिर भी अनेक कुलीन वर्ग के ब्राह्मण सेनाधिकारी के पदों पर पैतृक परम्परा के रुप में सेवा करते थे।

मेवाड़ के कुछ ब्राह्मणों में व्यापार-वाणिज्य को पैतृक व्यवसाय के रुप में अपना रखा था।
सामान्यत: श्रीमाली ब्राम्हण दुध बेचने तथा हलवाई का धन्धा करते थे तथा पारख व नागर ब्राह्मण हीरे-जवाहरात परखने व गोटा किनारी बेचने का काम करते थे। भीलवाड़ा के खण्डेलवाल ब्राह्मण व उदयपुर में नागर, पारख व श्रीमालियों के अनेक परिवार अभी भी अपना पैतृक कार्य करते थे। किन्तु वर्त्तमान शताब्दी के प्रथम दो-तीन दशकों तक ब्राह्मणों द्वारा व्यापार-वाणिज्य का कार्य उत्तम नही माना जाता था। ग्रामीण ब्राह्मण कृषि-व्यवसाय को भी अपना चुके थे। धार्मिक और राज्य सेवा के बदले भूमि दी जाती थी, उस भूमि को प्राप्त कर कालान्तर में ये ब्राह्मण लघु कृषक बन जाते थे। कृषि करने वाले ब्राह्मणों को भूमि-कर के मामले में सुविधाएँ प्रदान की जाती थी।

सेवक तथा काटिया नामक दो जातियाँ ब्राम्हणों में अन्य जाति की सेवा तथा अशौच भोजन करनेवाली निम्न जातियाँ मानी जाती रही थीं। सेवक जाति जो जैन मंदिरों में अपनी सेवा देते थे उन्हे कहीं कहीं भोजाक भी कहा जाता था।

१९ वीं शताब्दी में ब्राह्मणों द्वारा विभिन्न व्यवसाय अपना लेने के बावजूद वे प्राचीन परम्पराओं को बनाये रखने पर जोर देते रहे। समाज में ब्राह्मणों को सम्मान प्राप्त था। राजकीय सम्मान के रुप में उन्हें महाराज, विप्रराज, गुसाई आदि सम्बोधनों से सम्बोधित किया जाता था। मेवाड़ के महाराणा ब्राम्हणों को हिन्दू-संस्कृति का संरक्षक और स्वंय को उसका पोषक मानते थे तथा सामन्त भी उन्हे पर्याप्त सम्मान देते थे। विपरांगत ब्राह्मणों को तो बाहर से आमंत्रित कर राज्य में बसाया जाता था।

१९ वीं शताब्दी के अंतिम काल में आधुनिक शिक्षा के प्रसार, नये माध्यम वर्ग का अभ्युदय, प्रशासनिक नियुक्तियों की नीति में परिवर्त्तन तथा अंग्रेजी नियमों के प्रचलन के फलस्वरुप ब्राम्हणों की सामाजिक स्थिति आन्तरिक परिवर्त्तन प्रारम्भ होने लगा तथा ब्राम्हणों के नेतृत्व को चुनौती उत्पन्न हो गयी किन्तु बाह्य रुप में ब्राह्मणों का सामाजिक-धार्मिक प्रतिष्ठा में कोई अन्तर नहीं आया।

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राजपूत : कुल तथा अन्तर्जातीय विवाह व्यवस्था


सामन्ती व्यवस्था पर आधारित समाज में राजपूत जाति का एक विशिष्ट स्थान था। राज परिवार तथा शासक जाति से सम्बंधित होने के कारण ब्राम्हणों के बाद समाज में राजपूतों का काफी वर्च था।

राजपूत अपने को तीन वंश में से किसी एक से सम्बंधित करता था :

१. अयोध्या के राजा राम से उत्पन्न सूर्य वंश
२. द्वारिका के राजा श्रीकृष्ण से उत्पन्न चन्द्र वंश
३. वशिष्ट ॠषि द्वारा आबू यज्ञ से उत्पन्न अग्निवंश

इन्ही तीन वंशों में, जिससे १६ कुल सुर्यवशीय, १६ कुल चन्द्रवंशीय औप ४ अग्निवशीय थे ; सम्पूर्ण जाति वर्गीकृत थी। सामुहिक रुप से ये छत्तीस-कुल कहलाते थे। लेकिन मेवाड़ में केवल १३ कुल ही विद्यमान थे। यह कुल व्यवस्था पुन: खापों और खापों से पैतृक जागीर के मुखिया के नाम पर उप-खापों में विभाजित थी। मेवाड़ के महाराणा के सिसोदिया कुल सदस्य होने के कारण राजपूत जातियों में सिसोदिया कुल का विशेष महत्व था। यदि कही राजपूत-जातीयता का संशय उत्पन्न हो जाता तो राणा (मेवाड़ का शासक) के निर्णय को अंतिम मान लिया जाता था। राज्य के शेष राजपूत कुलों की प्रतिष्ठा का स्तर उनकी जागीरों तथा महाराणा द्वारा दिये जाने वाले सम्मान द्वारा निर्धारित होता था।

