Saturday, August 15, 2026

राजा कर्णदेव दोनवार भूमिहार

राजा कर्णदेव एवं बेरू राजा दोनवार तथा डोमकटार भूमिहार शासकों का ऐतिहासिक व पुरातात्विक इतिहास प्रस्तुति - अरविन्द रॉय सन 1809 में, अर्थात् इन राजाओं के काल के लगभग 600 वर्ष बीत जाने के बाद भी, बुकानन ने दर्ज किया कि स्थानीय समाज में राजा कर्णदेव, बेरू राजा और उनके सहयोगियों का स्थान अत्यंत सम्मानजनक था और उन्हें स्थानीय आबादी द्वारा पूजनीय माना जाता था। 12वीं और 13वीं शताब्दी का समय भारतीय इतिहास का एक महान संक्रांति काल था। जब बंगाल के अंतिम सशक्त हिन्दू साम्राज्य सेन वंश का पतन हो रहा था और उत्तरी बिहार में राजपूत प्रमुखों की सत्ता अभी पूर्णतः स्थापित नहीं हुई थी, तब संपूर्ण उत्तरी भारत में राजनीतिक अनिश्चितता का माहौल था। फ्रांसिस बुकानन अपने सर्वे में लिखते हैं कि इसी शून्यता के दौर में कोसी और मिथिलांचल के क्षेत्र में कई स्थानीय ब्राह्मण सामंतों और कबीलों ने अपनी स्वतंत्र सत्ता पुनः स्थापित की। इनमें दो प्रमुख ब्राह्मण कबीलों का उन्होंने विस्तृत वर्णन किया है, जिन्हें ऐतिहासिक और सामाजिक संदर्भ में भूमिहार ब्राह्मण राजा माना जाता है - दोनवार (दौनवार/द्रोणवार) और डोमकटा (डोमकटार) 2. दोनवार राजवंश: राजा कर्णदेव और उनका साम्राज्य वंशानुगत पहचान: राजा कर्णदेव 'दोनवार' कबीले के प्रमुख थे। परंपराओं के अनुसार इस वंश के लोग आचार्य द्रोणाचार्य के वंशज माने जाते हैं, जिन्हें वर्तमान में दौनवार या द्रोणवार भूमिहार कहा जाता है। यह दोनवार / द्रोणवार भूमिहार का ही मूल रूप है। पारिवारिक पृष्ठभूमि: कर्णदेव इस कबीले के सबसे प्रभावशाली प्रमुख थे। उनके तीन सहोदर भाई थे - वल्लभ , दुर्लभ और त्रिभुवन । इन चारों भाइयों ने मिलकर संपूर्ण कोसी क्षेत्र का शासन प्रबंध संभाला और क्षेत्र को बाहरी आक्रमणों से सुरक्षित रखा। भौगोलिक विस्तार: इनका साम्राज्य कोसी नदी के पश्चिमी और उत्तरी तट पर फैला था, जो वर्तमान में बिहार के सहरसा, मधेपुरा, सुपौल, अररिया और पूर्णिया के पश्चिमी भू-भाग के अंतर्गत आता है। यहाँ आज भी इनके बनवाए प्राचीन गढ़, मिट्टी के कोट, और विशाल तालाबों के अवशेष मौजूद हैं। शासनकाल का प्रामाणिक निर्धारण: राजा कर्णदेव के काल को लेकर बुकानन ने तीन मान्यताओं का उल्लेख किया है: 1. लक्ष्मण सेन से पूर्व 2. लक्ष्मण सेन के समकालीन और करदाता 3. लक्ष्मण सेन के उत्तरकाल में इसका समाधान बुकानन ने स्थानीय मुख्य ज्योतिषी पंडित सोनभद्र मिश्र और नेपाल की तराई (मोरंग) के राजाओं की हस्तलिखित वंशावली के आधार पर किया। दोनों स्रोतों के अनुसार कर्णदेव लक्ष्मण सेन (1179-1206 ई.) के पतन के बाद हुए। इसी साक्ष्य पर आधुनिक इतिहासकार इनका काल 1200 ई. से 1220 ई. (13वीं सदी की शुरुआत) निर्धारित करते हैं। राजा कर्णदेव के पुरातात्विक साक्ष्य - सिकलकीगढ़ पूर्णिया क्षेत्र स्थित 'सिकलकीगढ़' को राजा कर्णदेव का मुख्य प्रशासनिक केंद्र माना जाता है। • विस्तार: लगभग 200 एकड़ में फैला विशाल आयताकार किला परिसर • सुरक्षा: मिट्टी और ईंटों की 3 मीटर ऊँची व 4-5 मीटर चौड़ी प्राचीर, उत्तर व पश्चिम में दोहरी सुरक्षा खाइयां , तथा 3 एकड़ में फैले मुख्य दुर्ग के अवशेष • स्थापत्य: खेतों से प्राप्त पकी मिट्टी की मूर्तियाँ व मृदभांड, प्राचीन शिव मंदिर के नक्काशीदार पत्थर के दरवाजों की चौखट और शिवलिंग - जो उस दौर की समृद्ध वास्तुकला को प्रमाणित करते हैं। 3. डोमकटा राजवंश: बेरू राजा और उनका वंश मूल पाठ भौगोलिक क्षेत्र: जिले का उत्तर-पूर्वी हिस्सा - जो वर्तमान में अररिया, किशनगंज और भारत-नेपाल सीमांत क्षेत्र के अंतर्गत आता है। प्रमुख शासक: बेरू राजा - डोमकटा कबीले के अत्यंत प्रभावशाली और शक्तिशाली प्रमुख। कुटुंब एवं उत्तराधिकारी: बेरू राजा के तीन भाई/रिश्तेदार थे - सहसमल , बली और बारीजन । बारीजन का पुत्र कुंज बिहारी आगे चलकर स्वयं एक ख्यातिप्राप्त प्रमुख बना। भौतिक अवशेष: बुकानन ने लिखा है कि इनके द्वारा बनवाए गए निर्माण कार्य संख्या में तो बहुत हैं, पर आकार में विशाल नहीं हैं। उस क्षेत्र में इनके छोटे दुर्ग (गढ़), पोखरे (तालाब) और डीह बड़ी संख्या में बिखरे हुए हैं। सामाजिक पहचान: 'डोमकटा' कबीला वर्तमान में डोमकटार भूमिहार के रूप में जाना जाता है 4. ऐतिहासिक एवं सामाजिक महत्व - "आधुनिक स्थानीय हिंदू पूजनीय मानते हैं" बुकानन द्वारा लिखी गई सबसे महत्वपूर्ण पंक्ति पेज के अंत में आती है: "All these Brahman chiefs are considered by the modern Hindus of the vicinity as objects of worship." सन 1809 में, अर्थात् इन राजाओं के काल के लगभग 600 वर्ष बीत जाने के बाद भी, बुकानन ने दर्ज किया कि स्थानीय समाज में राजा कर्णदेव, बेरू राजा और उनके सहयोगियों का स्थान अत्यंत सम्मानजनक था और उन्हें स्थानीय आबादी द्वारा पूजनीय माना जाता था। फ्रांसिस बुकानन का और सिकलकीगढ़ के पुरातात्विक साक्ष्य इस बात के ऐतिहासिक दस्तावेज़ हैं कि 13वीं शताब्दी की शुरुआत में जब केंद्रीय शक्ति छिन्न-भिन्न हुई, तब कोसी-मिथिला और सीमांचल के क्षेत्रों में दोनवार और डोमकटार ब्राह्मण (भूमिहार) राजाओं - विशेषकर राजा कर्णदेव और बेरू राजा - ने स्थानीय प्रशासन, धर्म और प्रजा की सुरक्षा की कमान संभाली थी। पंडित सोनभद्र मिश्र के विवरणों, मोरंग की पांडुलिपियों और धरातलीय अवशेषों से प्रमाणित यह इतिहास बिहार के मध्यकालीन स्वर्णिम अध्यायों में से एक है।

