Friday, October 5, 2018

Mayur Bhatt (around 300-600 BC). It says that Mayur Bhatt married four women – (i) Suryavanshi princess Suryaprabha of Ayodhya, (ii) Brahmin girl Nagseni, (iii) Chandravanshi princess Haya Kumari of Gadhi family and (iv) Kurmi woman. From Suryaprabha, son Bisvasen, the first ancestor of the Bisen clan was born. From Nagseni, son Nageshwar Misra, the first ancestor of the Payasi Misra and from Haya kumara, son Bajrashahi / Badhambar shahi, the first ancestor of the Bhagochia Bhumihar was born. From Kurmi woman, the first ancestor of the Mall (Sainthwar population of Kakradih) was born [27]. The origin of Majhauli Raj 
प्राचीन भारत का पश्चिमोत्तर सीमांत!
मोहम्मद बिन कासिम के आक्रमण से एक चौथाई सदी बीत चुकी थी। तोड़े गए मन्दिरों, मठों और चैत्यों के ध्वंसावशेष अब टीले का रूप ले चुके थे, और
उनमे उपजे वन में विषैले जीवोँ का आवास था। यहां के वायुमण्डल में अब भी कासिम की सेना का अत्याचार पसरा थl…. जैसे बलत्कृता कुमारियों और सरकटे युवाओं का चीत्कार गूंजता था। कासिम ने अपने अभियान में युवा आयु वाले एक भी व्यक्ति को जीवित नही छोड़ा था, अस्तु अब इस क्षेत्र में हिन्दू प्रजा अत्यल्प ही थी।
संहार के भय से इस्लाम स्वीकार कर चुके कुछ निरीह परिवार यत्र तत्र दिखाई दे जाते थे, पर कहीं उल्लास का कोई चिन्ह नही था। कुल मिला कर यह एक शमशान था।…..
इस कथा का इस शमशान से मात्र इतना सम्बंध है, कि इसी शमशान में जन्मा एक बालक जो कासिम के अभियान के समय मात्र आठ वर्ष का था,वह इस कथा का मुख्य पात्र है। उसका नाम था तक्षक।
मुल्तान विजय के बाद कासिम के सम्प्रदायोन्मत्त आतंकवादियों ने गांवो शहरों में भीषण रक्तपात मचाया था। हजारों स्त्रियों की छातियाँ नोची गयीं, और हजारों अपनी शील की रक्षा के लिए कुंए तालाब में डूब मरीं। लगभग सभी युवाओं को या तो मार डाला गया या गुलाम बना लिया गया। अरब ने पहली बार भारत को अपना “”धर्म “” दिखlया था, और भारत ने पहली बार मानवता की हत्या देखी थी।…तक्षक के पिता सिंधु नरेश दाहिर के सैनिक थे जो इसी कासिम की सेना के साथ हुए युद्ध में वीरगति पा चुके थे।
लूटती अरब सेना जब तक्षक के गांव में पहुँची तो हाहाकार मच गया। स्त्रियों को घरों से खींच खींच कर उनकी देह लूटी जाने लगी। भय से आक्रांत तक्षक के घर में भी सब चिल्ला उठे। तक्षक और उसकी दो बहनें भय से कांप उठी थीं। तक्षक की माँ पूरी परिस्थिति समझ चुकी थी, उसने कुछ देर तक अपने बच्चों को देखा और…
जैसे एक निर्णय पर पहुच गयी। ….माँ ने अपने तीनों बच्चों को खींच कर छाती में चिपका लिया और रो पड़ी। फिर देखते देखते उस क्षत्राणी ने म्यान से तलवार खीचा और अपनी दोनों बेटियों का सर काट डाला। उसके बाद “काटी जा रही गाय की तरह” बेटे की ओर अंतिम दृष्टि डाली, और तलवार को “अपनी” छाती में उतार लिया।…
आठ वर्ष का बालक “एकाएक” समय को पढ़ना सीख गया था, उसने भूमि पर पड़ी मृत माँ के आँचल से अंतिम बार अपनी आँखे पोंछी, और घर के पिछले द्वार से निकल कर खेतों से होकर जंगल में भागा…………..पचीस वर्ष बीत गए। तब का अष्टवर्षीय तक्षक अब बत्तीस वर्ष का पुरुष हो कर कन्नौज के प्रतापी शासक नागभट्ट द्वितीय का मुख्य अंगरक्षक था। वर्षों से किसी ने उसके चेहरे पर भावना का कोई चिन्ह नही देखा था। वह न कभी खुश होता था न कभी दुखी, उसकी आँखे सदैव अंगारे की तरह लाल रहती थीं। उसके पराक्रम के किस्से पूरी सेना में सुने सुनाये जाते थे। अपनी तलवार के एक वार से हाथी को मार डालने वाला तक्षक सैनिकों के लिए “आदर्श ” था।
कन्नौज नरेश नागभट्ट अपने अतुल्य पराक्रम, विशाल सैन्यशक्ति और अरबों के सफल प्रतिरोध के लिए ख्यात थे। सिंध पर शासन कर रहे अरब कई बार कन्नौज पर आक्रमण कर चुके थे, पर हर बार योद्धा राजपूत उन्हें खदेड़ देते। युद्ध के “”सनातन नियमों का पालन करते “” नागभट्ट कभी उनका पीछा “नहीं ” करते, जिसके कारण
बार बार वे मजबूत हो कर पुनः आक्रमण करते थे। ऐसा पंद्रह वर्षों से हो रहा था।…आज महाराज की सभा लगी थी।…
कुछ ही समय पुर्व गुप्तचर ने सुचना दी थी, कि अरब के खलीफा से सहयोग ले कर सिंध की विशाल सेना कन्नौज पर आक्रमण के लिए प्रस्थान कर चुकी है, और संभवत: दो से तीन दिन के अंदर यह सेना कन्नौज की सीमा पर होगी।… इसी सम्बंध में रणनीति बनाने के लिए महाराज नागभट्ट ने यह सभा बैठाई थी। नागभट्ट का सबसे बड़ा गुण यह था, कि वे अपने सभी सेनानायकों का विचार लेकर ही कोई निर्णय करते थे। आज भी इस सभा में सभी सेनानायक अपना विचार रख रहे थे। अंत में तक्षक उठ खड़ा हुआ और बोला- महाराज, हमे इस बार वैरी को उसी की शैली में उत्तर देना होगा। महाराज ने ध्यान से देखा अपने इस अंगरक्षक की ओर, बोले- अपनी बात खुल कर कहो तक्षक, हम कुछ समझ नही पा रहे।
– महाराज, अरब सैनिक महा बर्बर हैं, उनके साथ सनातन नियमों के अनुरूप युद्ध करके हम अपनी प्रजा के साथ घात ही करेंगे। उनको “उन्ही की शैली” में हराना होगा।… महाराज के माथे पर लकीरें उभर आयीं, बोले- किन्तु हम धर्म और मर्यादा नही छोड़ सकते सैनिक।
तक्षक ने कहा- “मर्यादा का निर्वाह” उसके साथ किया जाता है जो मर्यादा का “अर्थ” समझते हों।
ये बर्बर धर्मोन्मत्त राक्षस हैं महाराज। इनके लिए हत्या और बलात्कार ही धर्म है।
