Friday, September 25, 2020

मिथिला में भूमिहार

 🎗️🎗️मिथिला में भूमिहार


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मैथिल कोकिल कवि विद्यापति भूमिहार ब्राह्मण थे

प्रस्तुति अरविन्द रॉय

जो साक्ष्य मिले है वो ये इंगित करते है कि मैथिल कोकिल कवि विद्यापति के पूर्वज भूमिहार ब्राह्मण थे 

कार्जी उपाधि जो भूमिहारों  के मध्य प्रचलित थी विद्यापति के वंशावली मे है आचार्य रमानाथ झा रचनावली मे इस संबंध में उल्लेख है पुस्तक  में लिखा है "विद्यापतिक प्रपितामहभ्राताक मातामह छलथिन्ह माने कार्जि कार्जी सम्प्रति भूमिहार मध्य प्रचलित उपाधि थिक

महाकवि की  पुत्री का विवाह भी दरभंगा के पास किसी भूमिहार ब्राह्मण घर में हुआ था.पंजी व्यवस्था मै उस समय मिथिला के सभी ब्राह्मण शामिल हो गए थे  द्रोणवार ब्राह्मण मजबूत थे उन्होंने ये व्यवस्था नहीं अपनाई

मुस्लिम आक्रमण से त्रस्त होकर विद्यापति ने राजा शिव सिंह की पत्नी लखिमा देवी के साथ नेपाल के भूमिहार ब्राह्मण द्रोणवार पुरादित्य के राज में सरन लिया था विद्यापति रचनावली इसका उल्लेख l उनके समय में बहुत सारे संप्रदाय और मत थे। कोई वैष्णपव था, कोई शैव तो कोई शाक्त । लेकिन महाकवि शिव, विष्णु और शक्ति तीनों की आराधना करते थे।

विद्यापति की दो पत्नियाँ थी |इनकी पहली पत्नी सम्बाला संकारी परिवार की हरवंश शुक्ला की पुत्री थीं |


जिससे एक विद्वान और कवि हरपति ठाकुर और दुसरे नरपति ठाकुर उनके दो पुत्र थे |


दुसरा विवाह उन्होंने खंद्वला कुल के रघु ठाकुर की पुत्री से किया |


इनसे एक पुत्र वाचस्पति ठाकुर और दुल्लाही एक कन्या थी ,जो सुपाणी गंगोली वंश के राम के साथ ब्याही थी |


उनकी पुत्र वधुओं में से एक चन्द्रकला देवी महान कवियित्रियों में से एक थी |

Saturday, September 19, 2020

 🌹वत्स देश🌹

मगध साम्राज्य के समान वत्स देश का भी प्रभाव था वत्स देश वत्स गोत्र या वंश का मूल निवास था यहां के महामात्य यौगन्धरायण चाणक्य के समान कुशल था मृगावती, भारतीय इतिहास की सबसे पहली ज्ञात महिला शासकों में से एक हैं

प्रस्तुति अरविन्द रॉय 

आधुनिक उत्तर प्रदेश के प्रयाग (इलाहाबाद) और उसके आसपास राजधानी कौशांबी।

शतानीक द्वितीय' के बाद उनके पुत्र 'उदयन' "वत्सदेश" के राजा हुए भारतीय इतिहास में यह नाम बहुत प्रमुखता से लिया जाता है, "उदयन" केवल राजा ही नहीं था बल्कि उनके नाम बहुत सारे उनकी साहित्यिक कृतियों भी है, वत्सदेश का मंत्रिमंडल बड़ा सुदृढ़ था राज्य का सारा कार्य मंत्रिमंडल की देख रेख में होता था राज्य का महामात्य 'योगंधरायन' था उनका मंत्री 'हर्षरक्षित' था ये सभी निति निपुण' शास्त्रविद' शूरवीर ब्यक्तित्व के थे वे राज्यहित के लिए कभी भी राजा व रानी से मिल सकते थे देश हित में अपनी नीति चलाते थे  एक प्रकार से राजा को अन्य विचार करने के लिए अतिरिक्त समय की आवश्यकता नहीं था क्योंकि मंत्रिमंडल पूरी जिम्मेदारी से राज्य का कार्य भर देखता था।

राजा उदयन' भारतीय संस्कृति व परंपरा के अनुसार जहाँ राजा व सम्राट तो थे लेकिन वे तानाशाह नहीं होकर एक प्रकार से लोकतांत्रिक ब्यवस्था ही थी सारा का सारा निर्णय मंत्रिमंडल के सदस्यों सामंतो के अधीन होता था यानी राजा भी निर्णय में शामिल होता था न कि वह तानाशाह होता था

राजा उदयन "गज विद्या" में बड़े निपुण थे उन्हें हाथी पकड़नेे का बड़ा सौक था वे "घोषवती" वीडॉ वजाकर हाथी पकड़ लेते थे राज्य्या्भिषेक के कुछ दिन बाद ही अपने सेनापति तथा कुछ सैनिकों के साथ यमुना नदी के बगल 'नागवन' में गए थे उसी समय उज्जैनी राजा "चंद महासेन" जो महापराक्रमी था ने षड्यंत्र द्वारा अपने मंत्री 'शालंकायन' द्वारा "वत्सराज" को बंदी बनाकर उज्जैन लेकर चला गया, उज्जैन राजा की पुत्री "वासवदत्ता" थी उसके लिए संगीत के शिक्षक की आवश्यकता थी वंदी उदयन जब उज्जैन लाया गया तो उसे "राजकुमारी वासवदत्ता" के शिक्षक के लिए नियुक्ति हुई, वे "राजा उदयन" तो थे ही खूबसूरत नवजवान भी थे उनका राजकुमारी से प्रेम हो गया और मंत्री "यौगन्धरायण" की बुद्धि के कारण महाराज उदयन 'राजकुमारी वासवदत्ता' को लेकर भाग गया, महाराज शकुशल अपनी राजधानी "कौशाम्बी" पहुंच गए राजमाता उस समय तक जीवित थी उन्होंने बड़ी धूमधाम से दोनों का विबाह किया, वासवदत्ता से विबाह के पश्चात 'उदयन' राजनीति दृष्टि से मजबूत होने लगे अब उज्जैन का प्रतापी राजा "चन्द महासेन" राजा उदयन के पक्ष में हो गया और राज्यविस्तार में जुट गया

बुद्धिमान मंत्री 'यौगन्धरायण' ने महराज से जब उस सिंहासन पर बैठने के लिए कहा तो महाराज ने कहा कि इस पर बैठने वाले पूरी पृथ्वी पर शासन करते थे यौगन्धरायण बहुत प्रसन्न होकर राजा को दिग्विजय के लिए उकसाने लगा, पड़ोसी राज्य "वाराणसी" 'वत्सदेश' का पुराना शत्रु था उस समय वहां "ब्रम्हदत्त" नाम का राजा राज करता था "राजा उदयन" ने "मिथिला" का राज्य अपने शाले को दे दिया, अपनी सेना के सहयोगी द्वितीय "रानी पद्मावती" के भाई "सिंघवर्मा" को "चेदि राज्य" का राजा वना दिया इस प्रकार राजा ने अपनी सैनिक शक्ति को बढ़ा लिया, कहते हैं कि "उदयन" के आक्रमण के कारण "काशी नरेश" के मंत्रियों ने विष प्रयोग किया तमाम घास फूसों में कुवा तालाबों में जहरीले पदार्थ का मिश्रण डलवा दिया तथा विषकन्या का भी प्रयोग किया लेकिन "उदयन' का मंत्री यौगन्धरायण बहुत बुद्धिमान व्यक्ति था उसने सबकी काट कर दिया सैनिक छावनी में आने वाली सभी स्त्रियों का वध करवा दिया वहां के सेनापति की हत्या करवा दिया कुटिनीतिक सफलता प्राप्त हुआ 'राजा ब्रम्हदत्त' चौतरफा आक्रमण से घबरा गया उसने सभी दिशाओं से आक्रमण से महाराज "उदयन" को अजेय समझ वत्सराज के पास शान्ति दूत भेजा, राजा ने उचित उपहार लेकर "राजा ब्रम्हदत्त" का बहुत सम्मान किया, तत्पश्चात वत्सराज उदयन ने वंगदेश, कलिंग, कामरूप देश, विन्ध्य पर्वतीय राजाओं होते हुए दक्षिण में चोल राजाओं से कर लिया मुरल देश (केरल) दक्षिण के विजय प्राप्त करने के बाद उज्जैन विश्राम वहाँ साथ मे "वासवदत्ता तथा पद्मावती" को देख उज्जैन राजा बहुत प्रसन्न हुआ, महाराजा उदयन ने पश्चिम अभियान किया "सिंधुराज" पर विजय प्राप्त किया "पारसी राजा" का वध किया जो हूण चढ़ गए थे उनका समूल नाश कर दिया सम्पूर्ण भारतवर्ष को एक सूत्र में बांधने का अदभुत प्रयत्न किया।