मौर्य काल से पाल वंश के पतन तक: बिहार में ब्राह्मण कबीलों का राजनीतिक पुनरुत्थान

मौर्य काल से पाल वंश के पतन तक: बिहार में ब्राह्मण कबीलों का राजनीतिक पुनरुत्थान प्रस्तुति: अरविंद रॉय 1. मौर्य और गुप्तोत्तर काल: आधारभूत बस्तियों का निर्माण रणनीतिक एवं उपजाऊ भूमि: मौर्य, शुंग, कुषाण और गुप्त काल में बिहार-मिथिलांचल कृषि और व्यापार का केंद्र था। बौद्ध और प्रशासनिक केंद्र: कोसी, गंगा, गंडक किनारे ऊंचे टीलों पर किले और बौद्ध मठ बने। सिकलीगढ़ में आज भी इसका प्रमाण है - presence of the fragments of a Mauryan column at Sikligarh outside a large fortified settlement और धरारा (सतलीगढ़) में मणिकथम स्तंभ मिला, जिसके बारे में Waddell ने लिखा - "शुरू में इसे अशोक का स्तंभ समझा गया, पर कोई लेख नहीं मिला, नीचे कुषाण राजा वासुदेव का सोने का सिक्का मिला।" सामंतवादी व्यवस्था: गुप्त काल के उत्तरार्ध में भूमि-दान के रूप में ब्राह्मणों और सेनापतियों को जमीन मिली, यही वर्ग आगे स्थानीय भू-स्वामी बना। 2. पाल वंश का काल और संतुलन पाल राजाओं (8वीं से 12वीं सदी) ने बौद्ध मठों को संरक्षण दिया, पर ग्रामीण अर्थव्यवस्था स्थानीय भू-स्वामियों के हाथ में ही रही। 3. पाल साम्राज्य का पतन और राजनीतिक शून्यता (12वीं-13वीं सदी) 12वीं सदी अंत में पाल-सेन कमजोर हुए और बख्तियार खिलजी के हमले ने बौद्ध नेटवर्क को ध्वस्त कर दिया। मगध-मिथिला में केंद्रीय सत्ता खत्म होने से Power Vacuum बना। Buchanan ने इसी के लिए लिखा है कि हिंदू राज्य के गिरने के बाद - several of the Brahman nobles, and the heads of other native tribes seem to have recovered a temporary power. 4. स्थानीय ब्राह्मण कबीलों का स्वायत्त शासक के रूप में उदय केंद्रीय सत्ता के पतन के बाद सदियों से भूमि पर अधिकार रखने वाले कबीलों ने स्वयं शासन संभाला: क) कोसी और उत्तरी बिहार (पूर्णिया/अररिया): • दोनवार (Doniwar) कबीला: Buchanan के अनुसार - "On the west side of the Kosi are several monuments of a chief named Karnadev, and of his three brothers, Ballabh, Dullabh, and Tribhuvan, who are said to have been powerful chiefs of the tribe of Doniwar Brahmans." • डोमकटा (Domkata) कबीला: "In the north-east parts of the district again a certain Brahman of the Domkata tribe, named Beru Raja... He had three brothers or kinsmen, who ruled the country, and who were named Sahasmal, Bali and Barijan." Buchanan ने आगे लिखा - "All these Brahman chiefs are considered by the modern Hindus of the vicinity as objects of worship." ख) तिरहुत और चंपारण क्षेत्र: • जैथरिया (जेठरिया) कबीला: In 1244 A.D., Gangeshwar Dev, a Brahmin of the Jaitharia clan, Now known as Bhumihar Brahmin, settled at Jaithar in Champaran. और बेतिया राज की स्थापना - The Bettiah Raj... was founded during the reign of Mughal emperor Shah Jahan in the 17th century. 5. पुरातात्विक निरंतरता (Archaeological Superimposition) सिकलीगढ़, लौरिया नंदनगढ़, धरारा जैसे टीलों पर दो स्तर मिलते हैं: • निचला स्तर: मौर्य-शुंग-गुप्त की बड़ी ईंटें, NBPW बर्तन, बौद्ध अवशेष • ऊपरी स्तर: 13वीं-17वीं सदी के दोंवार, डोमकट, जैथरिया सरदारों के मिट्टी-ईंट के गढ़ कारण: मध्यकालीन सरदारों ने नई जगह खोजने के बजाय उन्हीं पुराने ऊंचे, बाढ़ से सुरक्षित मौर्य-पाल कालीन टीलों पर अपने दुर्ग (डीह) दोबारा बसाए। निष्कर्ष मौर्य और पाल काल का कृषि-प्रशासनिक अनुभव 13वीं सदी की अराजकता में काम आया। जब केंद्रीय राजसत्ताएं ध्वस्त हुईं, तो प्राचीन उपजाऊ जमीनों पर बसे दोंवार, डोमकटार और जैथरिया जैसे ब्राह्मण कबीलों ने शस्त्र उठाकर स्थानीय शासन की कमान संभाली। यही बिहार के मध्यकालीन इतिहास का असली मोड़ है। संदर्भ: 1. Francis Buchanan-Hamilton, An Account of the District of Purnea in 1809-10, Page 47 2. L.S.S. O'Malley, Bengal District Gazetteers - Purnea, 1911, Chapter Archaeology & Gazetteer - Asuragarh, Barijangarh, Benugarh 3.

Thursday, June 18, 2026

🎗️🎗️मध्यकालीन बिहार-पूर्वी उत्तर प्रदेश में तुगलक कालीन सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तन और 'राय' उपाधि का इतिहास🎗️🎗️