– पर यह हमारा धर्म नही हैं वीर,….- राजा का केवल “एक ही धर्म” होता है महाराज, और वह है प्रजा की रक्षा। देवल और मुल्तान का युद्ध याद करें महाराज, जब कासिम की सेना ने दाहिर को पराजित करने के पश्चात प्रजा पर कितना अत्याचार किया था।
ईश्वर न करे, यदि हम पराजित हुए तो बर्बर अत्याचारी अरब हमारी स्त्रियों, बच्चों और निरीह प्रजा के साथ कैसा व्यवहार करेंगे, यह महाराज जानते हैं।….महाराज ने एक बार पूरी सभा की ओर निहारा, सबका मौन तक्षक के तर्कों से सहमत दिख रहा था।
महाराज अपने मुख्य सेनापतियों मंत्रियों और तक्षक के साथ गुप्त सभाकक्ष की ओर बढ़ गए।…अगले दिवस की संध्या तक कन्नौज की पश्चिम सीमा पर दोनों सेनाओं का पड़ाव हो चूका था, और आशा थी कि अगला प्रभात एक भीषण युद्ध का साक्षी होगा।…
आधी रात्रि बीत चुकी थी। अरब सेना अपने शिविर में निश्चिन्त सो रही थी। अचानक तक्षक के संचालन में कन्नौज की एक चौथाई सेना अरब शिविर पर टूट पड़ी।
अरबों को किसी “हिन्दू शासक से ” रात्रि युद्ध की आशा “न” थी। वे उठते,सावधान होते और हथियार सँभालते इसके पुर्व ही आधे अरब गाजर मूली की तरह काट डाले गए।
इस भयावह निशा में तक्षक का सौर्य अपनी पराकाष्ठा पर था। वह घोडा दौड़ाते जिधर निकल पड़ता उधर की भूमि शवों से पट जाती थी। उषा की प्रथम किरण से पुर्व अरबों की दो तिहाई सेना मारी जा चुकी थी। सुबह होते ही बची सेना पीछे भागी,…. किन्तु आश्चर्य! महाराज नागभट्ट अपनी शेष सेना के साथ उधर तैयार खड़े थे। दोपहर होते होते समूची अरब सेना काट डाली गयी। अपनी बर्बरता के बल पर विश्वविजय का स्वप्न देखने वाले आतंकियों को “”पहली बार”” किसी ने ऐसा उत्तर दिया था।…
विजय के बाद महाराज ने अपने सभी सेनानायकों की ओर देखा, उनमे तक्षक का कहीं पता नही था। सैनिकों ने युद्धभूमि में तक्षक की खोज प्रारंभ की तो देखा- लगभग हजार अरब सैनिकों के शव के बीच तक्षक की मृत देह दमक रही थी। उसे शीघ्र उठा कर महाराज के पास लाया गया। कुछ क्षण तक इस अद्भुत योद्धा की ओर चुपचाप देखने के पश्चात महाराज नागभट्ट आगे बढ़े और….तक्षक के चरणों में अपनी तलवार रख कर उसकी मृत देह को प्रणाम किया।…
युद्ध के पश्चात युद्धभूमि में पसरी नीरवता में … भारत का वह महान सम्राट “”गरज”” उठा- “”””आप आर्यावर्त की वीरता के शिखर थे तक्षक.”””…
भारत ने “अबतक” मातृभूमि की रक्षा में प्राण “”न्योछावर करना”” सीखा था,… आप ने मातृभूमि के लिए प्राण “”””लेना”””” सिखा दिया।
भारत युगों युगों तक आपका आभारी रहेगा।….
इतिहास साक्षी है, इस युद्ध के बाद अगले तीन शताब्दियों तक अरबों में भारत की तरफ आँख उठा कर देखने की हिम्मत नही हुई।…

Thursday, October 4, 2018

बड़का ढकाईच
बनारस में गंगा किनारे जो प्राचीन बसावट है, उसमें दक्षिण भारतीय, मराठी, गुजराती और बंगाली परिवारों की बड़ी संख्या है। ये सदियों से यहां रह रहे हैं। इनके अलग-अलग मोहल्ले हैं। पं. कुबेरनाथ सुकुल ने अपनी पुस्तक ‘वाराणसी वैभव’ में काशी के धार्मिक इतिहास की चर्चा करते हुए लिखा है- ‘पुराण काल में कर्नाटक, तैलंग, गुर्जर, महाराष्ट्र तथा आंध्र प्रदेश को, जो विंध्याचल के दक्षिण में थे, द्रविड़ देश माना जाता था और उनमें रहने वालों के लिए पंच द्रविड़ शब्द प्रयोग में आता है।’ वर्तमान बनारस में उमा घाट पर पंचद्रविड़ संस्थानम है। बनारस में दक्षिण भारतीय मूल के लोगों की बसावट सर्वाधिक दुर्गा घाट, ब्रह्मा घाट, हनुमान घाट, अगस्त्यकुंडा, दशाश्वमेध इलाकों में है। यहां करीब 10 हजार मतदाता हैं। इसी तरह हनुमान घाट, मानसरोवर घाट, केदार घाट आदि इलाकों में बड़ी संख्या में मराठी परिवार रहते हैं। इनमें भी करीब 10 हजार मतदाता हैं। 

Wednesday, October 3, 2018

मुग़ल कालीन हिन्दुस्तान में सम्राट अकबर के समय बिहार सूबे को छोटे-छोटे टुकड़ों में विभाजित कर 6 अलग-अलग सरकारें कायम की गई थी, जिनमें से चम्पारण भी एक था. बताया जाता है कि 1579 में बंगाल, बिहार और उड़ीसा में विद्रोह हो गया. सम्राट को कमज़ोर समझ अफगान के पठान भी बागी हो गए, बंजारों का लूट-पाट इतना बढ़ गया कि सम्राट अकबर चिन्तित हो गए. उनके दरबार में एक सेनापति उदय करण सिंह थे. इस विद्रोह को दबाने का भार उन्हें सौंपा गया. पटना के पास गंगा पार करते ही हाजीपुर में उदय करण सिंह का मुकाबला बंजारों से हो गया. लड़ाई में कुछ बंजारे मारे गए और बाकी बन्दी बना लिए गए. इसके बाद पूरा विद्रोह शान्त व खत्म हो गया..
सम्राट अकबर को जब इस जीत की सूचना मिली तो उन्होंने उदय करण सिंह को इनाम स्वरूप चम्पारण सरकार की बागडोर सौंपने का आदेश दे दिया. अकबर के जीवन पर्यन्त उदय करण सिंह एवं उनके बाद उदय करण सिंह के लड़के जदु सिंह चम्पारण की देखभाल करते रहे. इतिहास गवाह है कि राजा की उपाधि जदु सिंह के लड़के उग्रसेन सिंह को सम्राट शाहजहां के शासनकाल में सन् 1629 में दी गई. अर्थात बेतिया राज के प्रथम राजा उग्रसेन सिंह कहलाए. सन 1659 में उग्रसेन सिंह का देहान्त हो गया. उनके बाद उग्रसेन सिंह के एकमात्र पुत्र गज सिंह राजा बने जो 1694 तक राज करके स्वर्ग सिधार गए. इनके सबसे बड़े लड़के दिलीप सिंह को 1694 में राजा बनाया गया, लेकिन 1715 में यह भी परलोक वासी हो गए. इसके बाद इनके बड़े पुत्र ध्रुव सिंह को राजा बनाया गया. यह अब तक के सबसे सफल राजा माने गए. इन्होंने ही सुगांव से हटाकर बेतिया को अपनी राज की राजधानी बनाया.