विवाह सम्बन्ध की दृष्टि से उच्चोच परम्परा विद्यमान थी। एक ही वंश के राजपूत-कुल परम्पर विवाह का सकते थे। अग्निवंशीय राजपूत का पुत्र सूर्य और चन्द्र की कन्या से विवाह नहीं कर सकता था जबकि सूर्य वंशीय राजपूत पुत्र के लिए अन्य दोनो वंश से सम्बन्ध हो सकते थे। खान-पान व्यवहार में वंश भेद व्याप्त नहीं था।

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दासया चाकर राजपूतों का स्थान

राजपूत जाति श्रेणी में दास अथवा चाकर राजपूतों की इकाई आलोच्य कालीन समाज में एक स्थान रखती थी। राजपूतों द्वारा अन्य जाति का स्रियों को रखैल (उपपत्नी) रखने की प्रथा और निर्धन बच्चे-बच्चियों का
क्रम-विक्रम के रिवाज ने भी इस जाति के उद्भव तथा विकास में योगदान दिया। गोला राजपूतों को उच्चतर राजपूत कन्याओं के विवाह में दहेज के रुप में भेजा जाता था। इस पर राजपूत का प्रतिष्ठा निर्भर करती थी कि उसने कन्या-विवाह में कितने दास-दासी (दावड़े-दावड़ी) प्रदान किये है। इन दास-दासियों का प्रयोग शासक, जागीरदार तथा सम्पन्न राजपूत अपने प्रशासकीय, व्यवस्थापकीय तथा काम-तृप्ति के लिए करते थे। दास-दासियों के विवाह की एक औपचारिकता पुरी कर दी जाती थी जिससे स्वामी से उत्पन्न पुत्र का पिता मात्र विवाहित पति कहलाता रहे।

राजपूत लोग इस जाति का स्रियों के साथ खान-पान में छूत नही मानते थे जबकि पुरुषों के साथ खान-पान व्यवहार की स्थिति भिन्न थी। दास-राजपूतों की सामाजिक प्रतिष्ठा और स्तरीकरण शासक अथवा स्वामी से उसके व्यक्तिगत सम्बन्धों की दूरी और समीपता पर निर्भर रहता था। यह सम्बन्ध ही दासों की आर्थिक स्थिति को व्यक्त करते थे। कई दास राजपूत अपनी योग्यता और स्वामीकृपा के द्वारा जावि में उपेक्षित होते हुए भी अपना सामाजिक-राजनीतिक प्रभाव और सम्मान रखते थे।

राजपूतों के सीमित व्यवसाय तथा उसके परिणाम सामान्यत: राजकीय सेवा अथवा सामन्ती सेवा के अतिरिक्त अन्य किसी भी व्यवसाय को अपनाना राजपूत अपने कुल की प्रतिष्ठा के विरुद्ध समझते थे। अत: प्रशासकीय कार्य और सैनिक सेवा इनके जीविकोपार्जन

का मुख्य साधन था। १८ वीं शताब्धी के पूर्वार्द्ध तक मेवाड़ी राजपूतों ने अपनी मातृभूमि की अखण्डता तथा सार्वभौमिकता के लिए मुगलों तथा मराठों के दाँत खट्टे किये तथा अपने प्राणों का आहुति देकर आदर्श प्रस्तुत किये।

किन्तु १८ वीं शताब्दी के उत्तरार्ध से निरन्तर युद्धों पारस्परिक ईर्ष्या और आर्थिक विपन्नता ने राजपूतों के राजनीतिक संगठन में विघटन उप्पन्न कर दिया अपनी गौरवशाली परम्पराओं को भूलकर कुल वैमनस्य और विद्वेष के अन्धकार में डूबने लगे। अधिकांश समय वे घृणित संगति अथवा देव-दासियों की चापलूसी में नष्ट करते थे। मद्य व अफीम के अति-सेवन के परिणामस्वरुप उनमें कई दुर्गुण उत्पन्न होते गये थे। अपनी झूठी और दम्भपूर्ण प्रवृत्ति एवं जीर्ण गौरव निर्वाह हेतु वे कुछ भी करने को तैयार थे।

अंग्ल-मेवाड़ संधि के बाद राजपूतों के लिए सैनिक सेवा का व्यापक क्षेत्र संकुचित तथा सीमित हो गया। प्रशासकीय सेवाओं में अन्य जातियों का प्रभाव बढ़ जाने के कारण अब राजपूतों की स्थिति में परिवर्तन आने लगा। व्यापार-वाणिज्य तथा धन-सम्पत्ति अर्जित करने के अन्य व्यवसायों में रुचि न होने के कारण अब राजपूतों को कृषि-कार्य अपनाने पर विवश होना पड़ा। ब्रिटिश संरक्षण के पूर्व अधिकांश जागीरदार राजपूत थे और उनकी भूमि पर अन्य काश्तकार खेति करते थे। लेकिन अब इन कृषिकरनी
जागीरदारों की तीन आर्थिक श्रेणियाँ हो गई थी -

१. दूसरों से खेती कराने वाले बड़े जागीरदार
२. स्वयं और दूसरों काश्तकारों के साथ खेती करने वाले मध्यम जागीरदार तथा
३. अपनी भूमि पर स्वयं खेती करने वाले जागीरदार