🎗️🎗️मध्यकालीन बिहार-पूर्वी उत्तर प्रदेश में तुगलक कालीन सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तन और 'राय' उपाधि का इतिहास🎗️🎗️
प्रस्तुति अरविंद रॉय मध्यकालीन भारत का इतिहास केवल राजवंशों के उत्थान और पतन की कहानी नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक रणनीतियों और सामाजिक संरचनाओं में आए बदलावों का भी जीवंत दस्तावेज़ है। 14वीं शताब्दी में दिल्ली सल्तनत के तहत तुगलक वंश का शासन, विशेषकर फिरोज शाह तुगलक का काल, बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश (पूर्वांचल) के क्षेत्रों में व्यापक प्रशासनिक और सामाजिक प्रयोगों का गवाह बना। इस दौर में सल्तनत के प्रति वफादार नए सामाजिक वर्गों को स्थापित करने और विद्रोही ताकतों को नियंत्रित करने के लिए भूमि अधिकारों और उपाधियों का पुनर्वितरण किया गया। प्रसिद्ध इतिहासकार के.पी. जायसवाल शोध संस्थान, पटना द्वारा 1973 में प्रकाशित 'कॉर्पस ऑफ अरेबिक एंड पर्शियन इंस्क्रिप्शन्स ऑफ बिहार' (Corpus of Arabic and Persian Inscriptions of Bihar) जैसे ऐतिहासिक स्रोत इस बात की पुष्टि करते हैं। ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और तुगलक कालीन संकट फिरोज शाह तुगलक के काल में बिहार और शाहबाद (वर्तमान भोजपुर, बक्सर, रोहतास और कैमूर क्षेत्र) की सीमाएं राजनीतिक रूप से अत्यंत अशांत थीं। इस क्षेत्र में स्थानीय राजपूत और चेरो प्रमुख सल्तनत की सत्ता को लगातार चुनौती दे रहे थे और लगान देने से इनकार कर रहे थे। इन शक्तिशाली और विद्रोही सरदारों को नियंत्रित करना दिल्ली के सुल्तानों के लिए एक बड़ी सैन्य और प्रशासनिक चुनौती थी। अपनी सीमाओं को सुरक्षित करने और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए फिरोज शाह तुगलक ने एक कूटनीतिक और सैन्य रणनीति तैयार की। उन्होंने इस अशांत सीमा पर सल्तनत के प्रति वफादार और लड़ाकू समुदायों को बसाने का निर्णय लिया। सैन्य ब्राह्मण समूह और ज़मींदारी अधिकारों का हस्तांतरण विद्रोही राजपूत और चेरो सरदारों का मुकाबला करने के लिए तुगलक प्रशासन ने इस क्षेत्र के उन ब्राह्मण समूहों को चुना जो अध्यापन के साथ-साथ सैन्य गतिविधियों में भी सक्रिय थे (जिन्हें इतिहास में सैन्य ब्राह्मण या भूमिहार ब्राह्मण के रूप में जाना जाता है)। सल्तनत ने इन समूहों को शाहबाद और उसके आसपास के क्षेत्रों में व्यापक 'ज़मींदारी अधिकार' (Land rights) सौसौंप सल्तनत को स्थानीय स्तर पर एक ऐसा सैन्य बल मिल गया जो अपनी ज़मींदारी की रक्षा के लिए विद्रोही ताकतों से सीधा लोहा ले सकता था। दूसरा, इससे विद्रोही सरदारों की आर्थिक और राजनीतिक शक्ति कमजोर हुई। 'पांडेय' से 'राय': सामाजिक और उपनाम संबंधी परिवर्तन इस प्रशासनिक बदलाव का सबसे गहरा असर इस क्षेत्र की सामाजिक संरचना और पहचान पर पड़ा। इतिहासकार सुरेंद्र गोपाल ने 'इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस' (IHC) के 1965 के अधिवेशन में अपने शोध पत्र "The Zamindars of Eastern UP and Bihar in 14th Century" में इस पर विस्तार से प्रकाश डाला है। सुरेंद्र गोपाल और इम्तियाज अहमद (जो प्रख्यात इतिहासकार असगरी के शिष्य थे) के शोध बताते हैं कि तुगलकों ने सैन्य सेवा करने वाले इन ब्राह्मण ज़मींदारों को 'राय' (Rai) की सम्मानित सैन्य उपाधि से नवाजा। यह उपाधि शक्ति, भूमि और राज्य के प्रति निष्ठा का प्रतीक थी। इसके परिणामस्वरूप, जो परिवार पहले पारंपरिक रूप से 'पांडेय' या 'मिश्र' जैसे उपनामों का उपयोग करते थे, वे 15वीं और 16वीं शताब्दी के दस्तावेजों में 'राय' के रूप में दर्ज होने लगे। यह उपनाम परिवर्तन केवल एक शाब्दिक बदलाव नहीं था, बल्कि यह एक धार्मिक/पारंपरिक पहचान से एक सैन्य/प्रशासनिक संभ्रांत वर्ग में परिवर्तन का सूचक था। संक्षेप में, फिरोज शाह तुगलक द्वारा बिहार की अशांत सीमाओं पर वफादार कुलों को बसाने की नीति ने इस क्षेत्र के सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य को हमेशा के लिए बदल दिया। 'कॉर्पस ऑफ अरेबिक एंड पर्शियन इंस्क्रिप्शन्स' और सुरेंद्र गोपाल जैसे आधुनिक इतिहासकारों के शोध यह साबित करते हैं कि कैसे राजकीय संरक्षण और सैन्य आवश्यकताओं ने पारंपरिक उपनामों (जैसे पांडेय या मिश्र) को 'राय' जैसी प्रशासनिक उपाधियों में बदल दिया। यह इतिहास दर्शाता है कि मध्यकाल में जातियां और उपनाम स्थिर नहीं थे, बल्कि वे राजनीतिक बदलावों और राज्य की नीतियों के अनुसार लगातार विकसित