कौशांबी इलाहाबाद जिले में नगर से प्राय: ५० किमी पश्चिम मे बसी थी, जहाँ आज भी यमुना के तीर कोसम गाँव में उनके खंडहर हैं। उदयन संस्कृत साहित्य की परंपरा में महान प्रणयी हो गयेे है और उनकी उस साहित्य में स्पेनी साहित्य के प्रिय नायक दोन जुआन से भी अधिक प्रसिद्धि है। बार-बार संस्कृत के कवियों, नाट्यकारो और कथाकारों ने उन्हे अपनी रचनाओं का नायक बनाया है और उनकी लोकप्रियता के परिणामस्वरूप गाँवों में लोग निंरतर उनकी कथा प्राचीन काल में कहते रहे हैं। महाकवि भास ने अपने दो दो नाटकों-स्वप्नवासवदत्ता और प्रतिज्ञायौगंधरायण-में उन्हें अपनी कथा का नायक बनाया है। वत्सराज की कथा बृहत्कथा और सोमदेव के कथासरित्सागर में भी वर्णित है। इन कृतियों से प्रकट है कि उदयन वीणावादन में अत्यंत कुशल थे और अपने उसी व्यसन के कारण उन्हें उज्जयिनी में अवंतिराज चंडप्रद्योत महासेन का कारागार भी भोगना पड़ा। भास के नाटक के अनुसार वीणा बजाकर हाथी पकड़ते समय छदमगज द्वारा अवंतिराज ने उन्हें पकड़ लिया था। बाद में उदयन प्रद्योत की कन्या वासवदत्ता के साथ हथिनी पर चढ़कर वत्स भाग गयेे। उस पलायन का दृश्य द्वितीय शती ईसवी पूर्व के शुंगकालीन मिट्टी के ठीकरों पर खुदा हुआ मिला है। एस ऐसा ठीकरा काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के भारत-कला-भवन में भी सुरक्षित है। कला और साहित्य के इस परस्परावलंबन से राजा की ऐतिहासिकता पुष्ट होती है। वत्सराज उदयन नि:संदेह ऐतिहासिक व्यक्ति थे और उनका उल्लेख साहित्य और कला के अतिरिक्त पुराणों और बौद्ध ग्रंथों में भी हुआ है। उदयन बुद्ध के समकालीन थे और उनके तथा उनके पुत्र बोधी, दोनों ने तथागत के उपदेश सुने थे। बौद्ध ग्रंथों में वर्णित कौशांबी के बुद्ध के आवास पुनीत घोषिताराम से कौशांबों की खुदाई में उस स्थान की नामांकित पट्टिका अभी मिली है। उदयन ने मगध के राजा दर्शक की भगिनी पद्मावती और अंग के राजा दृढ़वर्मा की कन्या को भी, वासवदत्ता के अतिरिक्त, संभवत: ब्याहा था। बुद्धकालीन जिन चार राजवंशों-मगध, कोशल, वत्स, अवंति-में परस्पर दीर्घकालीन संघर्ष चला था उन्हीं में उदयन का वत्स भी था, जो कालांतर में अवंति की बढ़ती हुई सीमाओं में समा गया। इ


Saturday, September 12, 2020

🎗️🎗️ कौशिक गोत्र🎗️🎗️


 🎗️🎗️ कौशिक गोत्र🎗️🎗️

इस गोत्र के कुछ भूमिहार झारखंड में ७-८०० वर्ष से पुरोहित का कार्य करते है भारतीय ग्रंथों में कुशिक नाम के एक प्रसिद्ध मुनि का उल्लेख मिलता है जो लकुलीश के शिष्य थे। 

प्रस्तुति अरविन्द रॉय

कौशिक के कौशिक, अत्रि, जमदग्नि, या विश्‍वामित्रा, अघमर्षण, कौशिक तीन प्रवर हैं। कुसौझिया, टेकार के पांडे, नेकतीवार आदि इस गोत्र के ब्राह्मण हैं।

Note:-भारद्वाज, कश्यप  , गौतम,वत्स , पराशर , शाण्डिल्य गोत्र ,सांकृत,गर्ग,

पश्चिम बक्सर की ओर से कौशिक गोत्र दो ब्राह्मण जगन्नाथ की यात्रा करने को जयपुर आये  सागर पाण्डे जयपुर ही रह गये। सागर पाण्डे के वंशज जयपुर के पाण्डे गढ़ से आ के चौपारन से एक मील पूर्व बारा में पहले पहल बसे और वहीं से धीरे-धीरे (1) बारा, (2) कुबरी, (3) दैहर, (4) इंगुनियाँ, (5) पूड़ो, (6) बनौ, (7) फुलवरिया, (8) ककरौला, (9) ठुट्ठी, (10) बड़ागाँव, (11) गंभरिया, (12) बेलखोरी, (13) नरियाही, (14) सदाफर, (15) इटखोरी, (16) सौनियाँ, (17) बलिया, (18) तिलरा, (19) पण्डरिया आदि गाँवों में जा बसे। इनमें प्रथम के नौ गाँव चौपारन में और शेष इटखोरी में हैं। इन सभी गाँवों के प्रधान तथा मूल निवासी कौशिक गोत्र ब्राह्मण ही हैं, 

भारतीय ग्रंथों में कुशिक नाम के एक प्रसिद्ध मुनि का उल्लेख मिलता है जो लकुलीश के शिष्य थे। 

कुशिक राजा के पुत्र गाधि, जों इंद्र के अंश से उत्पन्न हुए थे । विश्वामित्र ( कुशिक राजा के वेशज) जरासंध के एक सेनापति का नाम

कुशिक नाम के एक अन्य ऋषि भी थे जो भगवान विष्णु के भक्त थे तथा सामवेदी थे। वह ब्राह्मण थे। उनका सामगान प्रसिद्ध रहा है। उनकी कथा तथा नारद का साम या गायन सीखने की कथा भी प्रचलित है। कुशिक ऋषि के अनुयायी या वंशज भी कौशिक कहे जाते हैं।

ब्रह्मा के एक पुत्र का नाम कुश था, जो राजा भी बने। इन्हीं कुश के वंशज भी कौशिक कहे गये। ब्रह्मा के पुत्र होने से वे कुश ब्राह्मण हुए और उनकी संतानें कौशिक। कुश के चार पुत्र हुए - कुशाम्ब, कुशनाभ, असुरत्रजा, तथा वसु।