महाराणा और सामन्तों ने कृषि-कार्य करने वाले राजपूतों को भूमिकर से सम्बंधित अनेक रियायतें दी। अन्य जाति के किसानों की अपेक्षा उनसे भूमि कर कम लिया जाता था तथा अन्य करों में भी छूट दी गई थी। प्रथम श्रेणी के जागीरदारों की आर्थिक स्थिति में कोई परिवर्त्तन नहीं हुआ था किन्तु अन्य दो श्रेणीयों की स्थिति पहले जैसी नहीं रह गयी।

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🎗️🎗️पत्तल में खाना कुल्हड़ में पानी🎗️🎗️
भोजन की परंपरा के बाबत यह भी मालूम होना चाहिए कि दक्षिण भारत में ब्राह्मण भोजन केले के दोनों और पत्तलों पर होता है। भूमिहार समाज में भी यही परंपरा रही और शायद आज भी है गावों में ।
प्रस्तुति अरविन्द रॉय
बच्चे के जन्म से लेकर विवाह तक और विदाई से लेकर मृत्योपरांत भूमिहार समाज के यहाँ भोज के आयोजन की अनिवार्य परंपरा है भूमिहार समाज में बैठकर, पालथी मारकर खाना खाने की परंपरा अतिप्राचीन है, लेकिन अब यह परंपरा खत्म होने के कगार पर है। चाहे शादी हो बर्थ डे पार्टी...बफे होना जरूरी...यह आज समाज में एक तरह से स्टेटस सिंबल बन गया है। पत्तल पर पूड़ी, कचौड़ी, समोसा और ऐसे ही कुछ नमकीन परोसे जाते थे और साथ में सूखी सब्ज़ी, चटनी और अचार होता था, ठेठ पक्की रसोई। कुल्हड़ और कसोरे का अपना विशिष्ट स्थान होता था। कुल्हड़ मोटी परत का मिट्टी का करिया सा प्याला होता जिसमें रसगुल्ले, रबड़ी या गुलाबजामुन जैसे रसदार मिष्ठान परोसे जाते। कसोरा भी मिट्टी की उथली कटोरी होती जिसमें आलू का रस्सा या दही बुँदिया परोसी जाती। पंगत समाप्त होने पर पत्तल, कुल्हड़ और कसोरे कूड़े पर फेंक दिए जाते, साथ में पानी के लिए दिया गया पुरवा भी।
इसमें कोई दोराय नहीं कि हमारी इस सबसे व्यवस्थित परंपरा पर पश्चिमी सभ्यता पूरी तरह से हावी हो चुकी है। शहरों में खड़े होकर खाने का रिवाज तो था ही, लेकिन अब इसकी गिरफ्त में गांव भी आ गए हैं।विवाहों में शराब परोसने की कुसंस्कृति का जन्म हुआ है | गावों में भोज करने की बजाये कुलीन वर्ग पञ्च सितारा  होटलों में भोज का आयोजन कर रहें हैं | धीरे-धीरे गांवों में भी बफे सिस्टम ने अपनी जगह बना ली है।पत्तल में भोजन खाने की परंपरा थी शादी-ब्याह में भी बारातियों को पत्तल में ही भोजन दिया जाता धीरे-धीरे ये परंपरा लुप्त होती जा रही है और इसकी जगह थर्माकोल या प्लास्टिक और कागज से बनी प्लेट ले रही हैं, जो कि स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डालती
किसी भी 🎉  शहरी पार्टी का वह दृश्य.दूल्हा-दुल्हन एक बड़े से हॉल में सजे-धजे सबको अपनी मुस्कान बिखेर रहे हैं। लोग आ रहे हैं, फिर वहाँ पहुँचने लगे हैं, जहाँ भोजन की व्यवस्था है। छोटी-सी जगह, क्षमता से अधिक लोग।(अतिथि भिक्षुक भव:) लखपति ही नहीं, करोड़पति भी एक प्लेट लिए कतार में खड़ा है। कई जगह तो मारा-मारी की स्थिति है। लोग टूट पड़े हैं। बच्चों और बुजुर्गों के लिए कोई अलग से व्यवस्था नहीं। वे भी खड़े-खड़े भोजन कर रहे हैं। कुर्सियों की संख्या अपेक्षाकृत कम। कुल मिलाकर अफरा-तफरी का दृश्य। जिसमें कोई संतुष्ट नहीं है। सभी इसे व्यवस्था को दोष दे रहे हैं और भोजन कर रहे हैं। क्या इसे गिद्ध भोज की संज्ञा नहीं दी जा सकती? जो बलशाली है, वह भरपेट भोजन कर पाएगा। आपने शायद इस ओर ध्यान नहीं दिया होगा कि पहली बार जब हम भोजन लेते हैं, तब सीधे हाथ से लेते हैं, पर दूसरी बार सारी सामग्री बाएँ हाथ से लेते हैं। क्या यह हमारी सभ्यता है?😏मेरी बात कुछ-कुछ समझ में आ रही होगी। आपको बता दूँ कि बुफे डीनर के जन्म के पीछे मूलरूप से मानव की लोभवृत्ति है। यजमान चाहता है कि यहाँ आकर लोग कम खाएँ और बातें अधिक करें। मेहमान कम खाएँ, क्या यह भारतीय परंपरा है? संस्कार यजमान चाहता है कि मेरे यहाँ जो भी मेहमान आए, वह भोजन से पूरी तरह से तृप्त होकर जाए। इसके पीछै यही भावना है कि पहले हमारी यहाँ अतिथि को भोजन के लिए काफी मनुहार की जाती थी। लोग आग्रह कर-करके भोजन कराते थे। इसके पीछे उनकी भावना गलत नहीं थी। जिन्हें याद होगा, वे ये भी याद कर लें, कि भोजन के दौरान किस तरह से घर के बड़े-बुजुर्ग आकर मनुहार करते थे और पूछते थे कि भोजन कैसा बना है? कहीं कोई कमी तो नहीं रह गई है? कितना अच्छा लगता था। अब इस बुफे डिनर में कहीं दिखती है मनुहार? किसने भोजन ग्रहण किया, किसने नहीं, इसकी जानकारी तो यजमान को कतई नहीं होती। वे तो केवल आवभगत में ही लगे रहते हैं। केटरिंग वाले को ठेका दे दिया है, वही देखेगा?
क्या घर में किसी मेहमान के आने पर हम उसे कहते हैं कि किचन में सब-कुछ रखा है, टेबल पर प्लेट पड़ी है, आपको जो अच्छा लगे, उसे ग्रहण कर लें। कोई भी स्वाभिमानी अतिथि इस तरह के व्यवहार को अपना अपमान ही समझेगा। इस तरह से बुफे डिनर में तो अतिथि का इससे भी अधिक अपमान होता है, इस पर कभी ध्यान दिया किसी ने? अपने बचपन के मित्र को भोजन के लिए लाइन पर खड़ा होते देखना किसे अच्छा लगता है? इस पर भला किसी ने सोचा? बुफे डिनर लेना हमारी संस्कृति में तो किसी तरह फीट नहीं बैठता। धर्म के कितने नियम भंग होते हैं, इस पर किसी ने विचार किया? आर्य संस्कृति के अनुसार खड़े-खड़े तो भोजन कतई नहीं किया जाना चाहिए,भूमिहार समाज के  भोजों में अनेको प्रकार की सब्जिया बनाई जाती है | वो भी प्रचुर मात्रा में | भोज में समयानुकूल सब्जियां , फलों ,  मिठाइयों , दही , पापड़ एवं अन्य सामग्रियों की भरमार होती हैं |  भोज में फुलोरा (दही बड़ा) का होना अनिवार्य हैहैं.एक और ख़ास बात यह है की पुरुष और महिला साथ बैठ कर खाने की परंपरा नहीं थी  | साथ जमीन पर बैठकर खाने की परंपरा अब समाप्ति की और है डेकोरेशन पर खासा ध्यान हैं खिलाने पर कम भोज दिखावा बन गया है फिजूलखर्ची  ज्यादा हो रही है l भूमिहार समाज में शादी विवाह में धन की सुरक्षा के लिए हथियार ले जाने की परंपरा रही है