Wednesday, June 17, 2026

🎗️🎗️निकोलाओ मनूची की नज़र में बिहार के 'हथियारबंद ब्राह्मण' ज़मींदार🎗️🎗️

🎗️🎗️निकोलाओ मनूची की नज़र में बिहार के 'हथियारबंद ब्राह्मण' ज़मींदार🎗️🎗️
प्रस्तुति अरविंद रॉय इतालवी यात्री निकोलाओ मनूची 1653 में 14 साल की उम्र में भारत आया और अगले 60 साल मुग़ल दरबार, दक्कन, बंगाल और मद्रास में बिताए। उसकी किताब Storia do Mogor यानी "मुग़ल भारत का इतिहास" 1653-1708 के दौर का चश्मदीद ब्यौरा है। बिहार के बारे में मनूची ने जो लिखा, वो डच व्यापारियों के रिकॉर्ड से मेल खाता है। फर्क सिर्फ इतना है कि *मनूची ने "भूमिहार" नाम नहीं लिखा*, क्योंकि ये शब्द तब प्रचलन में ही नहीं था। उसने बिहार के ताकतवर ज़मींदारों को उनकी असलियत से पहचाना "हथियार उठाने वाले ब्राह्मण" मनूची ने क्या देखा 'ब्राह्मण' जो पुरोहित नहीं थे मनूची 1656-59 तक दारा शिकोह की तोपखाना सेवा में था। बाद में वो पटना, इलाहाबाद, बनारस, राजमहल, ढाका तक घूमा। बिहार में उसने एक अजीब वर्ग देखा यहाँ के ब्राह्मण वेद-पाठ छोड़कर खेती, ज़मींदारी और फौजदारी करते हैं। ये घोड़े रखते हैं, हथियार बांधते हैं, और मुग़ल सरकार से लगान वसूली पर लड़ते हैं।यूरोपीय नज़र में ब्राह्मण का मतलब "पादरी" था। पर बिहार में मनूची को "Soldier-Brahmins" मिले – जो सामाजिक रूप से ब्राह्मण थे, पर पेशे से योद्धा-ज़मींदार। यही वो वर्ग था जिसे 100 साल बाद अंग्रेज़ "Zemindar Brahmins" कहेंगे और 19वीं सदी में "भूमिहार" कहा जाने लगा। 'Zamindaran-e-Zor-Talab मुग़लों के लिए सिरदर्द मनूची ने मुग़ल प्रशासन की भाषा इस्तेमाल करते हुए लिखा कि बिहार खासकर शाहाबाद, सारण, मुजफ्फरपुर* के ज़मींदार "rebellious or powerful landlords" थे। उसके ब्यौरे से 3 बातें साफ हैं 1.टैक्स नहीं देते थे औरंगज़ेब के फरमान के बावजूद ये ज़मींदार लगान रोक लेते थे। मनूची लिखता है – _"Aurangzeb had to send army after army to collect revenue from Bihar" 2. निजी फौज रखते थे हर बड़े ज़मींदार के पास 2-5 हज़ार सिपाही, तोप और किले थे। मनूची ने इन्हें "petty rajas" कहा। 3. मुग़ल सूबेदार कमज़ोर: पटना का सूबेदार नाम का था। असल हुकूमत नदी किनारे के इन ज़मींदारों की चलती थी। डच व्यापारियों की तरह मनूची भी लिखता है कि नावें रोककर 'राहदारी' वसूली जाती थी। 3. डच रिकॉर्ड से समानता: एक ही सच्चाई, अलग शब्द 1630-1680 के डच Dagh-Register में इन्हें "Brahmanen" या "High-caste landlords" कहा गया 50 साल बाद मनूची ने इन्हें "Brahmanas who follow the profession of arms" लिखा। दोनों का मतलब एक ही था: डच रिकॉर्ड मनूची असली पहचान Brahmanen Soldier-Brahmins भूमिहार/बाभन ज़मींदार Powerful landlords Zamindaran-e-Zor-Talab राजा Turbulent, don't obey Mughals Rebellious, keep armies क्षेत्रीय संप्रभुता मनूची का महत्व: 'भूमिहार' शब्द से पहले का दस्तावेज़ मनूची ने 'भूमिहार' शब्द नहीं लिखा, क्योंकि 17वीं सदी में ये जातीय पहचान सरकारी तौर पर दर्ज नहीं थी। पर उसने वो सारी खूबियाँ लिख दीं* जो बाद में भूमिहार की पहचान बनीं: 1. ब्राह्मण मूल सामाजिक हैसियत सबसे ऊपर। 2. ज़मींदारी पेशा : लगान वसूली मुख्य काम। 3. सैन्य परंपरा हथियार रखना, फौज रखना, विद्रोह करना। जेम्स ग्रांट ने 1786 में जब "Zemindar Brahmins" शब्द इस्तेमाल किया, तो वो दरअसल मनूची और डचों के बयान को ही पक्का कर रहा था। मनूची का Storia do Mogor_इस बात का सबूत है कि 'भूमिहार' नाम नया है, पर समुदाय की सत्ता 17वीं सदी में भी स्थापित थी। उसने इन्हें 'ब्राह्मण ज़मींदार' नहीं कहा, पर 'हथियारबंद ब्राह्मण' और 'बागी ज़मींदार' कहकर वही तस्वीर खींची जो डच रिकॉर्ड में मिलती है। डचों ने व्यापार की नज़र से देखा, मनूची ने सैनिक-डॉक्टर की नज़र से। दोनों इस नतीजे पर पहुँचे कि बिहार में मुग़ल सल्तनत और यूरोपीय कंपनी के बीच एक तीसरी ताकत खड़ी थी – ज़मींदार ब्राह्मणों की। यही ताकत 1857 में अंग्रेज़ों से टकराई, जिसका सबूत बिरांजी मीटिंग की वो लिस्ट है इस तरह मनूची का लेखा-जोखा 'भूमिहार' शब्द के बिना भी भूमिहार इतिहास का सबसे पुराना यूरोपीय दस्तावेज़ बन जाता है।

🎗️बिहार के शोरा व्यापार में भूमिहार जमींदारों की भूमिका: 17वीं सदी का डच परिप्रेक्ष्य🎗️🎗️