ऋषि विश्वामित्र को भी कौशिक कहा जाता है। विश्वामित्र क्षत्रिय थे। गोत्र परम्परा में ब्राह्मणों को छोड़ अन्य जातियों के लोगों का गोत्र उनके गुरुओं का ही गोत्र होता है जैसे भगवान राम का गोत्र उनके कुलगुरु वसिष्ठ के नाम पर है। अर्थात् भगवान राम वसिष्ठ गोत्र के थे। इसी प्रकार विश्वामित्र का गोत्र भी कौशिक हो गया क्योंकि ब्राह्मण जाति में उत्पन्न ऋषि कुशिक उनके गुरु थे। इसी कारण ऋग्वेद में उन्हें कौशिक कहा गया।

उनको कौशिक कहे जाने का दूसरा कारण भी कुछ लोग मानते हैं। उनके अनुसार विश्वामित्र ब्रह्मा के एक पुत्र कुश के वंशज थे जिसके कारण उन्हें कौशिक कहा गया। कुछ ग्रंथों में कहा गया है कि गाधि कुशाम्ब के पुत्र थे तथा कुछ अन्य ग्रंथों में कहा गया है कि वे कुशनाभ के पुत्र थे। इन्हीं राजा गाधि के पुत्र हुए विश्वामित्र। चूंकि विश्वामित्र को जन्म से क्षत्रिय मानने की परम्परा रही है इसलिए उनके ब्रह्मा के पुत्र कुश के वंशज मानने के लिए अनेक लोग तैयार नहीं हैं। क्योंकि तब उन्हें ब्राह्मण कुल का मानना होगा जो उन्हें क्षत्रिय मानने की परम्परा से मेल नहीं खाती।

हरिवशं पुराण से पता चलता है और प्रायः अन्यत्र भी माना जाता है कि गाधि कुशाम्ब के भाई कुशिक के पुत्र थे और इन्द्र ही स्वयं गाधि बनकर अवतरित हुए थे। इसी से इस वंश का नाम कौशिक हुआ। गाधि पुत्र विश्वामित्र को कौशिक इसी से कहा जाता है। हरिवंश पुराण के प्रथम पर्व हरिवंश पर्व के 27वें सर्ग के श्लोक (12-16) इस तथ्य को बड़ी स्पष्ट भाषा में कहते हैं। इन श्लोकों का अर्थ इस प्रकार है कि कुशिक ने इन्द्र के समान पुत्र पाने की इच्छा से तप करना आरम्भ किया तब इन्द्र स्वयं मारे भय के उनके पुत्र बन स्वयं उत्पन्न हुए। राजा कुशिक को तब तप करते हुए एक हजार वर्ष बीत गये तब इन्द्र का ध्यान कुशिक की ओर गया था। अति उग्र तप करके पुत्र पाने में समर्थ उन्हें देखकर सहस्राक्ष पुरन्दर ने उनमें अपने अंश को स्थापित किया। इस प्रकार देवेन्द्र इन्द्र कुशिक के पुत्र बने थे (13-15) फिर अंतिम श्लोक है...

स गाधिरभवत राजा मघवान कौशिक स्वयं।

पौर कुत्स्यभव भार्या गाधिः तस्यामजायत।।

यदि विश्वामित्र जन्म से क्षत्रिय थे तो संभव है कुशाम्ब और कुशिक नाम के कोई अन्य व्यक्ति रहे हों जो क्षत्रिय थे, तथा वे ब्रह्मा के पौत्र कुशाम्ब, जो ब्राह्मण हुए, से भिन्न हों। अनेक ग्रंथों में गाधि के पिता का नाम कुशनाभ, तथा कुशनाभ के पिता का नाम कुश, तथा कुश के पिता ब्रह्मा का उल्लेख मिलने के कारण विभ्रम की स्थिति बनी हुई है।


इस प्रकार जिन ब्राह्मणों के गोत्र कौशिक हैं वे या तो ब्रह्मा के पुत्र कुश के वंशज हैं या फिर कुशिक ब्रह्मर्षि की संतानें हैं। इस बात की संभावना कम ही लगती है कि कौशिक गोत्रीय ब्राह्मण विश्वामित्र (जिन्हें कौशिक भी कहा जाता है) नामक क्षत्रिय की संतानें हों। हां, ऐसा हो सकता है कि कुशिक नामक ब्राह्मण विश्वामित्र के गुरू रहे हों और इस प्रकार विश्वामित्र का गोत्र कौशिक हो गया हो। इस प्रकार विश्वामित्र अधिक से अधिक कौशिक गोत्रीय ब्राह्मणों के गुरुभाई हो सकते हैं। इस प्रकार यह बिल्कुल गलत धारणा लगती है कि कान्यकुब्ज या अन्य ब्राह्मणों में जो कौशिक हैं वे विश्वामित्र की संतानें हैं। हां, जिन क्षत्रियों के कौशिक गोत्र हुए वे विश्वमित्र की संतानें हैं या क्षत्रिय राजा कुशिक की, या फिर उनके पूर्वजों के गुरु कुशिक ब्रह्मर्षि रहे हों। अन्य जातियों में जो कौशिक गोत्र के हैं उनके पूर्वजों के भी कुशिक ब्रह्मर्षि ही गुरु रहे होंगे।


कौशिक उन लोगों को भी कहा जाता है जो नेपाल में हिमालय से निकलने वाली नदी कोसी या कोशी, जो भीम नगर के रास्ते बिहार में प्रवेश करती है, के किनारे रहते थे। विश्वामित्र को इसी नदी के किनारे तपस्या करते हुए ऋषि का दर्जा मिला था। उन्हें कौशिक कहे जाने का एक कारण यह भी है। महाभारत में कौशिकी के नाम से इस नदी का उल्लेख है। इस नदी को सप्तकोशी भी कहते हैं। यह लगभग 120 किलोमीटर लंबी नदी है।

Monday, September 7, 2020

🎗️🎗️पल्लव वंश दक्षिण के भूमिहार ब्राह्मण🎗️🎗️

 🎗️🎗️पल्लव वंश दक्षिण के भूमिहार ब्राह्मण🎗️🎗️


द्रोणवार या दोनवार भूमिहार ,द्रोण ब्राह्मण बिहार में वत्स गोत्र के है द्रोण ब्राह्मण पल्लव का क्या गोत्र है कहा नहीं जा सकता जायसवाल के अनुसार भारद्वाज थे

प्रस्तुति अरविन्द रॉय

जायसवाल के अनुसार पल्लव वाकाटकों की एक शाखा थे ये उत्तर के शुद्ध अभिजात कुल के ब्राह्मण थे जिन्होंने सैनिक वृत्ति अपना ली थी दोनों भारद्वाज गोत्र के ब्राह्मण थे। डॉ दशरथ शर्मा भी उन्हें ब्राह्मण बताते हैं