🎗️🎗️कुंडेसर गाँव🎗️🎗️
भूमिहार ब्राह्मण इतिहास का एक सुनहरा अध्याय
बाबू हरि नारायण सिंह, बाबू सिद्धेश्वर प्रसाद सिंह.विजय शंकर सिंह, वीरेंद्र नारायण सिंह, श्री मुरली मनोहर सिंह, डॉ  कृष्ण मुरारी सिंह और डॉ आनंद शंकर सिंह.
का गाँव
प्रस्तुति अरविन्द रॉय
श्री पोथी बंशाउरी' (किनवार वंशावली) में लिखा है... नारायेन सुत चारी प्रथम 'माधो' कही गायो, सुर सरिता तट ग्राम कुंडेसरि नाम कहायो...
कुंडेसर, उत्तर प्रदेश में गाजीपुर जिले का एक गाँव है। राजा भैरव शाह के सबसे बड़े पोते तलकुकर बाबू माधव राय ने गंगा नदी के किनारे पर 1507 ई डी में इसको स्थापित किया था।
राजा मल्हान दीक्षित की पांचवीं पीढ़ी में, राजा भैरो शाह अंतिम व्यक्ति थे जो साहमद्ह से गोंडौर तक चले गए और एक किला का निर्माण किया। वंशावली के रिकॉर्ड के अनुसार कश्यप गोद्रिया 'किश्वर' दीक्षित योद्धा परिवार ने गढ़वादलों के लिए लड़ाइयों की एक श्रृंखला के बाद गिरिपुरी और आसपास के क्षेत्र के चेरु आदिवासी शासकों को ऊपर से उखाड़ दिया। दीक्षित ब्राह्मण और गहद्वीला दोनों दक्षिणापथ से कन्नौज गए थे। गडावादला राजा चंद्रदेव के एक आक्षेप में, यह उल्लेख किया गया है कि वह ब्राह्मण योद्धाओं की मदद से पवित्र शहर काशी के निकट गादिपुरी पकड़े।गहदवाला सेना के अभियान में 'मूलधन दीक्षित' की प्रमुख भूमिका विवरण में 'श्री पोथी बंसुरी' में वर्णित है। एक सद्भावना के संकेत के रूप में, गाहदला राजा ने उन्हें आज़मगढ़,मउ,बलिया और गाजीपुर जिलों में 700 गांवों के अनुदान के साथ 'राजा' का खिताब प्रदान किया। बाद में कबीले तीन मुख्य शाखाओं में विकसित हुईं जैसे बीरपुर, नारायणपुर-कुंडसेर और करीमुद्दीनपुर।
ब्रिटिश राज में कुंडेसर के बाबू गिरिजा प्रसाद नारायण सिंह की संपत्ति में मोहम्मदाबाद परगना मे.लगभग 2,000 एकड़ का क्षेत्र और 3028 रुपये की राजस्व शामिल थी।
मुहम्म्मदाबाद की धरती पर कई पहलवान पैदा हुए हैं, जिन्होंने राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर क्षेत्र का नाम रौशन किया है। जोगा के मंगला पहलवान, कुंडेसर के हरिनारायण सिंह तथा बैरान के झारखंडे राय का नाम कुश्ती के क्षेत्र में सम्मान से लिया जाता है पहलवान  हरिनारायण बाबू हरिनारायण सिंह को क्षेत्र की जनता प्यार से ‘मल्ल बाबू’ कहती थी। लेकिन एक पहलवान होने के बावजूद वो सिर्फ शौकिया तौर पर कुश्ती लड़ते थे। उन्होंने कुश्ती में करियर नहीं बनाया। लोग बताते हैं कि एक बार वो अखाड़े में रियाज के बाद आम के पेड़ की एक डाल पर बैठे हुए विश्राम कर थे कि तभी दूर इलाके से उनका नाम सुनकर एक पहलवान उनसे हाथ मिलाने के लिए आ पहुंचा। उसने बाबू साहब के सामने अपनी ख्वाहिश रखी। बाबू साहब मुस्कराए और बोले कि आप यहां बैठिए तब तक मैं पसीना पोंछ लूं। पहलवान को पेड़ की डाल पर बिठाकर बाबू साहब जैसे ही उतरे कि वो पहलवान पेड़ की डाल के साथ सात फिट उपर लटक गया। पहलवान फौरन डाल से कूदा और बाबू साहब के पांवों में लिपट गया। उसने कहा कि आपका नाम सुना था, आज देख भी लिया। फिर उसने पूछा कि मेरा वजन भी आपके आस-पास ही है फिर ये क्या माजरा है। तब मल्ल बाबू ने पास में जमीन में गड़ी लकड़ी की एक बल्ली में पैर फंसाकर पेड़ की डाली को पकड़कर झुका लिया और दोबारा उसपर बैठ गए। मल्ल बाबू की इस ताकत के सामने वो पहलवान एक बार फिर नतमस्तक हो गया।
कहते हैं एक बार उनके गांव कुंडेसर में दो सांड आपस में काफी देर से लड़ रहे थे। उन दोनों ने इस लड़ाई में कई लोगों को घायल कर दिया था। गांव के लोग लाठी डंडे से उन्हें भगाने की कोशिश में लगे रहे लेकिन वो दोनों सांड लड़ना छोड़ लोगों पर ही झपट पड़ते थे। मल्ल बाबू को खबर मिली। आकर उन्होंने माजरा देखा और दोनों सांडों की सींगे अलग कर उन्हें दो-दो थप्पड़ लगाया। फौलादी थप्पड़ खाकर दोनों सांड वहां से भाग खड़े हुए।
मल्ल बाबू के बारे में एक दूसरा किस्सा ये है कि एक बार वो अपनी रिश्तेदारी में भागलपुर गए थे। वहां उनके रिश्तेदारों के विरोधी उनकी जमीन को जबरन कब्जा कर रहे थे। मना करने पर वो लोग लठैतों के साथ खेत पर पहुंच गए। मल्ल बाबू भी वहां पर थे। समझाने-बुझाने के बावजूद उनमें से एक लंपट किस्म के नौजवान ने मल्ल बाबू की कदकाठी देखकर बोला कि "ये अखाड़ा नहीं है पहलवान, लाठियां पड़ेंगी तो सब समझ में आ जाएगा लेकिन निहत्थे हो इसलिए जान बख्श दे रहे हैं"। इस पर मल्ल बाबू ने पास में लगी बंसवार (बांस के झुरमुट) से एक झटके में एक मोटा बांस उखाड़ लिया और आगे बढ़े। फिर क्या था जो जहां खड़ा था वहीं से भाग खड़ा हुआ।