कहा जाता है कि ध्रुव सिंह को कोई पुत्र नहीं हुआ. केवल दो लड़कियां हुई. ध्रुव सिंह ने देखा कि उनके पुत्र हीन होने के चलते उनका राज भाईयों के हाथ चला जाएगा, यही सोच कर उन्होंने अपने जीवन काल में ही अपने पुत्री के पुत्र युगलकिशोर सिंह को राज तिलक देकर राजा बना दिया. इस तरीके से ध्रुव सिंह ने अपने भाईयों के हाथ रियासत की सत्ता जाने से बचा तो ली मगर परिवार के बीच खाई जरूर पड़ गई. ध्रुव सिंह की मृत्यु 1762 में हो गई.
ध्रुव सिंह के मृत्यु के बाद राजा युगलकिशोर सिंह के ताज में कांटें लग गए. एक तरफ नाना के भाईयों का विरोध और दूसरी तरफ ईस्ट इंडिया कम्पनी की दहशत.. तनाव में आकर वे 1766 में ईस्ट इंडिया कम्पनी के विरूद्ध विद्रोह कर बैठे. विद्रोह दबाने के लिए कोलोनेल बारकर की अगुवाई में ईस्ट इंडिया कम्पनी के सिपाहियों ने बेतिया राज पर चढ़ाई कर दी। आखिरकार युगलकिशोर को भागना पड़ा. राजा युगलकिशोर के भागने के बाद ईस्ट इंडिया कम्पनी ने पूरे चम्पारण सरकार को अपने कब्ज़े में ले लिया.
वे पटना राजस्व परिषद द्वारा निर्गत परवाने के अनुपालन में सारण सरकार के सुपरवाइजर के समक्ष 25 मई 1771 को उपस्थित हुए और आत्म-समर्पण के बाद अगस्त 1771 में परगना मझौआ एवं सिमरौन हेतु अम्लदस्तक तैयार कर उन्हें दे दिया गया. युगलकिशोर सिंह की मृत्यु 1784 में हो गई, इसके बाद उनके पुत्र बृजकिशोर सिंह अपने पिता का मालिकाना हक पाते रहे. 1816 में यह भी दुनिया छोड़ कर चले गए..
इसके बाद इनके बड़े लड़के आनन्द किशोर सिंह ने सारण के कलेक्टर के यहां दाखिल खारिज कराकर एवं कुछ शर्तो को कबूल करके बेतिया राज को प्राप्त किया और इन्हें इस समय महाराजा की उपाधि से विभूषित किया गया. आनन्द किशोर सिंह संगीत प्रेमी थे, इन्हीं के समय ध्रुपद गायन की परम्परा बेतिया में चली. 29 जनवरी 1838 को महाराजा आनन्द किशोर स्वर्ग सिधार गए. इन्हें कोई संतान नहीं थी, इसलिए उनके भाई नवल किशोर राजा हुए. इन्होंने बेतिया राज का काफी विस्तार किया और 25 सितम्बर 1855 को यह भी काल के गाल में समा गए. इसके बाद पहली पत्नी के पुत्र राजेन्द्र किशोर सिंह गद्दी पर बैठे. इन्होंने बेतिया राज का काफी विस्तार किया. इनके दौर में ही बेतिया में रेलवे लाईन बिछी और ट्रेन चली. बेतिया का तारघर भी इनके कार्यकाल में बना. इन्होंने ही बनारस में अवतल बनवाएं और इलाहाबाद में घर खरीदा, (विशेष बात यह है कि इसी घर को देखने के लिए सिनेमा जगत के महानायक अमिताभ बच्चन ने बचपन में चोरी की थी.) 28 दिसम्बर 1883 को वे भी भगवान के प्यारे हो गए..
इनके मौत के बाद महाराजा हरेन्द्र किशोर राजगद्दी पर बैठे. और यही बेतिया राज के अंतिम महाराजा थे. इन्हें कोई संतान नहीं थी. 24 मार्च 1893 को इस दुनिया को अलविदा कह गए. इनकी दूसरी पत्नी 27 नवम्बर 1954 तक बेतिया राज दरबार को रौशन रखा. उसके बाद से बेतिया राज हमेशा-हमेशा के लिए अंधेरे में चला गया..

Monday, October 1, 2018

सदियों से बसे महाराष्ट्रीयों के लिए यह उत्सव जितना अपनी जड़ों से जुड़ने का अवसर था उससे ज्यादा काशी में अपने संबंधों को कृतज्ञतापूर्वक याद करने का। महाराष्ट्र के संतों से काशी का उतना ही नाता रहा, जितना उसके योद्धाओं और वीर पुरुषों का। रानी लक्ष्मीबाई का यह जन्मस्थान छत्रपति शिवाजी को बहुत प्रिय रहा। आगरा में औरंगजेब की कैद से भागते समय शिवाजी के काशी आने की चर्चा कुछ इतिहासकारों ने की है। काशी के आचार्य गागा भट्ट को उन्होंने राज्याभिषेक के लिए आमंत्रित किया। शिवाजी के गुरू संत रामदास ने दो बार की अपनी काशी यात्रा के दौरान मंगला गौरी मोहल्ले में राम जानकी मंदिर की स्थापना की, जो स्वामीजी द्वारा धुले में स्थापित मंदिर का प्रतिरूप है। आज भी यहां पूजा महाराष्ट्रीय पुजारियों द्वारा ही की जाती है। महाराष्ट्र के दूसरे महान संत एकनाथजी ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथों 'नाथ भागवत' व 'रुक्मिणी स्वयंवर' की रचना काशी के आत्मावीरेश्वर मंदिर (संकठा घाट) के पास रहते हुए की। 1857 के गदर के दौरान तात्या टोपे की सेना द्वारा बनवाया गणेश दीक्षित लेन का तारक मठ आज भी मौजूद है।
गुप्तकाल से ही इस पुण्यक्षेत्र और विद्या क्षेत्र में महाराष्ट्रीयों की आमद-रफ्त जारी है-महाराष्ट्र के पंडितों के विशेष अनुराग के साथ जिन्हें धनी-मानियों ने जीविका की समस्या कभी नहीं होने दी। चार शताब्दियों में रोजगार-धंधे के सिलसिले में महाराष्ट्र से जो भी बाहर निकले उनमें सबसे अधिक काशी जाकर बसे। आज यहां 900 से ज्यादा महाराष्ट्रीय परिवार उन्हींकी संतान हैं। गाय घाट, पंचगंगा घाट, दशाश्वमेध घाट, ब्रह्मा घाट, दुर्गा घाट और अस्सी घाट में घनी बसाहट के साथ 'मराठी गली' नाम से शहर में मराठियों का एक मोहल्ला ही है। गणेशोत्सव के दौरान शहर के मंडपों में स्थापित होने वाली गणेश प्रतिमाओं में दो दर्जन से ज्यादा काशी मराठा गणेश उत्सव समिति के मराठी मंडलों की होती हैं। बालासाहेब ठाकरे से मिलने की यादें अभी भी संजोए और यदा-कदा मुंबई के मराठी अखबारों में लिखते रहने वाले घासी टोला के ज्योतिषी उपेंद्र सहस्रबुधे जैसे कितने ही लोग हैं जिन्हें अपनी मराठी जड़ों जितना ही गर्व काशी से अपने संबंधों पर है। महाराष्ट्र की काशी कहलाने वाले वई से आए सहस्रबुधे वंश की यह नौंवी पीढ़ी है।