पल्लवों ने अपने वंश को  द्रोणाचार्य पुत्र अश्वत्थामा सम्बंधित रॉयकोटा कॉपर प्लेट और अन्य शिलालेखों में अंकित किया  अमरावती, आंध्र के पास मिला शिलालेख etc पल्लव राजवंश के ऊपर उत्तरी भारत की सांस्कृतिक परंपराओं की स्पष्ट छाप है। वे पहले प्राकृत और बाद में संस्कृत का उपयोग करते हैं। वे धर्ममहाराज और अश्वमेघयाजिन् जैसी उपाधियाँ धारण करते हैं। पल्लव लोग ब्राह्मण थे ,क्योकि वे अपने को द्रोणाचार्य और अश्वत्थामा का वंशज मानते थे हालांकि, यह आम तौर पर स्वीकार किया जाता है कि पल्लव टोंडामंडलम के मूल निवासी थे जो अशोक के साम्राज्य में एक प्रांत था जो लगभग पचास वर्षों तक मौयान प्रशासन के लाभों का आनंद ले रहा था (द्रोण ब्राह्मण बिहार में भी थे)टोंडियारा एक तमिल शब्द है जिसका संस्कृत में समकक्ष शब्द पल्लव है। इसलिए, टोंडामंडलम के निवासियों को पल्लव कहा जाता था। यही कारण है कि उनके शासक वंश को पल्लव वंश भी कहा जाता था।पल्लव हिंदू धर्म के भक्त थे। उन्होंने अलग-अलग यज्ञ किए और विष्णु, शिव, ब्रह्मा, लक्ष्मी आदि जैसे विभिन्न हिंदू देवी-देवताओं के मंदिरों और चित्रों का निर्माण किया। उन्होंने हिंदू धर्म और संस्कृत साहित्य को प्रोत्साहित किया और इस प्रकार, दक्षिण में आर्यीकरण की प्रक्रिया में मदद की। आठवीं शताब्दी में दक्षिण भारत में पनपने वाले हिंदू धार्मिक आंदोलनों की उत्पत्ति पल्लव साम्राज्य के मोर्चे के भीतर हुई थी।


कांची दक्षिण भारत में सीखने का एक बड़ा केंद्र बन गया और इसके विश्वविद्यालय ने दक्षिण में आर्य संस्कृति की प्रगति में मदद की, जबकि शहर को हिंदुओं के सात धार्मिक शहरों में से एक के रूप में स्वीकार किया गया था। हालाँकि, पल्लव सहिष्णु शासक थे। उन्होंने निश्चित रूप से संरक्षण दिया। Saivism और Bhagavatism लेकिन जैन धर्म और बौद्ध धर्म को भी संरक्षण दिया।


पल्लवों की अवधि साहित्यिक प्रगति द्वारा चिह्नित की गई थी। यूनिवर्सिटी ओ कांची ने ज्यादातर इस प्रगति में योगदान दिया। प्रसिद्ध बौद्ध विद्वान दिगाना, कांची विश्वविद्यालय में कई वर्षों तक रहे। उन पल्लव शासकों में से कुछ स्वयं विद्वान थे, जबकि उनमें से अधिकांश विद्वानों के संरक्षक थे। सम्राट महेन्द्र वर्मन ने मातृविलास-प्रशस्ति लिखी।


सम्राट विष्णु वर्मन ने अपनी उम्र के प्रसिद्ध विद्वान भारवि को अपने दरबार और डंडिन की यात्रा के लिए आमंत्रित किया था। एक और प्रसिद्ध विद्वान, शाही दरबार का संरक्षक प्राप्त किया। इसके अलावा संस्कृत साहित्य। तमिल साहित्य का विकास भी पल्लवों के काल में हुआ।


सुदूर दक्षिण में, मंदिर की वास्तुकला पल्लवों के साथ शुरू हुई। कई मंदिरों का निर्माण शाही संरक्षण के तहत विभिन्न हिंदू देवी-देवताओं के सम्मान में किया गया था। पल्लव वास्तुकला चरणों में बढ़ी। इसकी प्रगति को चार अलग-अलग चरणों में चिह्नित किया गया है जो समय-समय पर इसमें पेश किए गए परिवर्तनों के अनुसार हैं।


कला, जब इसने 600-625 ई। की अवधि के बीच अपनी शुरुआत की, उसे कला का महेंद्र विद्यालय कहा जाता है। 625-647 ई। की अवधि के दौरान जो कला विकसित हुई उसे कला का मामल्ला स्कूल कहा जाता है। मामल्लपुरम (महाबलिपुरम) के रथ मंदिरों का निर्माण इस अवधि के दौरान किया गया था। इन्हें दक्षिण भारत में वास्तुकला की कला का सबसे बेहतरीन नमूना माना जाता है।


इसके अलावा, पांच पांडवों के मंदिर और वराह मंदिर का भी निर्माण किया गया था। इन मंदिरों में देवी-देवताओं की सुंदर छवियां और चित्रों के बेहतरीन नमूने भी मिले हैं। आठवीं शताब्दी में सम्राट राजसिंह की अवधि के दौरान विकसित की गई कला को राजसिंह स्कूल कहा जाता है।


कांची और महाबलीपुरम के कुछ मंदिरों का निर्माण इस अवधि के दौरान किया गया था, जिनमें कांची में कैलाशनाथ (शिव) के मंदिर को सबसे अच्छा माना गया है। राजा अपराजिता के नाम पर अंतिम स्कूल का नाम अपराजिता स्कूल रखा गया था। बहसरा मंदिर का निर्माण इसी स्कूल के तहत हुआ था। यह पल्लवों के तहत वास्तुकला की कला के विकास का उच्चतम चरण था।


इस प्रकार, पल्लवों की अवधि में साहित्य की वृद्धि, संस्कृत और तमिल, दोनों में ललित कलाओं की वृद्धि हुई, विशेष रूप से वास्तुकला की, और हिंदू धर्म और आर्थिक समृद्धि की भी।


पल्लव न केवल एक टिकाऊ साम्राज्य की स्थापना करने में सफल रहे, बल्कि संस्कृति के विकास में भी, विशेषकर, दक्षिण में आर्य संस्कृति की। इसके अलावा, पल्लवों ने दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों में भी भारतीय संस्कृति की प्रगति में योगदान दिया। इस प्रकार, पल्लवों की अवधि को दक्षिण भारत के इतिहास में उल्लेखनीय अवधियों में से एक माना गया है।पल्लवों का प्रशासन ज्यादातर महान गुप्तों की तरह था। सम्राट राज्य का प्रमुख था और सभी शक्तियां उसके हाथों में केंद्रित थीं। उन्होंने परमेस्वर, परमभट्टारक आदि उपाधियाँ धारण कीं, लेकिन सम्राट निरंकुश नहीं थे। उनका प्राथमिक कर्तव्य अपने विषयों के कल्याण की देखभाल करना था और उन्होंने प्राचीन राज्य-धर्म के अनुसार अपना कर्तव्य निभाया।


सम्राट को मंत्रियों और राज्य के कई अन्य उच्च अधिकारियों द्वारा सहायता प्रदान की गई थी। प्रशासन की सुविधा के लिए साम्राज्य को राष्ट्र, कोट्टमा और गांवों में विभाजित किया गया था। पल्लवों ने अपने साम्राज्य को एक कुशल और अच्छा प्रशासन प्रदान करने में सफलता प्राप्त की थी।

Thursday, September 3, 2020

🎗️🌹🎗️गर्ग गोत्र🎗️🌹🎗️

 🎗️🌹🎗️गर्ग गोत्र🎗️🌹🎗️


महर्षि गर्ग,विदुषी गार्गी कोटि-कोटि नमन

भारद्वाज, कश्यप  , गौतम,वत्स , पराशर , शाण्डिल्य गोत्र की जानकारी पिछली पोस्ट में दी गयी है

जमींदार ब्राह्मणों में कान्यकुब्ज ब्राह्मण,सरयूपारीण ब्राह्मण और भूमिहार ब्राह्मणों में गोत्र गर्ग पाया जाता है 