👑👑विकिपीडिया इनके बारे में लिखा है
In 1885, Hari Narayan Singh was traveling to Vadodara Gujarat on a pilgrimage with his Purohit and Nayee. Due to lack of any transport facility in those days they were moving ahead on foot. After few miles they approached a road through dense forest where British sepoys warned them of danger ahead. They informed Mall babu about a man-eater in that area and suggested to take another route which was much longer. But Hari Narayan Singh didn't pay heed to their warning and moved forward with his companions. When they were in the middle of the jungle suddenly they heard the roar of lion. Mall babu told his Purohit and Nayee to climb on trees immediately and he started waiting for man-eater with a wrestler's prudence. Suddenly lion jumped on him and injured his shoulder ripping his flesh. But vigilant young wrestler got hold of his forelegs and hit him hard in spine. The lion roared and collapsed. His spine was broken and within few minutes he was gasping his last breath.
उत्तर प्रदेश में गाजीपुर जिले के कुंडेसर गांव के रहने वाले हरिनारायण सिंह पिंडदान के लिए नाई और पुरोहित को साथ लेकर गया जा रहे थे। रास्ता घने जंगलों से होकर जाता था। कुछ दूर जाने के बाद ही अंग्रेज सिपाहियों ने आगे जाने से मना किया लेकिन हरिनारायण सिंह नहीं माने। वो अपनी जोखिम पर आगे बढ़े। नाई और पुरोहित जी को उन्होंने अपने पीछे चलने को कहा। थोड़ी दूर जाने के बाद ही शेर की दहाड़ सुनाई दी।