सान फ्रांसिस्को में बसे महेश काले हमें 'सुबहे-बनारस' के दिव्य अनुभव के बारे में बताने लगे। काले का पुश्तैनी घर इतिहास प्रसिद्ध नाना फडणवीस के वाडा से ज्यादा दूर नहीं है। पेशवाओं के सबसे प्रसिद्ध सेनानी के परिवार के नाम इस वाडा के अलावा दो छोटे घाट और दो शिव व गणेश मंदिर हैं। मौजूदा वारिस महेंद्र पेशवा वर्ष में एक बार काशी जरूर आते हैं। फणनवीस वाडा और काशी महाराष्ट्र भवन तीर्थयात्रा के लिए काशी आने वालों के लिए आज अतिथिगृह के रूप में काम आते हैं। अखिल भारतीय महाराष्ट्र तीर्थ पुरोहित महासंघ के पदाधिकारी गजधर कृष्ण देव इन तीर्थयात्रियों के लिए सबसे प्रमुख संपर्क सूत्र हैं, जबकि काशी मराठी समाज और महाराष्ट्र मंडल जैसी संस्थाएं काशी वासियों से संपर्क बनाने के पुल। जाने-माने पहलवान कोण भट्ट और अताले, शास्त्रीय गायक महेश काले, पुरातत्वविद नीलू पी. जोशी और संगीतकार रेवती साकलकर अपने उत्कर्ष का श्रेय काशी को ही देती हैं।
महाराष्ट्र की अमिट छाप
काशी के इस स्वागत के बदले महाराष्ट्र ने बहुत कुछ दिया? 17वीं शताब्दी में जब काशी मुस्लिम आक्रांताओं के अत्याचारों से कराह रही थी, मराठा शासक उसके पुनर्निर्माण में हाथ बंटा रहे थे। काशी के महापौर रामगोपाल मोहले बताते हैं, 'महाराष्ट्रवासियों ने अपनी अलग पहचान बनाई है।' यह पहचान जीवन के हर क्षेत्र में है। काशी के 80 में से कम से 25 घाट मराठा शासकों के ही निर्माण या पुनर्निर्माण करवाए हुए हैं। यह कार्य 18वीं शताब्दी के आरंभिक वर्षों-पेशवाई के पुनरोत्थान काल में, तकरीबन उन्हीं दिनों शुरू हुआ जब महाराष्ट्रवासी काशी में बसने शुरू हुए। इंदौर की महारानी अहिल्याबाई ने काशी के भग्न विश्वनाथ मंदिर की ही तरह मणिकर्णिका व दशाश्वमेध घाट का भी पुनर्निर्माण कराया। सबसे ज्यादा घाटों का निर्माण बाजीराव पेशवा के शासनकाल में हुआ। इनमें ग्वालियर की महारानी बायजाबाई का सिंधिया घाट, पेशवाओं के बाजीराव घाट और अग्नीश्वर घाट और भोसले राजा का भोसला घाट शामिल हैं। कई मंदिरों का निर्माण या जीर्णोद्धार उन्हींकी देन है। काशी हिंदू विश्वविद्यालय की सेंट्रल लाइब्रेरी बडोदरा नरेश सयाजीराव गायकवाड की ही बनवाई हुई है। विनोबा भावे, गजानन माधव 'मुक्तिबोध' और जयंत नार्लिकर को काशी उसी गर्व से अपना कहती है जैसे लाल बहादुर शास्त्री, मदनमोहन मालवीय, प्रेमचंद और अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को।
काशीवासी अभिमान से याद करते हैं कि जब महाराष्ट्र के ब्राह्मणों ने शिवाजी महाराज को छत्रिय मानते से इनकार कर उनके राज्याभिषेक से इनकार कर दिया था, काशी के आचार्य गागा भट्ट ने इस चुनौती को स्वीकार किया। चार सदियों से रहते महाराष्ट्रीय काशी में दूध में शक्कर की तरह मिल गए। एक महाराष्ट्रीय संस्कृत विद्वान बताने लगे कि कुछ वर्ष पहले जब एक राजनीतिक दल अपने हमलों से मुंबई के उत्तर भारतीयों के लिए आतंक बना हुआ था, खैरियत पूछने के लिए महाराष्ट्र से कई फोन आए। 1934 से यहां बसे मराठी परिवार के चार्टर्ड अकाउंटेंट अनिरुद्ध पुसलकर से बातचीत याद आती है 'खतरे का कभी ख्याल तक नहीं आया।' विश्वविद्यालय के मराठी विभाग के छात्र ने बताया, 'हमें कहीं और जाने की जरूरत ही नहीं। काशी में ही एक छोटा महाराष्ट्र मौजूद है।' बालपन का साथी आनंद पुरंदरे हो, बीएचयू के प्रफेसर रानाडे या पत्रकारीय संगी नावडजी- बनारस में बचपन और युवावस्था का हिस्सा बिताने वाले इस लेखक की महसूसी बात है-घाटों से जुड़ी गलियों में सदियों से रह रहे मराठी मानुस घरों में पूरणपोली, अनरसा, चकली और श्रीखंड जीमते जिस तरह माईबोली मराठी बोलते हैं गली में निकलते ही हलवाई की दुकान पर कचौड़ी-जलेबी व लस्सी का भोग लगाने के बाद, पान घुलाकर मीठी भोजपुरी में बतियाते खांटी बनारसी बन जाते हैं।
अनन्य हिंदी प्रेम
महाराष्ट्रीयों के लिए महाराष्ट्र के बाहर अगर कोई सबसे पूज्य स्थान है तो काशी। मुंबई में वालकेश्वर और भूलेश्वर इलाकों के वासी खुद को काशीवासी कहकर प्रसन्न होते हैं। खुद वई में काशी विश्वेश्वर मंदिर के साथ एक छोटी काशी ही मौजूद है। लिपि की समानता के कारण महाराष्ट्रीयों ने हिंदी को जिस सहजता से आत्मसात किया उतना और किसी भाषा को नहीं। शिवाजी को हिंदी प्रेम पिता शहाजी से प्राप्त हुआ, जिनके दरबार में देव कवि काशीवाले सहित काशी के कई कवि थे। कवि भूषण तो शिवाजी के कारण ही अमर हुए हैं। शिवाजी के पुत्र संभाजी ने तो कई पुस्तकें हिंदी में लिखीं। महाराष्ट्र में बाद के राजाओं ने यह रीत कायम रखी।