प्रस्तुति अरविन्द रॉय 

महर्षि गर्गाचार्य ऋषि ज्योतिष शास्त्र के प्रधान ज्ञाता एवं भगवान श्री कृष्ण के कुलगुरु, विदुषी गार्गी महर्षि गर्ग के कुल मे जन्म लेने के कारण इन्हे गार्गी नाम से जाना जाता है।बहुत से लोगों का गोत्र गर्ग है और बहुत से लोगों का उपनाम गर्ग है। सभी का संबंध गर्ग ऋषि से है। वैदिक ऋषि गर्ग आंगिरस और भारद्वाज के वंशज 33 मंत्रकारों में श्रेष्ठ थे। गर्गवंशी लोग ब्राह्मणों और वैश्यों (बनिये) दोनों में मिल जाएंगे। एक गर्ग ऋषि महाभारत काल में भी हुए थे, जो यदुओं के आचार्य थे जिन्होंने 'गर्ग संहिता' लिखी।

ब्राह्मण पूर्वजों की परंपरा को देखें तो गर्ग से शुक्ल, गौतम से मिश्र, श्रीमुख शांडिल्य से तिवारी या त्रिपाठी वंश प्रकाश में आता है। गर्ग ऋषि के 13 लड़के बताए जाते हैं जिन्हें गर्ग गोत्रीय, पंच प्रवरीय, शुक्ल वंशज कहा जाता है, जो 13 गांवों में विभक्त हो गए थे। 

 महान ऋषि थे महामुनि गर्ग या गर्गाचार्य जी जो ज्योतिष शास्त्र के महान आचार्य व गणितज्ञ थे।

अखिल ब्रह्मांड से लेकर सूक्ष्म पिण्ड पर्यन्त ज्योतिष महाविज्ञान का क्षेत्र है। अनादि काल से शाश्वत चली आ रही इस महा विज्ञान  गणित भी शाश्वत सत्य है। संसार की समस्त विद्याएँ इसमें समाई हुई है। जिन भारतीय दिव्य ऋषियों ने वेद ज्ञान अपने तपोबल से प्राप्त किया जिसमें महर्षि गर्ग का नाम बड़े आदर से लिया जाता है। ज्योतिष शास्त्र के प्रधान प्रवर्तक भगवान गर्गाचार्य जी रहे है जो अठारह ज्योतिष शास्त्र वैदिक प्रवर्तकों जैसे ब्रह्मा, गर्ग,  पराशर, कश्यप, सूर्य, मरीचि, मनु, वशिष्ठ, अत्रि, नारद, अंगिरा, लोमश, पोलिश, च्यवन , भृगु, शौनक, व्यास, एवं यवन आदि गुरु परम्परा में प्रमुख रहें हैं। ऐसा महर्षि  ने अपने शास्त्र होरा में लिखा हैं-

  ” वेदेभ्य समुद्धृत्य ब्रह्मा प्रोवाच विस्तृतम् ।    गर्गस्तमा मिदं प्राह: मया तस्माद्यथा: तथा ।। “

अर्थात् भगवान ब्रह्मा जी ने वेद से निकाल कर नैत्र रूप वेदांग ज्योतिष शास्त्र को सर्व प्रथम महर्षि गर्गाचार्य ऋषि को प्रदान किया । ज्योतिष शास्त्र में महर्षि गर्ग ने महाग्रन्थ श्री गर्ग होरा की रचना की थी जो ज्योतिष का महान शास्त्र है। इस प्रकार महर्षि गर्गाचार्य अठारह वेदांग ज्योतिष शास्त्र के प्रवर्तकों में गुरु सिद्ध हुए। भगवान गर्गाचार्य जी न केवल ज्योतिष शास्त्र के आचार्य  थे, वरन् चार वेद, अठारह पुराण, एक सौ आठ उपनिषद सहित षट् दर्शन के पारगड्त महान आचार्य रहे है।

महर्षि महामुनि गर्ग ऋषि षट् वेदांग के भी पूर्णत: आचार्य थे। यह 88 हजार ऋषियों मे एकदम से सभी सद्गुण एक साथ केवल ” महर्षि गर्गाचार्य जी” में होने के से वे सर्व ब्रह्मर्षियों में वे भगवान ” गुरु ” कहलाये। वे ही महर्षि गर्गाचार्य ऋषि द्वारिकाधाम के राजा भगवान वासुदेव श्री कृष्ण के राजगुरु पद से सुशोभित हुए। इसी

महर्षि महामुनि गर्ग ऋषि भगवान श्री कृष्ण के कुल यदुवंशी के राजगुरु थे। इन्होंने ने भगवान श्री कृष्ण का नामकरण संस्कार व भविष्य वर्णन कर विभिन्न लीलाओं का आगम भविष्यवाणी की थी। इन्होंने नंद परिवार वासुदेव पर कंस का संकट आने पर स्वयं नंदबाबा के महल जाकर भविष्य वर्णन बताया था। इन्होंने श्री कृष्ण के जीवन पर आधारित संस्कृत में “गर्ग संहिता” नामक ग्रन्थ लिखा था जो सर्व लोकप्रिय है।

श्री कृष्ण भगवान पर इनके द्वारा रचित “गर्ग संहिता” न केवल ज्योतिष पर आधारित शास्त्र है, बल्कि इसमें भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं का भी वर्णन किया गया है। गर्ग संहिता में श्रीकृष्ण चरित्र का विस्तार से निरुपण किया गया है। इस ग्रन्थ में तो यहां तक कहा गया है, कि भगवान श्रीकृष्ण और राधा का विवाह हुआ था।

महर्षि गर्ग मुनि ने ही श्री शंकर का विवाह पार्वती के साथ सम्पन्न करवाया था। यह महाराजा हिमाचल के और पृथ्वी के प्रथम राजा माने जाने वाले पृथु के कुलगुरु व राजगुरु पद से सुशोभित रहे है। ऐसा माना जाता है कि महर्षि महामुनि गर्ग ऋषि आज भी हिमालय की गुफाओं में ध्यानस्थ हैं क्योंकि किसी भी शास्त्र में इनके देहांत का प्रसंग नहीं आता है। प्रतिवर्ष अनवरत महर्षि महामुनि गर्ग ऋषि की भादवा सुदी पंचमी को देशभर में जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है।

गर्ग संहिता में शरीर के अंग लक्षण के आधार पर ज्योतिष फल विवेचन किया गया हैं। गर्ग संहिता यदुवंशियों के आचार्य गर्ग मुनि की रचना है। यह संहिता मधुर श्रीकृष्णलीला से परिपूर्ण है। इसमें राधाजी की माधुर्य-भाव वाली लीलाओं का वर्णन है। श्रीमद्भगवद्गीता में जो कुछ सूत्ररूप से कहा गया है, गर्ग-संहिता में उसी का बखान किया गया है। अतः यह भागवतोक्त श्रीकृष्णलीला का महाभाष्य है। भगवान श्रीकृष्ण की पूर्णाता के संबंध में गर्ग ऋषि ने कहा है –

यस्मिन सर्वाणि तेजांसि विलीयन्ते स्वतेजसि। त वेदान्त परे साक्षात् परिपूर्णं स्वयम्।।

जबकि श्रीमद्भागवत में इस संबंध में महर्षि व्यास ने मात्र कृष्णस्तु भगवान स्वयम् — इतना ही कहा है।

श्रीकृष्ण की मधुरलीला की रचना हुई दिव्य रस के द्वारा उस रस का रास में प्रकाश हुआ है। श्रीमद्भागवत् में उस रास के केवल एक बार का वर्णन पाँच अध्यायों में किया गया है; जबकि इस गर्ग-संहिता में वृन्दावन में, अश्व खण्ड के प्रभाव सम्मिलन के समय और उसी अश्वमेध खण्ड के दिग्विजय के अनन्तर लौटते समय तीन बार कई अध्यायों में बड़ा सुन्दर वर्णन है। इसके माधुर्य ख्ण्ड में विभिन्न गोपियों के पूर्वजन्मों का बड़ा ही सुन्दर वर्णन है और भी बहुत-सी नयी कथाएँ हैं। यह संहिता भक्तों के लिये परम आदरणीय है; क्योंकि इसमें श्रीमद्भागवत के गूढ़ तत्त्वों का स्प्ष्ट रूप में उल्लेख है।