🎗️बिहार के शोरा व्यापार में भूमिहार जमींदारों की भूमिका: 17वीं सदी का डच परिप्रेक्ष्य🎗️🎗️ प्रस्तुति अरविंद रॉय 17वीं शताब्दी का बिहार भारतीय उपमहाद्वीप के सबसे समृद्ध और रणनीतिक व्यापारिक केंद्रों में से एक था। मुग़ल शासन के अधीन पटना वैश्विक व्यापार का एक ऐसा मुख्य केंद्र बनकर उभरा, जिसने यूरोपीय शक्तियों को अपनी ओर आकर्षित किया। इस व्यापारिक होड़ में डच ईस्ट इंडिया कंपनी (VOC) ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। डच व्यापारियों ने जब 1632 में पटना में अपनी पहली फैक्ट्री स्थापित की, तो उनका मुख्य उद्देश्य गनपाउडर (बारूद) बनाने में इस्तेमाल होने वाला शोरा (Saltpetre), अफीम और सूती वस्त्र खरीदना था। इस व्यापारिक यात्रा के दौरान डचों का सामना बिहार के जिन शक्तिशाली स्थानीय शासकों और भू-स्वामियों से हुआ, वे सामाजिक और ऐतिहासिक रूप से गंगा घाटी के भूमिहार (बाभन) और राजपूत जमींदार थे। 1630 से 1680 के बीच के डच रिकॉर्ड्स इन जमींदारों की ताकत, उनके प्रभाव और डच व्यापार पर उनके नियंत्रण का एक सजीव दस्तावेज हैं। डच रिकॉर्ड्स और शब्दावली का विकास ऐतिहासिक दस्तावेजों का अध्ययन करते समय यह समझना आवश्यक है कि "भूमिहार" शब्द का आधिकारिक और बड़े पैमाने पर प्रयोग 19वीं सदी के उत्तरार्ध में शुरू हुआ, जबकि "बाभन" शब्द 18वीं सदी के डच-फ्रांसीसी रिकॉर्ड्स में अधिक देखने को मिलता है। 1630 से 1680 के शुरुआती दौर में, डच अधिकारी स्थानीय जातियों के सूक्ष्म अंतर से पूरी तरह परिचित नहीं थे। इसलिए, डच दैनिक डायरियों (Dagh-Register) और आधिकारिक पत्रों में इन प्रभावशाली जमींदारों के लिए "Brahmanen" (ब्राह्मण), "High-caste Gentues" (उच्च जाति के हिंदू), "Local Lords", या "Country Powers" (स्थानीय क्षत्रप) जैसे शब्दों का प्रयोग किया गया। ये संदर्भ स्पष्ट करते हैं कि डच जिन "ब्राह्मण जमींदारों" से बात या संघर्ष कर रहे थे, वे वास्तव में इस क्षेत्र के भूमिहार/बाभन जमींदार ही थे जो कृषि और सैन्य नियंत्रण दोनों संभालते थे। शोरा व्यापार पर नियंत्रण और आर्थिक स्वायत्तता पटना और उसके आसपास के ग्रामीण इलाके, विशेषकर सारण, तिरहुत, भोजपुर और टिकारी के क्षेत्र, शोरा उत्पादन के गढ़ थे। डच ईस्ट इंडिया कंपनी को व्यापार करने के लिए केवल मुग़ल सूबेदार (गवर्नर) की अनुमति ही काफी नहीं थी, बल्कि उन्हें इन स्थानीय जमींदारों से 'परवाना' (अनुमति पत्र) भी लेना पड़ता था। 1650 और 1660 के दशकों के डच रिकॉर्ड्स से पता चलता है कि गंगा नदी के दोनों किनारों पर इन जमींदारों का कड़ा नियंत्रण था। चूंकि शोरा को नावों के जरिए ही हुगली (बंगाल) और वहां से यूरोप भेजा जाता था, ये जमींदार डच नावों से भारी चुंगी या टैक्स (Tolls) वसूलते थे। यदि डच व्यापारी टैक्स देने से मना करते, तो जमींदार अपनी सैन्य ताकत के बल पर उनकी नावों को रोक लेते थे। डचों के लिए ये जमींदार "Troublesome but necessary" (परेशानी पैदा करने वाले लेकिन व्यापार के लिए बेहद जरूरी) थे, क्योंकि जमींदारों की मर्जी के बिना बिहार से शोरा बाहर ले जाना नामुमकिन था। सैन्य शक्ति और मुग़ल सत्ता को चुनौती 17वीं सदी के डच दस्तावेज इस बात की भी गवाही देते हैं कि बिहार के ये उच्च-जातीय जमींदार केवल भू-स्वामी नहीं थे, बल्कि वे स्वतंत्र राजाओं की तरह व्यवहार करते थे। उनके पास अपनी हथियारबंद निजी सेनाएं (Armed Militias) और मिट्टी तथा पत्थरों के मजबूत किले थे। जब कभी डच व्यापारियों और जमींदारों के बीच टैक्स को लेकर विवाद गहराता था, तो डचों को मुग़ल सूबेदार से सैन्य मदद की गुहार लगानी पड़ती थी। यह स्थिति दर्शाती है कि केंद्रीय मुग़ल सत्ता के बावजूद, जमीन और नदी मार्गों पर वास्तविक नियंत्रण इन्हीं स्थानीय भूमिहार और राजपूत जमींदारों का था। ऐतिहासिक संदर्भ और प्रमाण इस कालखंड के इतिहास को प्रमाणित करने में आधुनिक इतिहासकारों और आर्काइव्स की बड़ी भूमिका है: प्रोफेसर ओम प्रकाश की प्रसिद्ध पुस्तक 'The Dutch East India Company and the Economy of Bengal, 1630–1720' के अध्याय 4 और 5 में इस बात का विस्तृत विवरण है कि कैसे पटना के शोरा व्यापार में स्थानीय जमींदारों का दखल डच कंपनी की रातों की नींद उड़ा देता था। नीदरलैंड्स के VOC Archives (The Hague) में सुरक्षित पटना फैक्ट्री के Dagh-Register इस बात के प्राथमिक स्रोत हैं कि कैसे 1670 के दशक तक आते-आते इन जमींदारों को स्पष्ट रूप से "Brahmanen" (Brahmanen zamindars) कहकर संबोधित किया जाने लगा था। संक्षेप में कहा जाए तो 1630-1680 के बीच का कालखंड बिहार के स्थानीय जमींदारों की आर्थिक और सैन्य शक्ति के उत्थान का काल था। डच रिकॉर्ड्स इस बात का पुख्ता सबूत हैं कि 17वीं सदी में भी इस क्षेत्र के भूमिहार/बाभन जमींदार गंगा घाटी के व्यापारिक तंत्र को संचालित और प्रभावित कर रहे थे। भले ही डचों ने उन्हें अपनी भाषा में "Brahmanen" या "High-caste Landlords" लिखा, लेकिन उनका सामाजिक, भौगोलिक और आर्थिक विवरण सीधे तौर पर इसी वर्ग की ओर इशारा करता है। यही संबंध आगे चलकर 18वीं सदी (1700-1750) में और गहरा हुआ, जब यूरोपीय दस्तावेजों में इन जमींदारों के लिए स्थानीय नाम "Babhan" अधिक स्पष्टता और विस्तार के साथ दर्ज होने लगा।

Tuesday, June 16, 2026

🎗️🎗️मुगलों की हैसियत भूमिहार जमींदारों ने दो कौड़ी की बना रखी थी🎗️🎗️

मुगलों की हैसियत भूमिहार जमींदारों ने दो कौड़ी की बना रखी थी उनकी सत्ता केवल नाममात्र की थी।यूरोपीय कंपनियों के दैनिक रिकॉर्ड, पत्रों और डायरियों में
तत्कालीन बिहार के सामाजिक-राजनैतिक परिदृश्य और वहाँ के प्रभावशाली "भूमिहार" या "बाभन" ज़मींदारों के अदम्य प्रभाव का एक जीवंत और प्रामाणिक इतिहास देखने को मिलता है।

Friday, August 29, 2025

🔱नरहन (समस्तीपुर) नरहन (सिवान)🔱

🔱नरहन (समस्तीपुर) नरहन (सिवान)🔱 वत्स गोत्रीय भूमिहार ब्राह्मण की बड़ी संख्या दोनबूजुर्ग के आस-पास है प्रस्तुति अरविन्द रॉय दोनों नरहन के बीच संबंध होने के संकेत मिलते हैं नरहन नामक एक गाँव सिवान जिले में है, जो सरयू नदी के किनारे स्थित है. यह एक धार्मिक गाँव के रूप में जाना जाता है. इसके अतिरिक्त, नरहन नामक गाँव समस्तीपुर जिले में भी स्थित है. बागमती नदी बहती है, जो समस्तीपुर को दरभंगा जिले से अलग करती है नरहन (समस्तीपुर) अपने नरहन राज के लिए जाना जाता है, जिसे द्रोणवार राजवंश ने विकसित किया था नरहन (सिवान ) जिला मुख्यालय से ३० किमी० दक्षिण में अवस्थित है यह हिन्दुओं का प्रसिद्ध तीर्थ है। कार्तिक पूर्णिमा एवं मकर सक्रान्ति के दिन यहाँ मेले का आयोजन होता है, जिसमें काफी संख्या में श्रद्धालु आते है और सरयु नदी के पवित्र जल में स्नान करते है। आठवीं सदी में यहाँ बनारस के शासकों का आधिपत्य था। १५ वीं सदी में सिकन्दर लोदी ने यहाँ अपना आधिपत्य स्थापित किया। बाबर ने अपने बिहार अभियान के समय सिवान के नजदीक घाघरा नदी पार की थी। बाबर की भेंट शाह मोहम्मद मारूफ से नरहन में हुई थी 1529 ई. नसरत शाह के हरा के शाह मोहम्मद मारूफ के जागीरदार बनवा दिया नरहन जहां यह महत्वपूर्ण घटना घटी थी बाद में यह मुगल शासन का हिस्सा हो गया। अकबर के शासनकाल पर लिखे गए आईना-ए-अकबरी के विवरण अनुसार 45 बरिस बाद अकबर सन 1574 ई. में बंगाल के अफगानी बादशाह दाउद खां के हरा दिया गोविंद चंद्र गहड़वाल वंश के एक शक्तिशाली शासक थे जिन्होंने ने 1119-1120 ईस्वी में दोन बूजुर्ग में वत्स गोत्रीय , द्रोणयण ब्राह्मणों को भूमि अनुदान दिया था नरहन (सिवान) , दोनबूजुर्ग (सिवान).20-25 किलोमीटर के दायरे में है नरहन राज समस्तीपुर मुगल काल में स्थापित हुआ था