हिंदी राजधानी काशी में हिंदी पत्रकारिता या लेखन में आने वालों में सबसे बड़ी तादाद मराठीभाषियों की ही है जिन्होंने हिंदी को कुछ शीर्ष संपादक दिए। 1845 में हिंदी क्षेत्र से छपे पहले अखबार राजा शिवप्रसाद 'सितारे हिंद' के 'बनारस अखबार' का संपादक गोविंद रघुनाथ थत्ते को माना जाता है। लोकमान्य तिलक के हिंदी 'केसरी' के लिए प्रेरणा 1905 की काशी यात्रा ही थी। इसकी कमान उन्होंने माधवराव सप्रे को सौंपी, जिनकी कर्मभूमि भले मध्य प्रदेश रही, पर काशी से अटूट रिश्ते के साथ। हिंदी पत्रकारिता में काशी के 'आज' के बाबूराव विष्णु पराडकर का योगदान कौन भूल सकता है! पं. लक्ष्मीनारायण गर्दे काशी के अखबारों के अलावा कलकत्ते के 'भारत मित्र' और मुंबई के 'वेंटकेश्वर समाचार' के भी संपादक रहे। रघुनाथ खाडिलकर ने पराडकरजी के निधन के बाद 'आज' के प्रधान संपादक बनने से पहले 'केसरी' में एक छोटी पारी खेली। गिनते जाइए-सखाराम गोविंद देऊस्कर, दामोदर विष्णु सप्रे, नारायण व्यंकटेश दामले, गोविंदराव मराठे, मंगलमाधव पराडकर, महादेव गोविंद कानिटकर, गोविंद नरहरि बैजापुरकर, अशोक पराडकर, काशीनाथ गोविंद जोगलेकर, बी. डी. खांडेकर, शंकर माधव सप्रे, माधवराव पराडकर, रामचंद्र नरहर बापट, मनोहर खाडिलकर ...।
पांडित्य परंपरा
नारायण भट्ट का भट्ट कुल अपूर्व विद्वानों से भरा है। पं. दामोदर शास्त्री का शास्त्रार्थ महारत आज भी याद किया जाता है। संस्कृत, व्याकरण व अलंकार शास्त्र हो या न्याय, कर्मकांड, वेद-वेदांत, पुराण, आयुर्वेद व तंत्र शास्त्र- काशी की विद्वत परंपरा नीलकंठ शास्त्री गोरे, पं, गणपति शास्त्री हेब्बार, पं. माधव बाल शास्त्री दातार, पं. जनार्दन शास्त्री खुंटे, पं. रामचंद्र शास्त्री रटाटे, पं. माधव शास्त्री भंडारी, पं. गोपाल शास्त्री नेने, पं. अनंत शास्त्री फडके, पं. नारायण शास्त्री ख्रिस्ते, केशव शास्त्री मराठे, तात्या शास्त्री, बाल शास्त्री, बापूदेव शास्त्री, राघव भट्ट, गागा भट्ट, विश्वनाथ भट्ट रानाडे सरीखे महाराष्ट्रीय विद्वानों से भरी है। वैदिक परंपरा तो महाराष्ट्रीय वैदिकों बिना अधूरी ही है। पेशवाई शाही खजाने से हर वर्ष तीन लाख रुपये ब्राह्मणों की दक्षिणा में खर्च होते थे। काशी में पेशवा के प्रतिनिधियों का काम ही था ब्राह्मण भोज करवाना और मंदिर व घाट बनवाना। महाराष्ट्रीय ब्राह्मण-जो पेशवाओं के लिए धार्मिक अनुष्ठान करते उनके लिए उन्होंने नीची ब्रह्मपुरी सहित कई ब्रह्मपुरियां बनाईं। वेदाध्ययन के लिए जागीरें देने के साथ वे मूर्धन्य वैदिकों को स्वर्ण मुद्राओं से भी सम्मानित करते रहे। दिनकर अन्ना जोशी, मामा पेंडशे, डोंगरेजी और विनायकभट काले की वेद पाठशाला सहित यहां की कई वेद पाठशालाएं अपने अस्तित्व के लिए पेशवाओं की ही ऋणी हैं। काशी में वसंत पूजा की परंपरा पेशवाई की ही आरंभ की हुई है। मराठों ने कई बार काशी पर कब्जे की योजना बनाई, पर खुद काशीवासियों के विरोध के कारण वे इसपर अमल नहीं कर पाए।
दादासाहब फालके का अज्ञातवास
भारतीय सिनेमा के पितामह दादासाहब फालके ने जीवन के उत्तर काल के दो वर्ष काशी में अज्ञातवास में गुजारे, जिस दौरान उनके निधन की अफवाह फैल गई थी। मई, 1920 में अपनी हिंदुस्तान फिल्म्स कंपनी के साझीदारों से विवाद के बाद इस्तीफा देकर फालके ने फिल्म जगत से नाता तोड़ लिया था। 1920-1922 का यह अरसा उन्होंने काशी में ब्रह्माघाट के सरदार आंग्रेवाडा में लगभग निस्संग गुजारा। 1920 में काशी में कांग्रेस के महाधिवेशन में लोकमान्य गंगाधर तिलक काशी आए तो उनसे मिले। फालके उस समय अपने मित्र नारायण हरि आप्टे की मदद से अर्धआत्मवृत्त 'रंगभूमि' लिख रहे थे। तिलक ने रंगमंच बनवाने की पेशकश की, पर उनके असमय निधन से यह काम पूरा नहीं हो सकता। महाराष्ट्र लौटकर फालके ने विभिन्न शहरों में इस नाटक का प्रदर्शन किया।
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काशी से गहरा नाता
- महाराष्ट्र की तरह काशी में सार्वजनिक गणेशोत्सव (भैरोनाथ पर) की परंपरा लोकमान्य बालगंगाधर तिलक की ही शुरू की हुई है। तिलक के हिंदी 'केसरी' की प्रेरणा 1905 की उनकी काशी यात्रा ही थी।
- शिवाजी के आगरा में औरंगजेब की कैद से भागते समय काशी आने की चर्चा मिलती है। आगरा में उन्होंने औरंगजेब से काशीवास की अनुमति मांगी थी।
- 1857 के विद्रोह की नायिका रानी लक्ष्मीबाई का जन्म काशी के अस्सी क्षेत्र के भदैनी में पेशवा बाजीराव के कर्मचारी मोरोपंत तांबे तथा भागीरथीबाई के घर में 19 नवंबर, 1835 को हुआ था। उनका बचपन का नाम मणिकर्णिका था, परंतु प्यार से उन्हें मनु कहा जाता था। लक्ष्मीबाई का घर आज स्मारक और काशी का मुख्य आकर्षण है।
- रायगड में शिवाजी का राज्याभिषेक करने वाले आचार्य गागा भट्ट काशी के थे।
- समर्थ रामदास ने दो बार काशी यात्रा की।
- संत एकनाथजी ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथों 'नाथ भागवत' व 'रुक्मिणी स्वयंवर' की रचना यहीं की।
- हिंदी पत्रकारिता के पुरोधा बाबूराव विष्णु पराडकर महाराष्ट्रीय थे, जबकि 'बनारस अखबार' के संपादक गोविंद रघुनाथ थत्ते हिंदी क्षेत्र से छपे पहले अखबार के संपादक।
- काशी के डिविजनल कमिश्नर नितिन रमेश गोकर्ण मुंबईकर हैं।
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अटूट हैं काशी और महाराष्ट्र के रिश्ते
मुंबई विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में उच्च डिग्री और फिर आईएएस-वाराणसी के डिविजनल कमिश्नर नितिन रमेश गोकर्ण ने अपने कामों से काशीवासियों के दिलों में विशेष स्थान बनाया है। विमल मिश्र ने महाराष्ट्र वासियों द्वारा पहली बार काशी में सार्वजनिक रूप से मनाए गए गुढी पाडवा के संदर्भ में उनसे बातचीत की।
उत्सव का प्रतिसाद कैसा रहा?