महर्षि गर्गाचार्य प्रसिद्ध मन्त्रद्रष्टा ऋषि हैं। ऋग्वेद ६।४७  सूक्तके द्रष्टा भगवान् गर्ग ही हैं। इनका प्रसिद्ध आश्रम कुरुक्षेत्र में देवनदी सरस्वती के तट पर निर्दिष्ट है। ऐसी प्रसिद्धि है कि इन्होंने यहीं ज्ञान प्राप्त किया और ज्योतिषशास्त्र के ग्रन्थों की रचना की। गर्गसंहिता-जैसा परम पवित्र ऐतिहासिक ग्रन्थ महर्षि गर्गाचार्य की ही कृति है। महर्षि गर्ग परम शिवभक्त थे। ये पृथ्वी के प्रथम राजा महाराज पृथु व महादेवी पार्वती के पिताश्री राजा हिमाचल के और भगवान श्री कृष्ण और यदुवंशियोंके गुरु तथा कुलपुरोहित कुलगुरु रहे हैं।


गोत्रकार ऋषियों में आपकी गणना विशिष्ट रूप में होती है। हिमालय के नैनीताल नैनी देवी के उद्गम स्थल से प्रचलित कथा के अनुसार महर्षि गर्ग ने अपने आश्रम गर्गाचंल का उल्लेख है जहां नैनीताल घाटी पर तीन ऋषि अत्रि, अगस्त्य व पुल्हस्त्य ऋषि आए थे पूजा पाठ करने पर उन्हे जल नहीं मिला तो महर्षि गर्ग ऋषि ने अपने तपोबल से मानसरोवर से निकाल वहां झील बनाई आज भी त्री-रिख यानि तीन ऋषि नाम से प्रसिद्ध है।

और इसी तरह वर्तमान झारखंड राज्य के बोकारो जिला में कसनार नामक जगह पर उनका आश्रम था जो द्वापर युग में महामुनि महर्षि गर्ग ऋषि की यपोस्थली रहा है जहां उन्होंने एक सत्रह एकड़ में सरोवर तालाब कलौंदीबांध बनाया था आज भी मौजूद है।  जिसका पौराणिक महत्व बताते हैं कि कलौंदीबांध तालाब का निर्माण द्वापर युग में महर्षि गर्ग के मार्गदर्शन में हुआ था।


श्रीकृष्ण जब कंस को मारने निकले तो इसी स्थल पर यज्ञ किया था। जल की कमी को देखते हुए उन्होंने यहां तालाब बनवाने का निर्णय लिया। इसका जिम्मा तेलमुंगा के धनी व्यक्ति कलौंदी साव को दिया गया। इन्होंने ग्रामीणों के सहयोग: चाणक्य (कौटिल्य)


कालांतर में कंसमार शब्द का अपभ्रंश कसमार बना तथा गर्ग से गरगा नदी हुआ। बताया यह भी जाता है कि बांध में सोने की कलश में चांदी के सिक्के भरकर एक मुर्गे को तालाब में छोड़ा गया था जो बांध के चारों ओर पानी में तैरता था। उस सोने के कलश को छूने की मनाही थी, अगर कोई छूए तो उसे देवता का कोपभाजन होना पड़ता था। निर्माण के सात दिन तक भारी आंधी-पानी से तालाब का मेड टूट गया। यहीं से गरगा नदी का उद्गम स्थल है जो कसमार व जरीडीह प्रखंड के कई गांवों से गुजरती हुई चास व बोकारो होते हुए लगभग 35 किमी की दूरी तय कर पुपुनकी के पास दामोदर नदी में मिल जाती हैं।

इसी प्रकार महर्षि गर्ग ऋषि ज्योतिष शास्त्र के साथ ही कई कुलों के कुल गुरू रहे है अपनी प्रखर तपोबल से सबको मार्गदर्शन दिया। महर्षि गर्गाचार्य ऋषि से भगवान श्री कृष्ण ने शिक्षा ग्रहण करके संपूर्ण प्रजा का पालन किया। 

गर्ग वंश की कुल दीपिका विदुषी गार्गी - 

महान 'विदुषी गार्गी गर्ग' वैदिक काल की एक विदुषी महिला थी। इनके पिता महर्षि वाचकनु थे इसलिए इनका नाम वाचकन्वी रखा गया और महर्षि गर्ग के कुल मे जन्म लेने के कारण इन्हे गार्गी नाम से जाना जाता है।

गार्गी एक महान प्राकृतिक दार्शनिक, वेदो की व्याख्याता और ब्रह्म विद्या की ज्ञाता थी। इन्होने शास्त्रार्थ मे कई विद्वानो को हराया था। एक बार राजा जनक द्वारा आयोजित यज्ञ मे गार्गी ने महर्षि याज्ञवल्क्य से शास्त्रार्थ किया। इस शास्त्रार्थ मे गार्गी के द्वारा पुछे गए प्रशनो के उत्तर देने के लिए महर्षि याज्ञवल्क्य को ब्रह्म दर्शन का प्रतिपादन करना पड गया।

गार्गी वेद उपनिषदों की ज्ञाता - 

गार्गी वाचकन्वी ' (लगभग 700 ईसा पूर्व का जन्म) एक प्राचीन भारतीय दार्शनिक थी। वेदिक साहित्य में, उन्हें एक महान प्राकृतिक दार्शनिक, वेदों के प्रसिद्ध व्याख्याता, और ब्रह्मा विद्या के ज्ञान के साथ ब्रह्मवादी के नाम से जाना जातीं है। बृहदारण्यक उपनिषद के छठी और आठवीं ब्राह्मण में उसका नाम प्रमुख है क्योंकि वह विद्या के राजा जनक द्वारा आयोजित एक दार्शनिक बहस में ब्राह्मण्य में भाग लेती है और संयम (आत्मा) के मुद्दे पर परेशान प्रश्नों के साथ ऋषि यज्ञवल्क्य को चुनौती देती है। यह भी कहा जाता है कि ऋग्वेद में कई भजन लिखे हैं। वह अपने सभी ब्रह्मचर्य बने और परंपरागत हिंदुओं द्वारा पूजा में आयोजित किया गया। ऋषि गर्ग की वंश (सी। 800-500 ईसा पूर्व) में ऋषि Vachaknu की बेटी गार्गी, का नाम उसके पिता के नाम पर गर्ग Vachaknavi के रूप में किया गया था। एक युवा उम्र से वे वैदिक ग्रंथों में गहरी रूचि प्रकट की और दर्शन के क्षेत्र में बहुत ही कुशल थीं। वह वैदिक काल में वेद और उपनिषद में अत्यधिक जानकार बन गए थे और अन्य दार्शनिकों के साथ बौद्धिक बहस आयोजित करते थे। वाचकन्वी, वचक्नु नाम के महर्षि की पुत्री थी। गर्ग गोत्र में उत्पन्न होने के कारण वे गार्गी नाम से प्रसिद्ध हैं।

प्राचीन भारत की महान ब्रह्मज्ञानी थी गार्गी -

गार्गी वेदज्ञ और ब्रह्माज्ञानी थी तो वे सभी प्रश्नों के जवाब जानती थी। यहां इस कहानी को बताने का तात्पर्य यह है कि अर्जुन की ही तरह गार्गी के प्रश्नों के कारण ‘बृहदारण्यक उपनिषद्’ की ऋचाओं का निर्माण हुआ। यह उपनिषद वेदों का एक हिस्सा है।अगर वैदिक साहित्य  पर सूर्या सावित्री छाई हैं तो ब्राह्मण और उपनिषद साहित्य पर गार्गी वाचक्नवी छाई हैं।