Wednesday, July 30, 2025

🎗️🎗️ब्राह्मणों में सिंह ,चौधरी आदि की उपाधि 🎗️🎗️

🎗️🎗️ब्राह्मणों में सिंह ,चौधरी आदि की उपाधि 🎗️🎗️ मुगल काल में ब्राह्मणों को राजपूतों के समान उपाधियाँ दी गईं,खासकर अकबर के समय में प्रस्तुति अरविंद रॉय भूमिहार ब्राह्मण समाज का कान्यकुब्ज ब्राह्मणों के साथ,विवाह संबंध पारंपरिक रूप से स्वीकार्य रहा है, स्वामी सहजानंद सरस्वती ने विस्तार से लिखा है राणा सांगा की मदद भी फतुहाबाद,खजुहा आदि के ब्राह्मण जमींदारों ने की थी बाद में अपने वंश को बाबर से बचाने के लिये सीकरी से निकल लिये मुगल काल की देन के रूप में ब्राह्मणों में उपाधियाँ एक महत्वपूर्ण विशेषता थीं। कानपुर और उसके आसपास के क्षेत्रों में, विशेष रूप से मौर्य वंश के पतन के बाद, कान्यकुब्ज ब्राह्मणों का एक महत्वपूर्ण समुदाय था, जिसमें कई बड़े जमींदार शामिल थे। इनमें कुछ प्रमुख पुराने कानपुर के राजा सिसेदानी महाराजा जैसे व्यक्ति शामिल थे, और इस क्षेत्र का ब्राह्मण समुदाय आगरा और अयोध्या के बीच घनी आबादी वाला था। सबसे उल्लेखनीय जनजाति जगनबंसी है, जो घाटमपुर और सारह परगना के एक बड़े हिस्से के स्वामी हैं, जो पहले कोरा परगना में शामिल थे। उनकी उत्पत्ति का वर्णन इस प्रकार है: दू नारायण, कनौजिया अवस्थी, जहानाबाद (कोरा परगना) में एक बड़े बैंकर और अनाज विक्रेता थे; हालाँकि, उनकी पहली ज़मीन-जायदाद केवल जाबानाबाद के पास एक छोटा सा गाँव था, जिसे उन्होंने भाटों को दान में दे दिया था। उनके पुत्र जगन पार्षद, जो अकबर के समकालीन थे, सेना में कमिश्नरी अधिकारी के रूप में कार्यरत थे, और इसी कारण उन्हें गौतमों के विरुद्ध एक सेना के साथ सहायता प्रदान की गई थी, जिन्होंने उन्हें तीन लाख रुपये में एक बड़ा क्षेत्र गिरवी रख दिया था, लेकिन कब्जा करने से इनकार कर दिया था। इसके बाद, अकबर के पूरे शिविर को भोजन उपलब्ध कराने और भुगतान लेने से इनकार करने पर, बादशाह ने उन्हें परगना कोरा के चौधरी की उपाधि प्रदान की, उन्हें अरखों को बाहर निकालने का निर्देश दिया, और गौतमों पर अपनी विजय की स्मृति में उन्हें "सिंह" उपनाम और ठाकुरों के अन्य विशिष्ट चिह्न (जैसे, अभिवादन) धारण करने का अधिकार दिया। यह परिवार आज भी एक बड़े भूभाग का स्वामी दर्ज है, जिसे घाटमपुर परगना में खरीद कर बढ़ाया जा रहा है। वर्ष 1909 में प्रकाशित मि.एच. आर.नेविल प्रणीत डिस्ट्रिक गजेटियर कानपुर के पृष्ठ 103 व 104 के मुताबिक़ ..... कहानी यह है कि कोरा के पास जहानाबाद के एक धनी कनौजिया ब्राह्मण के पुत्र जगन प्रसाद, शाही कमिश्नरी से जुड़े थे, और इस हैसियत से उन्होंने इतना प्रभाव प्राप्त कर लिया कि वे गौतमों के विरुद्ध एक मुचलका लागू करने में शाही सैनिकों की सहायता लेने में सक्षम हो गए। इसके प्रति कृतज्ञता में उन्होंने दोआब में एक अभियान के दौरान पूरी सेना को बिना भुगतान के भोजन उपलब्ध कराया। इस असामान्य कार्यवाही के बारे में सुनकर, अकबर ने उन्हें कोरा परगना के चौधरी की उपाधि प्रदान की, उन्हें अरखों को निष्कासित करने का निर्देश दिया और उन्हें सिंह की उपाधि धारण करने के लिए अधिकृत किया, जिसे जगनबंसी आज भी राजपूतों के कई अन्य चिह्नों और रीति-रिवाजों के अलावा अपनाते हैं। उनके वंशजों के पास इस जिले और फतेहपुर में एक बड़ी जागीर थी, लेकिन उनमें से अधिकांश अब दयनीय स्थिति में हैं।

Saturday, July 19, 2025

🔱काशी नरेश बलवंत सिंह की विजय ने काशी और प्रयागराज की रक्षा की🔱🔱

🔱🔱काशी नरेश बलवंत सिंह की विजय ने काशी और प्रयागराज की रक्षा की🔱🔱 प्रस्तुति अरविंद रॉय 1751 का घटनाक्रम अफगान अहमद खान बंगश प्रयागराज और काशी नज़र गड़ाए था वर्ष 1751 में, फर्रुखाबाद के बंगश अफगान सरदार अहमद खान ने प्रयाग में हिंसा और लूटपाट की इस दौरान गाजीपुर के पठानों ने राजा बलवंत सिंह (भूमिहार ब्राह्मण) से युद्ध किया राजा विजयी हुए और उन्हें लूट लिया बलवंत सिंह गाजीपुर में सर्वोच्च शासक बन गए थे,अतः अहमद खान बंगश ने इलाहाबाद की घेराबंदी हटा ली और फर्रुखाबाद की रक्षा के लिए दौड़ पड़ा उन्होंने फर्रुखाबाद के पास गंगा तट पर हसनपुर में शिविर स्थापित किया और आसन्न युद्ध की तैयारी की ऐतिहासिक तथ्य है कि 17 अप्रैल 1751 को जयप्पा द्वारा लिखा गया युद्ध की घटनाओं का विवरण देने वाला पत्र 7 जून 1751 को पेशवा के पास पहुँचा था यह पत्र मराठा साम्राज्य के इतिहास में एक महत्वपूर्ण संचार का उदाहरण है, जिसमें तत्कालीन युद्धकालीन गतिविधियों और स्थिति का विवरण पेशवा तक पहुँचाया गया था।

Sunday, January 19, 2025

🔱 बनारस संस्कृत कॉलेज🔱

🔱 बनारस संस्कृत कॉलेज🔱 क्वींस कॉलेज 1791 में बनारस संस्कृत कॉलेज के रूप में आरंभ हुआ था काशी नरेश महाराज महीप नारायण द्वारा चौकाघाट में दान में दी गई भूमि पर कॉलेज के भवन का निर्माण कार्य हुआ
प्रस्तुति अरविन्द रॉय बनारस के तत्कालीन रेजिडेंट जोनाथन डंकन का अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान था संस्कृत कॉलेज में वेद, पुराण, आयुर्वेद, ज्योतिष, साहित्य आदि पढ़ाया जाता था उच्चकोटि के संस्कृत विद्वान ग्रिफिथ वर्ष 1861 से 1876 तक बनारस संस्कृत कालेज के प्राचार्य रहे। उन्होंने संस्कृत के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किया संस्कृत की महत्ता समझाने के लिए ग्रिफिथ ने संपूर्णानंद संस्कृत विवि में ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद व अथर्ववेद के साथ वाल्मीकि रामायण और महाकवि कालिदास रचित कुमार संभव का सबसे पहले अंग्रेजी में अनुवाद किया था। वर्ष 1870 के आसपास जिस स्थल पर उन्होंने वाल्मीकि रामायण का अंग्रेजी में अनुवाद किया था।