अद्भुत। इस तरह का कार्यक्रम पहली बार होने के बावजूद घाट पूरी तरह ठसाठस भरे थे। इस कार्यक्रम ने काशी और महाराष्ट्र के प्राचीन संबंधों को नई दिशा दी है।
काशी की मुख्य धारा में महाराष्ट्रवासियों का स्थान और योगदान क्या है?
काशी उदार और सर्वसमावेशी है। काशी वैसा ही कास्मोपोलिटन शहर है जैसा मुंबई। घाट हों, मंदिर हों या सार्वजनिक जीवन-महाराष्ट्रीय काशी की संस्कृति में समरस हो गए हैं। अध्यात्म की प्रबलता वाले इस शहर में बांध लेने वाला अद्भुत गुण है यह बात 23 वर्ष मुंबई में बिताने के बाद भी मैं कह सकता हूं।
काशी की छवि को किस तरह से और निखारा जा सकता है?
काशी में हर वर्ष 55 लाख से ज्यादा पर्यटक आते हैं। हमारी योजना 'हर-हर गंगे' जैसा उत्सव नियमित रूप से आयोजित करने की है। बल्कि हम ऐसे आयोजन यहां सदियों से रह रहे हर प्रमुख क्षेत्र के वासियों के लिए करने की कोशिश करेंगे।
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सदियों से बसे महाराष्ट्रीयों के लिए यह उत्सव जितना अपनी जड़ों से जुड़ने का अवसर था उससे ज्यादा काशी में अपने संबंधों को कृतज्ञतापूर्वक याद करने का। महाराष्ट्र के संतों से काशी का उतना ही नाता रहा, जितना उसके योद्धाओं और वीर पुरुषों का। रानी लक्ष्मीबाई का यह जन्मस्थान छत्रपति शिवाजी को बहुत प्रिय रहा। आगरा में औरंगजेब की कैद से भागते समय शिवाजी के काशी आने की चर्चा कुछ इतिहासकारों ने की है। काशी के आचार्य गागा भट्ट को उन्होंने राज्याभिषेक के लिए आमंत्रित किया। शिवाजी के गुरू संत रामदास ने दो बार की अपनी काशी यात्रा के दौरान मंगला गौरी मोहल्ले में राम जानकी मंदिर की स्थापना की, जो स्वामीजी द्वारा धुले में स्थापित मंदिर का प्रतिरूप है। आज भी यहां पूजा महाराष्ट्रीय पुजारियों द्वारा ही की जाती है। महाराष्ट्र के दूसरे महान संत एकनाथजी ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथों 'नाथ भागवत' व 'रुक्मिणी स्वयंवर' की रचना काशी के आत्मावीरेश्वर मंदिर (संकठा घाट) के पास रहते हुए की। 1857 के गदर के दौरान तात्या टोपे की सेना द्वारा बनवाया गणेश दीक्षित लेन का तारक मठ आज भी मौजूद है।
गुप्तकाल से ही इस पुण्यक्षेत्र और विद्या क्षेत्र में महाराष्ट्रीयों की आमद-रफ्त जारी है-महाराष्ट्र के पंडितों के विशेष अनुराग के साथ जिन्हें धनी-मानियों ने जीविका की समस्या कभी नहीं होने दी। चार शताब्दियों में रोजगार-धंधे के सिलसिले में महाराष्ट्र से जो भी बाहर निकले उनमें सबसे अधिक काशी जाकर बसे। आज यहां 900 से ज्यादा महाराष्ट्रीय परिवार उन्हींकी संतान हैं। गाय घाट, पंचगंगा घाट, दशाश्वमेध घाट, ब्रह्मा घाट, दुर्गा घाट और अस्सी घाट में घनी बसाहट के साथ 'मराठी गली' नाम से शहर में मराठियों का एक मोहल्ला ही है। गणेशोत्सव के दौरान शहर के मंडपों में स्थापित होने वाली गणेश प्रतिमाओं में दो दर्जन से ज्यादा काशी मराठा गणेश उत्सव समिति के मराठी मंडलों की होती हैं। बालासाहेब ठाकरे से मिलने की यादें अभी भी संजोए और यदा-कदा मुंबई के मराठी अखबारों में लिखते रहने वाले घासी टोला के ज्योतिषी उपेंद्र सहस्रबुधे जैसे कितने ही लोग हैं जिन्हें अपनी मराठी जड़ों जितना ही गर्व काशी से अपने संबंधों पर है। महाराष्ट्र की काशी कहलाने वाले वई से आए सहस्रबुधे वंश की यह नौंवी पीढ़ी है।
सान फ्रांसिस्को में बसे महेश काले हमें 'सुबहे-बनारस' के दिव्य अनुभव के बारे में बताने लगे। काले का पुश्तैनी घर इतिहास प्रसिद्ध नाना फडणवीस के वाडा से ज्यादा दूर नहीं है। पेशवाओं के सबसे प्रसिद्ध सेनानी के परिवार के नाम इस वाडा के अलावा दो छोटे घाट और दो शिव व गणेश मंदिर हैं। मौजूदा वारिस महेंद्र पेशवा वर्ष में एक बार काशी जरूर आते हैं। फणनवीस वाडा और काशी महाराष्ट्र भवन तीर्थयात्रा के लिए काशी आने वालों के लिए आज अतिथिगृह के रूप में काम आते हैं। अखिल भारतीय महाराष्ट्र तीर्थ पुरोहित महासंघ के पदाधिकारी गजधर कृष्ण देव इन तीर्थयात्रियों के लिए सबसे प्रमुख संपर्क सूत्र हैं, जबकि काशी मराठी समाज और महाराष्ट्र मंडल जैसी संस्थाएं काशी वासियों से संपर्क बनाने के पुल। जाने-माने पहलवान कोण भट्ट और अताले, शास्त्रीय गायक महेश काले, पुरातत्वविद नीलू पी. जोशी और संगीतकार रेवती साकलकर अपने उत्कर्ष का श्रेय काशी को ही देती हैं।
महाराष्ट्र की अमिट छाप