सूर्या तब हुई जब देश में मंत्रों की रचना समाप्ति की ओर थी और Mahabharata से थोड़े ही समय पूर्व उसने विवाह सूक्त की रचना कर वैदिक साहित्य और महाभारत पूर्ववर्ती समाज में इस अर्थ में क्रान्ति ला दी थी कि उसने विवाह संस्थाका रूप ही बदल दिया और आज से करीब पांच हजार साल पहले उस विवाह प्रथा का चलन किया जो हम आज तक अपनाए हुए हैं। वाचक्नवी गार्गी इस देश में तब थीं जब वैदिक मंत्र रचना के अवसान के बाद चारों ओर ब्रह्मज्ञान पर वाद-विवाद और बहसें हो रही थी और याज्ञवल्क्य जिस परिदृश्य को अपना एक अद्भुत नेतृत्व प्रदान कर रहे थे।

इतिहास में प्रकाश स्तंभ भारत का गौरव गार्गी गर्ग - 

गार्गी उसी युग में हुई थीं और जनक की ब्रह्मसभा में उन्हीं याज्ञवक्ल्य के साथ जबर्दस्त बहस करके गार्गी ने एक ऐसा नाम हमारे इतिहास में कमाया कि इस प्रकाश स्तम्भ को देश आज भी गौरवपूर्वक याद करता है। कौन थी गार्गी वाचक्नवी पूरा भारत जिसे पिछले पांच हजार साल से आदरपूर्वक याद करता आ रहा है उसके बारे में कोई खास सूचना पूरे संस्कृत साहित्य में हमें नहीं मिलती। क्या इसे अजीब माना जाए या एक विदुषी नारी का अपमान कुछ भी नहीं क्योंकि इस युग के जितने भी बड़े-बड़े दार्शनिक थे उनमें से किसी के बारे में कोई खास जानकारियां हमें नहीं मिलतीं। बस उतनी ही मिलती है जितनी ब्रह्मचर्चाओं के दौरान हमें संयोगवश मालूम पड़ जाती हैं। याज्ञवल्क्य के बारे में भी यही सच हैं।

गार्गी का पूरा नाम गार्गी वाचक्नवी बृहदारण्यकोपनिषद 3.6 और 3.8 श्लोक में वही मिलता है जहां वह जनक की राजसभा में याज्ञवल्क्य से अध्यात्म संवाद करती है। इसी वाचक्नवी के आधार पर बाद में लोगों ने कल्पना कर ली कि किसी वचक्नु नामक ऋषि की पत्‍नी होने के कारण गार्गी का नाम वाचक्नवी पड़ गया। गार्गी अपने समय की प्रखर वक्ता और वाद-विवाद में अप्रतिम होने के कारण गार्गी का नाम वाचक्नवी प्रसिद्ध हो गया होगा। जैसे कई बार प्रसिद्ध सन्तानें अपने पिता को नाम दे दिया करती हैं, वैसे ही गार्गी वाचक्नवी ने अपने पिता को अपने गुण से नाम दे दिया होगा। इसलिए गार्गी वाचक्नवी का अर्थ हुआ वह गार्गी जिसे संवाद या विवाद में कोई हरा न सके। ऐसी महान महिला और गर्ग वंश की कुल दीपिका विदुषी गार्गी को शत् शत् नमन् ।

आस्पद- शुक्ल


प्रवर- आंगिरस,वार्हस्पत्य,भारद्वाज,श्येन,गार्ग्य


वेद- यजुर्वेद


शाखा- माध्यन्दिनीय


सूत्र- कात्यायन


उपवेद- धनुर्वेद


शिखा- दाहिनी


पाद- दक्षिण


उपास्य देवता- शिव


प्रमुख वंश- शुक्ल,तिवारी,भारद्वाज

Tuesday, September 1, 2020

🎗️🎗️मदारपुर के भूमिहार🎗️🎗️

🎗️🎗️मदारपुर(कानपुर) के भूमिहार🎗️🎗️

कान्यकुब्जप्रबोधिनी में मदारपुर लड़ाई का जिक्र आया है

मदारपुर का युद्ध मदारपुर नामक स्थान, जो कानपुर शहर के समीप है lवत्स ,गौतम,सावर्ण गोत्र,सांकृत्य गोत्र, को बड़ा भूमि अनुदान मिला था 

प्रस्तुति अरविन्द रॉय

भूमिहार ब्राह्मणों और बाबर की सेनाओं के बीच विक्रम संवत १५८४ (वर्ष १५२८) में हुआ था  गढ़वाल वंश के एक राजा ने साहुल शर्मा नाम के एक ब्राह्मण को ससईमऊ गांव(कानपुर)दान में दिया था।और भी कई गांव दान में क्षेत्र में दिए गए क्षेत्र कन्नौज के राजा जयचन्द्र के पितामह गोविन्दचन्द्र के अधिकार में था। वह कोटि नाम के परगने या तअल्लुक़ो के अन्तर्गत था। इसका पता एक दानपत्र से लगा है, जो कुछ समय पूर्व, इसी जिले के छत्रपुर नामक गांव में मिला था। उस में लिखा है कि ससईमऊ ( अर्थात् वर्तमान सीसामऊ ) गांव को गोविन्द-चन्द्रदेव ने साहुल शर्मा नाम के एक ब्राह्मण को विक्रम संवत, ११७७ में दे डाला था।

संभवतः.और यही ब्राह्मण आगे चलकर भूमि का मालिक (भूधारी कृषक









के अर्थ में ) होने से भूमिहार कहलाने लगे

स्वामी सहजानंद जी ने लिखा है स्कन्दपुराण के धर्मारण्य महात्म्य नामक भाग के पढ़ने से स्पष्ट होता हैं कि बरेली प्रभृति प्रान्त सहित कान्यकुब्ज देश वर्तमान कानपुर प्रान्त को लेकर ही प्रधान धर्मारण्य कहलाता हैं। इसलिए इसी प्रान्त के गाँवों और वहाँ के रहनेवाले (अधिपति) ब्राह्मणों के गोत्रदि की व्यवस्था धर्मारण्य खण्ड में सविस्तार निरूपित हैं और यह भी वहीं ग्रन्थान्त में लिखा हैं कि** कन्नौज का राजा आम बौद्ध (जैन) मतानुयायी हो गया और अपनी कन्या का विवाह एक जैन (बौद्ध) मतानुयायी कुमारपाल नामक राजा से किया जो ब्रह्मरावत्ता (बिठूर के पास के प्रान्त) का निवासी था और जब उसने धर्मारण्य को उसे दायज में दिया तो उसके दामाद (जमाता) ने वहाँ के पूर्वोक्त वाडवों (ब्राह्मणों) से कर माँगा एवं अपने देश से चले जाने और उनकी भूमि को (जिसे श्रीरामजी ने दिया था) छीन लेने की आज्ञा दी और कहा कि आप लोग जाइये, हम ऐसे नहीं मान सकते। परन्तु यदि अपने राम और हनुमान् को यहाँ लायेंगे, तभी हम आपके धर्म और बातों का विश्वास करेंगे। उस पार बहुत से वाडव (ब्राह्मण) रामेश्वरजी की ओर श्रीरामजी की प्राप्ति के लिए गये और अन्त में हनुमान्जी की सहायता से उन्हें उनकी पूर्व भूमि प्राप्त हुई।