Friday, September 13, 2024

भुमिहार(आयुधजीवी ब्राह्मण )

भुमिहार
ब्राह्मण जाति को सैन्य ब्राह्मण जाति माना जाता है।इस जाति पहली बार उल्लेख मदारपुर युद्ध के संदर्भ में कान्यकुब्ज ब्राह्मण वंशावली में मिलता है कश्यप गोत्र भूमिहार ब्राह्मण मदारपुर के जमींदार थे जिनका अपनी भूमि, संस्कृति और परंपराओं को बाहरी खतरों से बचाने के लिए हथियार उठाने का एक लंबा इतिहास है, जिसमें इस्लामी हमले भी शामिल हैं।ऐतिहासिक रूप से,भुमिहार ब्राह्मण अपनी बहादुरी, युद्ध कौशल और रणनीतिक सोच के लिए जाने जाते हैं उन्होंने दिल्ली सल्तनत और मुगल साम्राज्य सहित आक्रमणकारी सेनाओं के खिलाफ अपने क्षेत्रों की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। भुमिहार ब्राह्मणों ने अपनी भूमि, संस्कृति और परंपराओं को बचाने के लिए हथियार उठाया, जिससे उन्हें आयुधजीवी ब्राह्मण कहा जाता है सैन्य ब्राह्मण की प्रतिष्ठा मिली भूमिहार अपने प्रशासनिक और शासन कौशल के लिए भी जाने जाते हैं जिससे उन्हें अपने क्षेत्रों पर नियंत्रण बनाए रखने में मदद मिली।

Bhumihars (The Military Brahmin)

Bhumihars are considered a Brahmin caste, specifically a military Brahmin caste. They have a long history of taking up arms to protect their lands, culture, and traditions against external threats, including Islamic invasions. Historically, Bhumihar Brahmins were known for their bravery, martial skills, and strategic thinking. They played a significant role in defending their territories against invading armies, including those of the Delhi Sultanate and the Mughal Empire. Many Bhumihar Brahmins took up arms to protect their lands, culture, and traditions, earning them the reputation as fierce warriors. They were also known for their administrative and governance skills, which helped them maintain control over their territories.

Monday, August 26, 2024

🎗️🎗️सूर्य पूजा और भूमिहार🎗️🎗️

🎗️🎗️सूर्य पूजा और भूमिहार🎗️🎗️
भूमिहार ब्राह्मणों द्वारा सूर्य पूजा प्राचीन काल से की जा रही है प्रस्तुति अरविन्द रॉय 1812 में स्कॉटिश सर्वेक्षक फ्रांसिस बुकानन-हैमिल्टन ने भूमिहार ब्राह्मणों के द्वारा बनाये गए सूर्य मंदिर के बारे में लिखा है हिंदू देवताओं की मूर्तियों पर लिखते है पर बौद्ध धर्म पर कुछ लिखा नहीं ? बुकानन 1811 पटना-गया सर्वेक्षण में लिखते है सूर्य मंदिर भूमिहार ब्राह्मणों के पूर्वजो ने बनवाया था ये स्थानीय ग्रामीणों ने बताया बुकानन स्पष्ट भूमिहार को ब्राह्मण लिखते है जिस तरह से शाकद्वीपीय को ब्राह्मण लिखते बुकानन आस पास शिवलिंग के सम्बन्ध में भी लिखते है

Sunday, November 26, 2023

🎗️🎗️बाभन (भूमिहार)गुप्त काल- हर्ष काल)🎗️🎗️

🎗️🎗️बाभन (भूमिहार)गुप्त काल- हर्ष काल)🎗️🎗️
मूलनिवासी बाभन के मूल मौर्य काल से लेकर अब तक चले आ रहे हैं प्रस्तुति अरविंद रॉय सुंग वंश, कण्व वंश, चाणक्य वंश के मूल बाभन भूमिहार में अब तक पाए जाते हैं भेलावर, सोनभदरिया ,दोनवार दोन मूल के बाभनो का उल्लेख बौद्ध साहित्य में भी है आर्यभट्ट ,बाणभट्ट , मयूर भट्ट वत्स गोत्रीय ब्राह्मणों के मूल भी भूमिहार में है सोनभदरिया भूमिहार सोन नदी के तट के आस पास के इलाकों पर बसे है बाणभट्ट के साहित्य से इस संबंध में अच्छी जानकारी मिलती है कादंबरी को लेकर जो शोध हुए हैं इसमें भी लेखकों ने सोनभदरिया का जिक्र किया है (pic 1,2)

Monday, October 30, 2023

🎗️🎗️ पूर्वांचल के ब्राह्मण जमींदार🎗️🎗️

पूर्वांचल में ज्यादातर ब्राह्मण जमींदार भूमिहार थे जिनके लिए ब्राह्मण ही लिखा गया है प्रस्तुति अरविंद रॉय आईने अकबरी में गाजीपुर ,बनारस ,बिहार, चंपारण , माणिकपुर, इलाहाबाद के ब्राह्मण ,राजपूत ,कायस्थ जमींदार कई नाम बदल गए है जैसे मदन बनारस का जमानिया मदन बनारस दोनवार भूमिहार जमींदार थे इसी तरह बनारस के गंगापुर का भी प्राचीन नाम दिया हुआ है जहां के काशी नरेश और राज नारायण का परिवार था बिहार में उस समय लगभग सभी ब्राह्मण जमींदार भूमिहार थे

Tuesday, October 10, 2023

🎗️🎗️पश्चिमा ब्राह्मण ब्रिटिश रिपोर्ट 1830 ई🎗️🎗️

🎗️🎗️पश्चिमा ब्राह्मण ब्रिटिश रिपोर्ट 1830 ई🎗️🎗️
लगभग 170 वर्ष पुराने इस ब्रिटिश कालीन रिपोर्ट में मिथिला में भूमिहारों के रहन सहन जनसंख्या का पता चलता है प्रस्तुति अरविंद रॉय मिथिला में भूमिहार की स्थिति बंगाल के कुलीन ब्राह्मणों के समान थी यहाँ खुद को जमींदार कहना पसंद किया जाता था भूमिहार खुद हल नहीं छूते थे गोत्र,वेद आदि का पालन करते थे सैनिक जीवन पसंद था मुख्य रूप से पश्चिमा ब्राह्मण कहां जाता था जिनकी जनसंख्या 8000 परिवार थी भूमिहार दान नहीं लेते थे ये अंग्रेजो के लिए आश्चर्य था पर जो भी कन्याकुब्ज जमींदार थे वो कही भी दान नहीं लेते थे ना ही पुजारी का कार्य करते थे