काशी के इस स्वागत के बदले महाराष्ट्र ने बहुत कुछ दिया? 17वीं शताब्दी में जब काशी मुस्लिम आक्रांताओं के अत्याचारों से कराह रही थी, मराठा शासक उसके पुनर्निर्माण में हाथ बंटा रहे थे। काशी के महापौर रामगोपाल मोहले बताते हैं, 'महाराष्ट्रवासियों ने अपनी अलग पहचान बनाई है।' यह पहचान जीवन के हर क्षेत्र में है। काशी के 80 में से कम से 25 घाट मराठा शासकों के ही निर्माण या पुनर्निर्माण करवाए हुए हैं। यह कार्य 18वीं शताब्दी के आरंभिक वर्षों-पेशवाई के पुनरोत्थान काल में, तकरीबन उन्हीं दिनों शुरू हुआ जब महाराष्ट्रवासी काशी में बसने शुरू हुए। इंदौर की महारानी अहिल्याबाई ने काशी के भग्न विश्वनाथ मंदिर की ही तरह मणिकर्णिका व दशाश्वमेध घाट का भी पुनर्निर्माण कराया। सबसे ज्यादा घाटों का निर्माण बाजीराव पेशवा के शासनकाल में हुआ। इनमें ग्वालियर की महारानी बायजाबाई का सिंधिया घाट, पेशवाओं के बाजीराव घाट और अग्नीश्वर घाट और भोसले राजा का भोसला घाट शामिल हैं। कई मंदिरों का निर्माण या जीर्णोद्धार उन्हींकी देन है। काशी हिंदू विश्वविद्यालय की सेंट्रल लाइब्रेरी बडोदरा नरेश सयाजीराव गायकवाड की ही बनवाई हुई है। विनोबा भावे, गजानन माधव 'मुक्तिबोध' और जयंत नार्लिकर को काशी उसी गर्व से अपना कहती है जैसे लाल बहादुर शास्त्री, मदनमोहन मालवीय, प्रेमचंद और अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को।
काशीवासी अभिमान से याद करते हैं कि जब महाराष्ट्र के ब्राह्मणों ने शिवाजी महाराज को छत्रिय मानते से इनकार कर उनके राज्याभिषेक से इनकार कर दिया था, काशी के आचार्य गागा भट्ट ने इस चुनौती को स्वीकार किया। चार सदियों से रहते महाराष्ट्रीय काशी में दूध में शक्कर की तरह मिल गए। एक महाराष्ट्रीय संस्कृत विद्वान बताने लगे कि कुछ वर्ष पहले जब एक राजनीतिक दल अपने हमलों से मुंबई के उत्तर भारतीयों के लिए आतंक बना हुआ था, खैरियत पूछने के लिए महाराष्ट्र से कई फोन आए। 1934 से यहां बसे मराठी परिवार के चार्टर्ड अकाउंटेंट अनिरुद्ध पुसलकर से बातचीत याद आती है 'खतरे का कभी ख्याल तक नहीं आया।' विश्वविद्यालय के मराठी विभाग के छात्र ने बताया, 'हमें कहीं और जाने की जरूरत ही नहीं। काशी में ही एक छोटा महाराष्ट्र मौजूद है।' बालपन का साथी आनंद पुरंदरे हो, बीएचयू के प्रफेसर रानाडे या पत्रकारीय संगी नावडजी- बनारस में बचपन और युवावस्था का हिस्सा बिताने वाले इस लेखक की महसूसी बात है-घाटों से जुड़ी गलियों में सदियों से रह रहे मराठी मानुस घरों में पूरणपोली, अनरसा, चकली और श्रीखंड जीमते जिस तरह माईबोली मराठी बोलते हैं गली में निकलते ही हलवाई की दुकान पर कचौड़ी-जलेबी व लस्सी का भोग लगाने के बाद, पान घुलाकर मीठी भोजपुरी में बतियाते खांटी बनारसी बन जाते हैं।
अनन्य हिंदी प्रेम
महाराष्ट्रीयों के लिए महाराष्ट्र के बाहर अगर कोई सबसे पूज्य स्थान है तो काशी। मुंबई में वालकेश्वर और भूलेश्वर इलाकों के वासी खुद को काशीवासी कहकर प्रसन्न होते हैं। खुद वई में काशी विश्वेश्वर मंदिर के साथ एक छोटी काशी ही मौजूद है। लिपि की समानता के कारण महाराष्ट्रीयों ने हिंदी को जिस सहजता से आत्मसात किया उतना और किसी भाषा को नहीं। शिवाजी को हिंदी प्रेम पिता शहाजी से प्राप्त हुआ, जिनके दरबार में देव कवि काशीवाले सहित काशी के कई कवि थे। कवि भूषण तो शिवाजी के कारण ही अमर हुए हैं। शिवाजी के पुत्र संभाजी ने तो कई पुस्तकें हिंदी में लिखीं। महाराष्ट्र में बाद के राजाओं ने यह रीत कायम रखी।
हिंदी राजधानी काशी में हिंदी पत्रकारिता या लेखन में आने वालों में सबसे बड़ी तादाद मराठीभाषियों की ही है जिन्होंने हिंदी को कुछ शीर्ष संपादक दिए। 1845 में हिंदी क्षेत्र से छपे पहले अखबार राजा शिवप्रसाद 'सितारे हिंद' के 'बनारस अखबार' का संपादक गोविंद रघुनाथ थत्ते को माना जाता है। लोकमान्य तिलक के हिंदी 'केसरी' के लिए प्रेरणा 1905 की काशी यात्रा ही थी। इसकी कमान उन्होंने माधवराव सप्रे को सौंपी, जिनकी कर्मभूमि भले मध्य प्रदेश रही, पर काशी से अटूट रिश्ते के साथ। हिंदी पत्रकारिता में काशी के 'आज' के बाबूराव विष्णु पराडकर का योगदान कौन भूल सकता है! पं. लक्ष्मीनारायण गर्दे काशी के अखबारों के अलावा कलकत्ते के 'भारत मित्र' और मुंबई के 'वेंटकेश्वर समाचार' के भी संपादक रहे। रघुनाथ खाडिलकर ने पराडकरजी के निधन के बाद 'आज' के प्रधान संपादक बनने से पहले 'केसरी' में एक छोटी पारी खेली। गिनते जाइए-सखाराम गोविंद देऊस्कर, दामोदर विष्णु सप्रे, नारायण व्यंकटेश दामले, गोविंदराव मराठे, मंगलमाधव पराडकर, महादेव गोविंद कानिटकर, गोविंद नरहरि बैजापुरकर, अशोक पराडकर, काशीनाथ गोविंद जोगलेकर, बी. डी. खांडेकर, शंकर माधव सप्रे, माधवराव पराडकर, रामचंद्र नरहर बापट, मनोहर खाडिलकर ...।
पांडित्य परंपरा