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** यथा, 'इदानीं च कलौ प्राप्ते आमो नाम्ना बभूवह। कान्यकुब्जाधिप: श्रीमान्धार्मज्ञो नीतितप्तर:॥ 11॥ प्रजानां कलिना तत्रा पापे बुद्धिरजायत। वैष्णवं धर्ममुत्सृज्य बौद्ध धर्ममुपागत:॥ 35॥ तस्य राज्ञो महादेवी मामनाम्न्यतिविश्रुता। गर्भं दधार सा राज्ञी सर्व लक्षण संयुता॥ 37॥ सम्पूर्णे दश मे मासि जाता तस्या: सुरूपिणी। रत्नगगेति नाम्ना सा मणिमाणिक्यभूषिता॥ 39॥ ब्रह्मावत्तराधिपतये कुम्भीपालाय धीमते। रत्नगंगा महादेवीं ददौतामिति विक्रमी। मोहेरकं ददौ तस्मै विवाहे दैवमोहित:॥ 44॥ धर्मारण्ये समागत्य राजधनी कृता तदा। देवांश्च स्थापयामास जैनधर्मप्रणीतकान्॥ 45॥ लुप्तशासनका विप्रा लुप्तस्वाम्या अहर्निशम्। समाकुलितचित्तास्ते नृपमाम समाययु:॥ 48॥ कान्यकुब्जपुरं प्राप्य कतिभिर्वासरैर्नृप। गंगोपकण्ठे न्यवस×छ्रान्तास्ते मोढवाडबा:॥ 49 अ. 36॥ इत्युक्त्वा हनुमद्दत्ता वामकक्षोद्भवा पुटी। प्रक्षिप्ता चास्य निलये व्यावृत्ता द्विजसत्तामा:॥ 17॥ अग्निज्वालाकुलं सर्वं संजातं तत्रा चैवहि। जाद्दवीतीरमासाद्य त्रौविद्येभ्यो ददौ नृप:॥ 18, अ. 37॥ इत्यादि॥

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इस आख्यान से स्पष्ट हैं कि पूर्वोक्त धर्मारण्य के ब्राह्मण गंगा के उत्तर तट में कान्यकुब्ज देश (कानपुर आदि प्रान्तों में) रहते और इन भूमिहार कहलाने वाले ब्राह्मणों की तरह यजनादि कर्मों से रहित होकर राज्य या भूमिपतित्व करते थे। और जिस मदारपुर के भूमिहार ब्राह्मणों का वर्णन आया हैं वह भी कानपुर जिले में गंगा से उत्तर ही हैं, और धर्मारण्य का नाम मेहेर भी हैं, क्योंकि लिखा हैं कि :


धर्मारण्यं कृतयुगे त्रोतायां सत्यमंदिरम्।

द्वापरे वेद भवनं कलौ मेहेरकं स्मृतम्॥ 27, अ 40॥


अर्थात् ''सत्ययुग में जिसका नाम धर्माण्य था, उसी का त्रोता में सत्य मन्दिर, द्वापर में वेदभवन और कलि में मेहेर नाम पड़ा।'' इसीलिए वहाँ उसकी राजधनी का नाम भी मेहेरपुर लिखा हैं। तात्पर्य यह हैं कि धर्मारण्य में जो प्रसिद्ध स्थान होता था, उसी का नाम मेहेरपुर होता था। और वाडव ब्राह्मण वहाँ के राजा थे। अत: जिस राजधनी में वे रहते थे, वह मेहेरपुर कहलाते-कहलाते मदारपुर कहलाने लगी और चूँकि वे लोग राजा या जबरदस्त थे, इसी से यवनों ने उनसे युद्ध किया क्योंकि साधारण लोगों से राजा लोग युद्ध नहीं करते। इसलिए जैसा कि कह चुके हैं कि समय पाकर कुछ ग्रामों में रहने वाले उन्हीं ब्राह्मणों का नाम भूमिहार ब्राह्मण पड़ गया इसके मानने में कोई सन्देह नहीं किया जा सकता।


क्योंकि भूमिहार शब्द 'भूमि' शब्द को पूर्व में रखकर हृर हरणे धातु से 'कर्मण्यण्' (पा. 3। 2। 1) इस पाणिनिसूत्रानुसार 'अण्' प्रत्यय लगाने पर 'भारहार' आदि शब्दों की तरह बना हैं। यह हृ×र धातु हरण रूप अर्थ का बोधक हैं। जिस हरण का अर्थ पण्डित प्रवर भट्टोजिदीक्षित ने स्वकृत सिद्धान्त कौमुदी के उत्तारार्ध्द के भ्वादि गण में इसी हृ×र धातु के प्रकरण में लिखा हैं कि 'हरणं प्रापणं, स्वीकार:, स्तेयं, नाशनं च।' जिसका तात्पर्य यह हैं कि जिस हरण रूप अर्थ का वाचक 'हृ' धातु हैं, उस हरण के चार अर्थ हैं-(1) प्राप्त करना अर्थात् पहुँचाना, (2) स्वीकार करना, (3) चुराना, और (4) नाश करना। इन चारों अर्थों के उदाहरण 'तत्त्वबोधिनी' प्रभृति ग्रन्थों में ऐसे लिखे हैं कि जैसे-


(1) 'भारं हरति' अर्थात् बोझे को हरण करता यानी पहुँचाता हैं,


(2) 'भागं हरति' अर्थात् अपने हिस्से को हरण करता या स्वीकार करता हैं,


(3)'सुवर्ण हरति, अर्थात् सोना हरता या चुराता हैं, और


(4) 'हरि हरति पापानि' अर्थात् विष्णु पापों को हरते या उनका नाश करते हैं। परन्तु जब कि रुपये, पैसे इत्यादि की तरह पृथ्वी की चोरी या नाश हो नहीं सकता, इसलिए प्रकृत में हृ धातु के दो ही अर्थ हो सकते हैं, प्रापण अर्थात् पहुँचाना या बल से अधिकार कर लेना और स्वीकार।


इसलिए भूमिहार का यह अर्थ हुआ कि 'भूमिं हरति प्रापयपि बलादधिकरोति केनचिदुपाएन स्वीकरोति वेति भूमिहार:' अर्थात् जो ब्राह्मण पृथ्वी के ऊपर अस्त्रा, शस्त्रादि के बल से अधिकार कर ले, अथवा उपयान्तर से प्राप्त पृथ्वी का स्वीकार कर ले-जैसा कि योगेन्द्रनाथ भट्टाचार्य एम. ए. की भी सम्मति इस विषय में ग्रन्थ के अन्त में दिखलायेंगे कि जिन ब्राह्मणों ने जागीर वगैरह में भूमि प्राप्त की, वे भूमिहार कहलाये-उसे भूमिहार कहते हैं। और ये दोनों बातें धर्मारण्य के पूर्वोक्त ब्राह्मणों में घटती भी हैं। क्योंकि श्रीरामजी के यज्ञ में दक्षिणा स्वरूप भी पृथ्वी उन्हें यज्ञ करवाने के बदले मिली थी, और पीछे उस जैनी राजा के तंग करने पर उन्हें उसके गृह इत्यादि को जलाना और रुद्र-रूप धारण करना पड़ा, जिससे उसकी सब सेनाएँ नष्ट हो गयीं। यह बात उसी धर्मारण्य महात्म्य ग्रन्थ से विदित होती हैं। और पश्चात् भी उन्होंने यवन राज्य काल में पृथ्वी पर बहुत सा अधिकार कर लिया था। इसलिए उसी समय (यवन काल में) ये मदारपुर के अधिपति ब्राह्मण भूमिहार कहलाये और इसीलिए उन लोगों को यवनों ने बली जान घोर युद्ध किया।