Monday, October 9, 2023

🎗️🎗️भूमिहार पर अन्य ब्राह्मण भाग:-1🎗️🎗️

लगभग 200 वर्ष 1857 से पहले अन्य ब्राह्मण भूमिहार को ब्राह्मण ही कहता था मानता था प्रस्तुति अरविंद रॉय 200 वर्ष पूर्व खुद ब्राह्मणों का कहना था कि ब्राह्मण और भूमिहार में कोई अंतर नहीं सिर्फ भूमिहारो में दान लेना निषेध है उस समय बिहार में अन्य ब्राह्मणों की तरह ही भूमिहारो की हत्या भी ब्रह्म हत्या की श्रेणी में आता था मगध के भूमिहार कान्यकुब्ज ब्राह्मण में आते थे 1857 में अंग्रेजों के विरुद्ध भूमिहारो ने जो मोर्चा लिया अंग्रेज भूमिहारों को अन्य ब्राह्मणों से अलग करने में लग गए श्री कृष्ण सिंह भूमिहार ब्राह्मण के मुख्यमंत्री बनने के बाद साजिशन बिहार के नेताओं ने ब्राह्मण भूमिहार भेद पैदा किया 200 वर्ष पूर्व रिपोर्ट में साफ लिखा है भूमिहार ब्राह्मण है ये पहली जनगणना से भी पूर्व की बात है (pic:-1 )

Thursday, October 5, 2023

🎗️🎗️बड़कागांव के अमर बलिदानी🎗️🎗️

🎗️🎗️बड़कागांव के अमर बलिदानी🎗️🎗️
1857 से पहले भूमिहार और कान्यकुब्ज को बाभन कहा जाता था केदार शाही भूमिहार तिलक तिवारी कान्यकुब्ज लेकिन ब्रिटिश रिकॉर्ड में बाभन प्रस्तुति अरविंद रॉय भूमिहार ब्राह्मण कान्यकुब्ज ब्राह्मण ग्वाला एवं पठान जाति के अमर बलिदानियों का नेतृत्व रामदीन शाही और केदई शाही (भूमिहार ब्राह्मण) ने किया ऑफिसियेटिंग जज एएल डम्पायर के हस्ताक्षर से आजीवन काला पानी सजा पाए बड़कागांव के रामदेव शाही, केदार शाही, छद्दु शाही, किसना शाही, तिलक तिवारी, शिवदुल डुर्मी, नाथू शाही, छठ्ठु शाही, हंसराज शाही, शोभा शाही, बिजनाथ तिवारी, तिलक शाही, पुनदेव शाही, कीर्ति शाही, छतरधारी शाही, दर्शना शाही, रौशन शाही धरमपुर-तरियानी में भागीरथ ग्वाला, राधनी ग्वाला और राज गोपाल ग्वाला प्रमुख रहे आदि को मुजफ्फरपुर के तत्कालीन थानेदार डुमरीलाल ने गिरफ्तार किया था 18 सितंबर 1857 को आजीवन काला पानी की सजा पाए संपत्ति खो चुके बलिदानियों को नमन

Thursday, December 15, 2022

🎗️🎗️गुप्त वंश मिथिला🎗️🎗️

🎗️🎗️गुप्त वंश मिथिला🎗️🎗️
कर्नाट वंश के प्रारंभिक काल में गुप्त वंश का भी राज था मिथिला में पश्चिमा ब्राह्मण (भूमिहार) मिथिला में इनके द्वार ही लाए गए प्रस्तुति अरविन्द रॉय लहेरियासराय दरभंगा से 1919 में पंचोभ ताम्रपत्र 11वीं और 12वीं शताब्दी मिला उससे इस वंश का पता चलता है ) ताम्रपत्र-अभिलेख में गुप्त नामक उपाधि वाले 6 राजाओं का उल्लेख हैं लखीसराय जिले के आसपास के क्षेत्र पर शासन करते थे इनको कुछ लोग गुप्त वंश से जोड़ते हैं बाभन (भूमिहार) की कानपुर से आई शाखा इनके समय में ही आई थी संग्राम गुप्त परमभट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर महामाण्डलिक आदि पदवी धारण करता था यज्ञेश गुप्त ,दामोदर गुप्त ,देवगुप्त , राजादित्य गुप्त , कृष्णगुप्त आदि अन्य प्रमुख शासक हुए मगध के परवर्ती गुप्त वंश से जुड़े हो सकते हैं इस वंश ने मिथिला के बाहर ब्राह्मणों को बड़े स्तर पर दान दिया ये स्थानीय ब्राह्मणों को अच्छा नहीं लगा मगध और कानपुर के ब्राह्मण पश्चिमा ब्राह्मण कहे जाने लगे कर्नाट वंश के समय मैथिल पंजी बनी जिसमे पश्चिमा ब्राह्मण शामिल नहीं हुए

Sunday, December 11, 2022

गंगा से वोल्गा तक🎗️

🎗️गंगा से वोल्गा तक🎗️ 1200 वर्ष पूर्व तक रूस में वैदिक संस्कृति के प्रमाण मिलते हैं प्रस्तुति अरविन्द रॉय 1952 के दौरान, सोवियत रूस में, एक पुरातत्वविद्, ओडेसा विश्वविद्यालय के प्रो. वारेली स्मिर्ज़कोफ़ को प्राचीन बेलारूसी शहर कोझिकोड्ज़ के पास कलाकृतियाँ मिलीं वह अनुमान लगाने वाले पहले व्यक्ति थे कि उनके देश की संस्कृति की उत्पत्ति आधुनिक यूरोप के बजाय वैदिक भारत में है रूस के वोल्गा क्षेत्र के एक पुराने गांव में खुदाई(2007) के दौरान प्राचीन विष्णु की मूर्ति मिली यह प्रतिमा 7 वीं शताब्दी ईस्वी की हैं वराह और देवी देवता की मूर्ति भी मिलती रहती है रूस का पुराना धर्म और हिन्दू धर्म करीब-करीब एक जैसे हैं महाभारत में अर्जुन के उत्तर-कुरु तक जाने का उल्लेख है कुरु वंश के लोगों की एक शाखा उत्तरी ध्रुव के एक क्षेत्र में रहती थी उन्हें उत्तर कुरु इसलिए कहते हैं, क्योंकि वे हिमालय के उत्तर में रहते थे महाभारत में उ
त्तर-कुरु की भौगोलिक स्थिति का जो उल्लेख मिलता है वह रूस और उत्तरी ध्रुव से मिलता-जुलता है रूसी भाषा के करीब 2,000 शब्द संस्कृत मूल के हैं वोल्गा घाटी गंगा घाटी की तरह उपजाऊ बड़ी मात्रा में गेहूं प्रदान करती है, और इसमें कई खनिज संपदा भी हैं एक महत्वपूर्ण पेट्रोलियम उद्योग केंद्र.अन्य संसाधनों में प्राकृतिक गैस, नमक और पोटाश शामिल हैं वोल्गा डेल्टा और कैस्पियन सागर मछली पकड़ने के मैदान हैं दोनों में काफी समानता है रूसियों और भारतीयों के बीच प्राचीन संबंधों की स्पष्ट रूप से पुष्टि की गई है रूसी रूढ़िवादी ईसाई धर्म में, भारतीय विष्णु मंदिरों की तरह ही पूजा की जाती है रूसियों ने विज़्नियर एकोरत्स्य विखुन्ह के पर्व का उल्लेख किया है, जो सीधे वैकुंठ एकादशी से संबंधित है