हरी बाबू ने पुरोहित और नाई को फौरन पेड़ पर चढ़ जाने को कहा और खुद उस दिशा में आगे बढ़े जिधर से दहाड़ सुनाई दी थी। उनको शेर को तलाशने में ज्यादा देर नहीं हुई वो बिल्कुल सामने आ गया। ये शेर नरभक्षी हो चला था और इंसान को देखते ही पागल हो उठा। शेर ने हाड़ मांस के इंसान पर छलांग लगा दी। लेकन हरी बाबू का जोरदार थप्पड़ खाकर शेर मुंह के बल गिर पड़ा। पेड़ पर चढ़े नाई की चीख निकल गई। उसे लगा कि शेर बाबू साहब को मार डालेगा। उसने रोते-चिल्लाते बाबू साहब से पेड़ पर चढ़कर जान बचाने की गुहार लगाई लेकिन हरी बाबू ने उसे शांत रहने को कहा। इतने में शेर फिर से उठ खड़ा हुआ। लेकिन जब गुस्से में आकर उसने अपने दोनों पंजो से बाबू साहब पर हमला किया तो हरी बाबू ने उसके दोनों बाजू अपने फौलादी पंजो से जकड़ लिए। शेर मुंह फाड़कर जोर से दहाड़ा लेकिन हरि बाबू ने उसकी कमर पर ऐसी जोरदार लात मारी की उसकी रीढ़ की हड्डी टूट गई। शेर की दहाड़ से जंगल थर्रा उठा।
👑👑मृत्यु

Mall Babu was such a disciplined person that he didn't fell ill in his lifetime. Till the age of 84 years his physique was in greater shape. However, in the age of 85 he got a premonition of his death and according to his wish he was shifted to holy city of Varanasi, where he died on 4 June 1949. Mall Babu had few disciples who carried forward his legacy. Rajnarayan Rai was his most favorite, who floored Imam Bakhs Pahalwan (younger brother of The Great Gama) in Jhariya (Jharkhand) within 5 minutes of bouts. Gama was so shocked with this defeat that he started crying.[3]
Source:-
👑The History of the Gāhaḍavāla Dynasty, Roma Niyogi, Oriental Book Agency, 1959
👑Kinwar Vanshawali, Kashi Nagari Pracharini Sabha, Varanasi
👑 Wikipedia
👑Kundesar has got special mention in the gazetteers of Ghazipur since 1781