नारायण भट्ट का भट्ट कुल अपूर्व विद्वानों से भरा है। पं. दामोदर शास्त्री का शास्त्रार्थ महारत आज भी याद किया जाता है। संस्कृत, व्याकरण व अलंकार शास्त्र हो या न्याय, कर्मकांड, वेद-वेदांत, पुराण, आयुर्वेद व तंत्र शास्त्र- काशी की विद्वत परंपरा नीलकंठ शास्त्री गोरे, पं, गणपति शास्त्री हेब्बार, पं. माधव बाल शास्त्री दातार, पं. जनार्दन शास्त्री खुंटे, पं. रामचंद्र शास्त्री रटाटे, पं. माधव शास्त्री भंडारी, पं. गोपाल शास्त्री नेने, पं. अनंत शास्त्री फडके, पं. नारायण शास्त्री ख्रिस्ते, केशव शास्त्री मराठे, तात्या शास्त्री, बाल शास्त्री, बापूदेव शास्त्री, राघव भट्ट, गागा भट्ट, विश्वनाथ भट्ट रानाडे सरीखे महाराष्ट्रीय विद्वानों से भरी है। वैदिक परंपरा तो महाराष्ट्रीय वैदिकों बिना अधूरी ही है। पेशवाई शाही खजाने से हर वर्ष तीन लाख रुपये ब्राह्मणों की दक्षिणा में खर्च होते थे। काशी में पेशवा के प्रतिनिधियों का काम ही था ब्राह्मण भोज करवाना और मंदिर व घाट बनवाना। महाराष्ट्रीय ब्राह्मण-जो पेशवाओं के लिए धार्मिक अनुष्ठान करते उनके लिए उन्होंने नीची ब्रह्मपुरी सहित कई ब्रह्मपुरियां बनाईं। वेदाध्ययन के लिए जागीरें देने के साथ वे मूर्धन्य वैदिकों को स्वर्ण मुद्राओं से भी सम्मानित करते रहे। दिनकर अन्ना जोशी, मामा पेंडशे, डोंगरेजी और विनायकभट काले की वेद पाठशाला सहित यहां की कई वेद पाठशालाएं अपने अस्तित्व के लिए पेशवाओं की ही ऋणी हैं। काशी में वसंत पूजा की परंपरा पेशवाई की ही आरंभ की हुई है। मराठों ने कई बार काशी पर कब्जे की योजना बनाई, पर खुद काशीवासियों के विरोध के कारण वे इसपर अमल नहीं कर पाए।
दादासाहब फालके का अज्ञातवास
भारतीय सिनेमा के पितामह दादासाहब फालके ने जीवन के उत्तर काल के दो वर्ष काशी में अज्ञातवास में गुजारे, जिस दौरान उनके निधन की अफवाह फैल गई थी। मई, 1920 में अपनी हिंदुस्तान फिल्म्स कंपनी के साझीदारों से विवाद के बाद इस्तीफा देकर फालके ने फिल्म जगत से नाता तोड़ लिया था। 1920-1922 का यह अरसा उन्होंने काशी में ब्रह्माघाट के सरदार आंग्रेवाडा में लगभग निस्संग गुजारा। 1920 में काशी में कांग्रेस के महाधिवेशन में लोकमान्य गंगाधर तिलक काशी आए तो उनसे मिले। फालके उस समय अपने मित्र नारायण हरि आप्टे की मदद से अर्धआत्मवृत्त 'रंगभूमि' लिख रहे थे। तिलक ने रंगमंच बनवाने की पेशकश की, पर उनके असमय निधन से यह काम पूरा नहीं हो सकता। महाराष्ट्र लौटकर फालके ने विभिन्न शहरों में इस नाटक का प्रदर्शन किया।
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काशी से गहरा नाता
- महाराष्ट्र की तरह काशी में सार्वजनिक गणेशोत्सव (भैरोनाथ पर) की परंपरा लोकमान्य बालगंगाधर तिलक की ही शुरू की हुई है। तिलक के हिंदी 'केसरी' की प्रेरणा 1905 की उनकी काशी यात्रा ही थी।
- शिवाजी के आगरा में औरंगजेब की कैद से भागते समय काशी आने की चर्चा मिलती है। आगरा में उन्होंने औरंगजेब से काशीवास की अनुमति मांगी थी।
- 1857 के विद्रोह की नायिका रानी लक्ष्मीबाई का जन्म काशी के अस्सी क्षेत्र के भदैनी में पेशवा बाजीराव के कर्मचारी मोरोपंत तांबे तथा भागीरथीबाई के घर में 19 नवंबर, 1835 को हुआ था। उनका बचपन का नाम मणिकर्णिका था, परंतु प्यार से उन्हें मनु कहा जाता था। लक्ष्मीबाई का घर आज स्मारक और काशी का मुख्य आकर्षण है।
- रायगड में शिवाजी का राज्याभिषेक करने वाले आचार्य गागा भट्ट काशी के थे।
- समर्थ रामदास ने दो बार काशी यात्रा की।
- संत एकनाथजी ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथों 'नाथ भागवत' व 'रुक्मिणी स्वयंवर' की रचना यहीं की।
- हिंदी पत्रकारिता के पुरोधा बाबूराव विष्णु पराडकर महाराष्ट्रीय थे, जबकि 'बनारस अखबार' के संपादक गोविंद रघुनाथ थत्ते हिंदी क्षेत्र से छपे पहले अखबार के संपादक।
- काशी के डिविजनल कमिश्नर नितिन रमेश गोकर्ण मुंबईकर हैं।
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अटूट हैं काशी और महाराष्ट्र के रिश्ते
मुंबई विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में उच्च डिग्री और फिर आईएएस-वाराणसी के डिविजनल कमिश्नर नितिन रमेश गोकर्ण ने अपने कामों से काशीवासियों के दिलों में विशेष स्थान बनाया है। विमल मिश्र ने महाराष्ट्र वासियों द्वारा पहली बार काशी में सार्वजनिक रूप से मनाए गए गुढी पाडवा के संदर्भ में उनसे बातचीत की।
उत्सव का प्रतिसाद कैसा रहा?
अद्भुत। इस तरह का कार्यक्रम पहली बार होने के बावजूद घाट पूरी तरह ठसाठस भरे थे। इस कार्यक्रम ने काशी और महाराष्ट्र के प्राचीन संबंधों को नई दिशा दी है।
काशी की मुख्य धारा में महाराष्ट्रवासियों का स्थान और योगदान क्या है?
काशी उदार और सर्वसमावेशी है। काशी वैसा ही कास्मोपोलिटन शहर है जैसा मुंबई। घाट हों, मंदिर हों या सार्वजनिक जीवन-महाराष्ट्रीय काशी की संस्कृति में समरस हो गए हैं। अध्यात्म की प्रबलता वाले इस शहर में बांध लेने वाला अद्भुत गुण है यह बात 23 वर्ष मुंबई में बिताने के बाद भी मैं कह सकता हूं।
काशी की छवि को किस तरह से और निखारा जा सकता है?
काशी में हर वर्ष 55 लाख से ज्यादा पर्यटक आते हैं। हमारी योजना 'हर-हर गंगे' जैसा उत्सव नियमित रूप से आयोजित करने की है। बल्कि हम ऐसे आयोजन यहां सदियों से रह रहे हर प्रमुख क्षेत्र के वासियों के लिए करने की कोशिश करेंगे।
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