Monday, July 29, 2019

किसी कारणवश इस ब्राह्मण समाज से अलग कर दिये गये वा हो गये। बनारस-रामेश्वर के पास गौतम क्षत्रिय अब तक अपने को कित्थू मिश्र या कृष्ण मिश्र के ही वंशज कहते हैं, जिन मिश्रजी के वंशज सभी गौतम भूमिहार ब्राह्मण हैं और भूमिहार ब्राह्मणों से पृथक् होने का कारण वे लोग ऐसा बतलाते हैं कि कुछ दिन हुए हमारे पूर्वजों को गौतम ब्राह्मण हिस्सा (जमींदारी वगैरह का) न देते थे, इसलिए उन्होंने रंज होकर किसी बलवान क्षत्रिय राजा की शरण ली। परन्तु उसने कहा कि यदि हमारी कन्या से विवाह कर लो, तो हम तुम्हें लड़कर हिस्सा दिलवा देंगे। इस पर उन्होंने ऐसा ही किया और तभी से भूमिहार ब्राह्मणों से अलग होकर क्षत्रियों में मिल गये यह उचित भी हैं। क्योंकि जैसा कि प्रथम ही इसी प्रकरण में दिखला चुके हैं कि, मनु, याज्ञवल्क्यादि सभी महर्षियों का यही सिद्धान्त हैं कि ब्राह्मण यदि क्षत्रिय की कन्या से विवाह कर ले, तो उसका लड़का शुद्ध क्षत्रिय ही होगा। क्योंकि उसका मूध्र्दाभिषिक्त नाम याज्ञवल्क्य ने कहा हैं और 'मूध्र्दाभिषिक्तो राजन्य' इत्यादि अमरकोष के प्रमाण से तथा महाभारत और वाल्मीकि रामायण आदि से मूध्र्दाभिषिक्त नाम क्षत्रिय का ही हैं। मनु भगवान् ने तो :
पुत्रा येऽनन्तरस्त्रीजा: क्रमेणोक्ता द्विजन्मनाम्।
ताननन्तरनाम्नस्तु मातृदोषात्प्रचक्षते॥अ.10॥
इत्यादि श्लोकों में उसे स्पष्ट ही क्षत्रिय बतलाया हैं। ये गौतम क्षत्रिय केवल काशी-रामेश्वर के पास दो-चार ग्रामों में रहते हैं।
इसी तरह किनवार क्षत्रियों की भी बात हैं। वे केवल बलिया जिले के छत्ता और सहतवार आदि दो ही चार गाँवों में प्राय: पाये जाते हैं। जिनके विषय में विलियम इरविन साहब (William Iruine Esqr.) कलक्टर 1780-85 ई. ने बन्दोबस्त की रिपोर्ट (Reports on the Settlement) में लिखा हैं कि किनवार ब्राह्मणों के एक पुरुष
कलकल राय ने किसी क्षत्रिय जाति की कन्या से ब्याह कर लिया। जिससे उनके वंशज भूमिहार ब्राह्मणों से अलग हो गये और उन्हीं पूर्वोक्त दो-चार ग्रामों में पाये जाते हैं। इसी तरह दोनवार क्षत्रिय भी किसी कारणवश दोनवार ब्राह्मणों से अलग कर दिये गये। जो मऊ (आजमगढ़) के पास कुछ ही ग्रामों में पाये जाते हैं, परन्तु वहाँ दोनवार ब्राह्मण लोग 12 कोस में विस्तृत हैं। इसी तरह बरुवार क्षत्रियों को भी जानना चाहिए। वे भी केवल आजमगढ़ जिले के थोड़े से ग्रामों में हैं। परन्तु बरुवार नाम के ब्राह्मण तो उसी जिले के सगरी परगने के 14 कोस में भरे पड़े हुए हैं। सकरवार क्षत्रिय भी उसी तरह किसी कारण विशेष ये सकरवार ब्राह्मणों से विलग हो गये, जो गहमर वगैरह दो-एक ही स्थानों में पाये जाते हैं। जबकि सकरवार नाम के ब्राह्मण गाजीपुर के जमानियाँ परगने और आरा के सरगहाँ परगने के प्राय: 125 गाँवों में भरे पड़े हुए हैं। जो दोनवार अयाचक ब्राह्मण जमानियाँ परगने के ताजपुर और देवरिया प्रभृति बीसों ग्रामों में पाये जाते हैं, उन्हीं में से कुछ लोग किसी वजह से निकलकर क्षत्रियों में मिल गये और गाजीपुर शहर से पश्चिम फतुल्लहपुर के पास दो-चार ग्रामों में अब भी पाये जाते हैं। इसी प्रकार अन्य भी भूमिहार ब्राह्मणों के से नाम वाले क्षत्रियों को जानना चाहिए।
सारांश यह हैं कि सभी दोनवार आदि नाम वाले क्षत्रियों की संख्या बहुत ही थोड़ी हैं, परन्तु इन नामों वाले भूमिहार ब्राह्मणों की संख्या ज्यादा हैं। इससे स्पष्ट हैं कि इन्हीं अयाचक ब्राह्मणों में से वे लोग किसी कारण से विलग हो गये हैं। इसीलिए उनकी दोनवार आदि संज्ञाएँ और गोत्र वे ही हैं जो दोनवार आदि नाम वाले ब्राह्मणों के हैं। इस संख्या वगैरह का पता हमने स्वयं उन-उन स्थानों में भ्रमण कर और जानकार लोगों से मिलकर लगाया हैं। जिसे इच्छा हो वह प्रथम जाँच कर ले, पीछे कुछ कहे या लिखे। यद्यपि सकरवार क्षत्रिय आगरे के आस-पास तथा अन्य प्रान्तों में बहुत पाये जाते हैं, तथापि उन लोगों का गहमर आदि ग्रामों वाले सकरवार क्षत्रियों से कुछ सम्बन्ध नहीं हैं। क्योंकि ये सब सकरवार कहे जाते हैं और आगरे वाले सिकरीवार; कारण कि उनका आदिम स्थान फतहपुर सिकरी या सीकरी हैं और इनका स्थान सकराडीह हैं। साथ ही, आगरे वालों का गोत्र शाण्श्निडल्य हैं और गहमर वालों का सांकृत, जैसा कि सकरवारों के निरूपण में आगे दिखलायेंगे। अत: सकरवारों को सिकरीवारों से पृथक् ही मानना होगा।
बहुत जगह अनेक अंग्रेजों ने यह लिखा हैं कि जब बहुत से भूमिहार (ब्राह्मणों) और राजपूतों के गोत्र एक ही हैं, जैसे किनवार या दोनवार
56वें पृष्ठ में लिखा है कि : “A Bhumihar family of Pande Brahmins settled at Byreah in Doab pergannah, have for generations past been the Tehseeldars or land agents of the Domaraon faimly.”
अर्थात ‘पांडे कहलानेवाले ब्राह्मणों में से एक भूमिहार ब्राह्मण वंश, जो बलिया जिले के दोआब परगने के बैरिया गाँव में प्रथम से ही आ कर बसा है, बहुत पीढ़ियों से डुमराँव राज्य का तहसीलदार होता चला आया है।’

Sunday, July 28, 2019

🎗️🎗️बुफ़े सिस्टम भोज परंपरा का पश्चिमीकरण🎗️🎗️
किसी विशेष अवसर पर सामूहिक भोजन की परंपरा भूमिहार समाज में प्रचलित है
प्रस्तुति अरविन्द रॉय
अपने अनूठेपन और वृहत स्थर पर पालन होने के कारण भूमिहार समाज में भोज की परंपरा वाकई अनोखी थी  | यहाँ भोज को एक मायने में समाज में आपके बढ़ते रुतबे के परिपेक्ष्य में भी देखा जाता है | यानी जितना बड़ा भोज उतना ज्यादा आपका यश ! बच्चे के जन्म से लेकर विवाह तक और विदाई से लेकर मृत्योपरांत यहाँ भोज के आयोजन की अनिवार्य परंपरा है | भारत में भले ही मृत्यु भोज की प्रासंगिकता पर बहस छिड़ी हो किन्तु इससे भूमिहार समाज के बहुसंख्य जन मानस पर कोई असर नहीं पड़ता भूमिहार समाज के  भोजों में अनेको प्रकार की सब्जिया बनाई जाती है | वो भी प्रचुर मात्रा में | भोज में समयानुकूल सब्जियां , फलों ,  मिठाइयों , दही , पापड़ एवं अन्य सामग्रियों की भरमार होती हैं |  भोज में फुलोरा (दही बड़ा) का होना अनिवार्य है | इसके अलावा दही का वितरण सबसे अंत में किये जाने की भी परंपरा है | गोंटिया-दयाद भी भोज में सहायता करते पानी पिलाने में अन्य कार्यों हेतु (लड़की की शादी में भोज में लोग आर्थिक मदद तक कर देते थे ).आपने अगर पहले भोजन कर लिया है तो भी यह अपेक्षा की जाती है की जब सभी खाकर उठने लगें तभी आप भी उठें | गोंटिया-दयाद के लोग सबके खाने के बाद अंत में  भोजन करते भोज में लोग पंक्तियों में साफ़ सुथरे दरी बिछाये गए ज़मीन पर बैठाये जातें  |  पत्तल में भोजन खाने की परंपरा थी शादी-ब्याह में भी बारातियों को पत्तल में ही भोजन दिया जाता lधीरे-धीरे ये परंपरा लुप्त होती जा रही है और इसकी जगह थर्माकोल या प्लास्टिक और कागज से बनी प्लेट ले रही हैं, जो कि स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डालती हैं.एक और ख़ास बात यह है की पुरुष और महिला साथ बैठ कर खाने की परंपरा नहीं थी  | भोज खाने के बाद लोगों के बीच पान सुपाड़ी बांटने की रिवाज है एक पश्चिम परंपरा जो हाल में जुडी है  बच्चा जैसे-जैसे बड़ा होता है उसकी उम्र भी बढती जाती है अगल – बगल के लोगों को दिन में ही जन्म दिन का निमंत्रण भेजा जाता है | शाम को  लोग बच्चे के घर पर जुटते है | बच्चे के द्वारा केक काटा जाता है और मेहमानों में वितरण किया जाता है  | बच्चे को लोग अपनी सामर्थ्य के अनुसार उपहार देते हैं | खाना खाते हैं |  खाना खा कर लोग घर चले जाता हैं |बदलते दौर में भोज का भी स्वरुप भूमिहार समाज में बदल रहा है | जहाँ पहले पत्तल/केले के पत्ते बिछाकर ज़मीन पर भोज कराया जाता था अब लोग कुर्सी टेबल लगाकर प्लास्टिक प्लेट्स का इस्तेमाल करने लगें है | विवाहों में शराब परोसने की कुसंस्कृति का जन्म हुआ है | गावों में भोज करने की बजाये कुलीन वर्ग पञ्च सितारा  होटलों में भोज का आयोजन कर रहें हैं | पारंपरिक भोज की जगह बुफ़े सिस्टम ले रहा है |साथ जमीन पर बैठकर खाने की परंपरा अब समाप्ति की और है डेकोरेशन पर खासा ध्यान हैं खिलाने पर कम भोज दिखावा बन गया है फिजूलखर्ची  ज्यादा हो रही है भात दाल के साथ भी भोज हो सकता है l गोंटिया-दयाद पहले की तरह श्रमदान नहीं करते कुछ गोंटिया तो मुंह फुला कर बैठ जाते है अब मनाये इनको
व्याघ्रसर (बक्सर) और गाधिपुरी (गाजीपुर) के बीच गंगा के प्रवाह ने लगातार अपनी दिशा बदली है। इस क्रम में न जाने कितने गांवों को अपने मूल स्थान से हटकर दूसरी जगह विस्थापित होना पड़ा है तो कई गांवों को अपनी पहचान ही नए सिरे से स्थापित करनी पड़ी। आज हमलोग अपनी आंखों के सामने 'सेमरा' गांव को गंगा की धारा में समाते हुए देख रहे है। कुछ ऐसा ही हुआ था एक जमाने में कुंडेसर गांव के साथ। लेकिन कुंडेसर के साथ उल्टा हुआ था। जो गांव शेरशाह के जमाने में गंगा के किनारे बसा था उस कुंडेसर को छोड़ती हुई गंगा मुगलकाल में काफी दूर बहने लगी जहां बीच के उपजाऊ इलाके को 'सकरवार वंश' ने शेरपुर गांव समूह को बसाकर आबाद किया। 'श्री पोथी बंशाउरी' (किनवार वंशावली) में लिखा है... नारायेन सुत चारी प्रथम 'माधो' कही गायो, सुर सरिता तट ग्राम कुंडेसरि नाम कहायो.... Note : नारायण शाह (नारायणपुर) के ज्येष्ठ पुत्र बाबू माधव राय जी (शेरशाह के समकालीन) ने कुंडेसर गांव को बसाया था। |